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भारतीय प्राणि सर्वेक्षण के वैज्ञानिकों ने केरल और कूर्ग से रायसिडा कनखजूरे की तीन नई प्रजातियाँ बताईं, शोध-पत्र 12 अक्टूबर 2026 को ऑनलाइन छपा
विज्ञान और अंतरिक्ष

भारतीय प्राणि सर्वेक्षण के वैज्ञानिकों ने केरल और कूर्ग से रायसिडा कनखजूरे की तीन नई प्रजातियाँ बताईं, शोध-पत्र 12 अक्टूबर 2026 को ऑनलाइन छपा

चित्रण: tuput

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भारतीय प्राणि सर्वेक्षण के कोझिकोड स्थित पश्चिमी घाट क्षेत्रीय केंद्र और मालाबार क्रिश्चियन कॉलेज के वैज्ञानिकों ने इंटरनेशनल जर्नल ऑफ ट्रॉपिकल इंसेक्ट साइंस में Rhysida quadrispinosa, R. coorgensis और R. neyyarensis के नाम दिए। दो प्रजातियाँ केरल की हैं और एक कर्नाटक के कूर्ग की। शोध-पत्र का सार भारत की रायसिडा प्रजातियों की संख्या 20 बताता है।

· · 5 मिनट का पठन

12 अक्टूबर 2026 को International Journal of Tropical Insect Science ने कनखजूरे की तीन ऐसी प्रजातियों के वर्णन छापे जो विज्ञान के लिए नई हैं और केरल व कर्नाटक में मिली हैं। लेखक हैं भारतीय प्राणि सर्वेक्षण के कोझिकोड स्थित पश्चिमी घाट क्षेत्रीय केंद्र के नेइसेरिल अनिरुद्धन कश्मीरा और पवित्तु मीतल सुरेशन, तथा कोझिकोड के ही मालाबार क्रिश्चियन कॉलेज की मेलेतलक्कल फातिमा-नूरिन। प्रजातियाँ हैं Rhysida quadrispinosa, Rhysida coorgensis और Rhysida neyyarensis, और इन तीनों में से किसी का पहले कोई वैज्ञानिक नाम नहीं था।

शोध-पत्र क्या बताता है

शोध-पत्र का शीर्षक है “Discovery of three new species of the genus Rhysida Wood, 1862 (Chilopoda: Scolopendromorpha), from Southern India.” कनखजूरों का वर्ग Chilopoda कहलाता है और Scolopendromorpha उसका एक गण है। स्प्रिंगर के रिकॉर्ड के अनुसार पांडुलिपि 26 मार्च 2025 को मिली, 26 सितंबर 2026 को स्वीकार हुई और 12 अक्टूबर 2026 को ऑनलाइन छपी। लेखकों के अनुसार इस काम को कोई बाहरी वित्तीय सहायता नहीं मिली।

सार तीनों प्रजातियों को इस तरह रखता है: R. quadrispinosa कोझिकोड, केरल से; R. coorgensis कूर्ग, कर्नाटक से; और R. neyyarensis तिरुवनंतपुरम के नेय्यार से, जो केरल में है। शोध-पत्र में इस वंश की भारतीय प्रजातियों का वितरण-मानचित्र भी है।

तीनों को कैसे पहचानें

कनखजूरे की नई प्रजाति को उसके रिश्तेदारों से छोटी, गिनी जा सकने वाली विशेषताएँ अलग करती हैं, और सार हर प्रजाति के लिए एक विशेषता बताता है।

R. quadrispinosa के अंतिम पैर के प्रीफीमर पर चार अधर-पार्श्व काँटे होते हैं। सीधे शब्दों में, यह आख़िरी जोड़ी पैरों के एक खंड के नीचे और बाहरी किनारे पर चार काँटे हैं, और इसी से प्रजाति को उसका नाम मिला है। डाउन टू अर्थ के अनुसार शरीर के कुछ खंडों के किनारों का आकार और पिछले पैरों पर काँटों की बनावट भी इसे अलग करने में मदद करती है।

R. coorgensis एक प्रजाति R. ikhalama जैसी दिखती है। यह कॉक्सोप्ल्यूरल काँटों की संख्या में अलग है, जिन्हें डाउन टू अर्थ शरीर के पिछले हिस्से के पास के काँटे बताता है।

R. neyyarensis R. konda और R. pazhuthara जैसी दिखती है। इसे दो पैर-खंडों, टार्सस और टिबिया, पर स्पर के वितरण से अलग पहचाना जा सकता है।

शोध-पत्र की संदर्भ सूची में ChiloBase 2.0 है, जो कनखजूरों की विश्वव्यापी सूची है। डाउन टू अर्थ के अनुसार टीम ने जीवों को डिजिटल कैमरा लगे माइक्रोस्कोपों से जाँचा, उनकी तुलना ज्ञात प्रजातियों से की और ChiloBase समेत वैश्विक डेटाबेस देखे, और ये नमूने भारतीय प्राणि सर्वेक्षण के राष्ट्रीय प्राणि संग्रह में रखे ऐसे कनखजूरे थे जिनकी पहले पहचान नहीं हुई थी। 1 जुलाई 1916 को स्थापित और कोलकाता में मुख्यालय वाला प्राणि सर्वेक्षण अपनी जड़ें 1875 में कलकत्ता के इंडियन म्यूज़ियम के प्राणि विज्ञान विभाग में खोजता है।

दो केरल की प्रजातियाँ और एक कूर्ग की

डाउन टू अर्थ और जीकेटुडे, दोनों के अनुसार R. neyyarensis का नाम केरल के नेय्यार वन्यजीव अभयारण्य पर और R. coorgensis का नाम कूर्ग पर रखा गया है। केरल पर्यटन नेय्यार को पश्चिमी घाट के दक्षिण-पूर्व में लगभग 12,000 हेक्टेयर का वनाच्छादित पहाड़ी अभयारण्य बताता है, जिसे तिरुवनंतपुरम वन्यजीव प्रभाग चलाता है और जो लगभग 1,890 मीटर ऊँची अगस्त्यकूडम चोटी तक उठता है।

यूनेस्को का पश्चिमी घाट वाला विश्व धरोहर वक्तव्य इस पर्वतमाला को 1,600 किमी की पट्टी में लगभग 140,000 वर्ग किमी बताता है, जिसे केवल 30 किमी चौड़ा पालघाट दर्रा तोड़ता है। उसी वक्तव्य में कहा गया है कि यह पर्वतमाला श्रीलंका के साथ जैव विविधता के दुनिया के आठ “सबसे गर्म हॉटस्पॉट” में से एक है, और यह भी कि “अकशेरुकी जैव विविधता भी, जब बेहतर ज्ञात होगी, संभवतः बहुत अधिक पाई जाएगी।” शोध-पत्र इस पर्वतमाला के रिकॉर्ड में तीन अकशेरुकी प्रजातियाँ जोड़ता है। पर्वतमाला के बारे में tuput की पश्चिमी घाट विश्व धरोहर स्थल की मार्गदर्शिका देखें, और एक अलग तरह के केरल के जंगल के लिए साइलेंट वैली देखें।

इसी टीम का पहले का रिकॉर्ड-कार्य

कोझिकोड के समूह ने दिसंबर 2025 में संबंधित काम छापा था। Proceedings of the National Academy of Sciences, India Section B में कश्मीरा, कार्तिका, अंजना और सुरेशन ने स्कोलोपेंड्रिड कनखजूरों के पाँच नए राज्य-रिकॉर्ड बताए: केरल से Rhysida crassispina, R. lewisi, Scolopendra ellorensis और S. indiae, और कर्नाटक से R. aspinosa, हर एक पहली बार। शोध-पत्र का सार कहता है कि भारत में चार जैव विविधता हॉटस्पॉट हैं और कनखजूरों समेत कई समूहों के रहने के स्थानों का पूरा आकलन नहीं है, और उपलब्ध आँकड़े बिखरे हुए हैं। दोनों शोध-पत्रों के सह-लेखक सुरेशन ने प्राणि सर्वेक्षण के 2020 के पश्चिमी घाट के जीव-जंतुओं वाले खंड में कनखजूरों का अध्याय भी लिखा था, जिसका हवाला नया शोध-पत्र देता है।

उपमहाद्वीप में गहरी जड़ों वाला एक वंश

Rhysida ने भारत के बाहर भी ध्यान खींचा है। Zoological Journal of the Linnean Society में 2019 के एक शोध-पत्र में जाह्नवी जोशी, प्रवीण कारंत और ग्रेगरी एजकोम्ब ने डीएनए, शरीर की बनावट और वितरण के आँकड़ों से भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण-पूर्व एशिया में इस वंश का अध्ययन किया। उन्होंने पाँच नई प्रजातियों के नाम दिए, जिनमें R. ikhalama, R. konda और R. pazhuthara हैं, यानी वही तीन जिन्हें 2026 का शोध-पत्र तुलना के बिंदुओं की तरह इस्तेमाल करता है। उनका सार बताता है कि दक्षिण-पूर्व एशिया की प्रजातियाँ भारतीय उपमहाद्वीप की प्रजातियों के समूहों के भीतर बैठती हैं, जिसे वे भारत-से-बाहर परिकल्पना (out-of-India hypothesis) का समर्थन मानते हैं, और यह भी कि वंश के दोनों बड़े समूहों में विविधता क्रेटेशियस काल में उपमहाद्वीप पर शुरू हुई। वे यह निष्कर्ष भी निकालते हैं कि भारत में इस वंश की विविधता को कम आँका गया था।

जहाँ रिपोर्टें अलग हैं

स्रोत दो बातों पर असहमत हैं, और दोनों पर शोध-पत्र बेहतर मार्गदर्शक है।

पहली गिनती है। पत्रिका में छपा सार कहता है कि तीन नए वर्णनों से भारत की Rhysida प्रजातियाँ बढ़कर 20 हो गई हैं। डाउन टू अर्थ और जीकेटुडे, दोनों रिपोर्ट करते हैं कि कुल संख्या अब 23 है, और दोनों में से कोई अंतर नहीं समझाता। यह लेख जहाँ कुल संख्या देता है वहाँ सार का आँकड़ा 20 इस्तेमाल करता है और बताता है कि समाचार रिपोर्टें 23 कहती हैं।

दूसरी तारीख है। स्प्रिंगर का रिकॉर्ड ऑनलाइन प्रकाशन की तारीख 12 अक्टूबर 2026 देता है, जिसे डाउन टू अर्थ भी मानता है। जीकेटुडे, 17 अक्टूबर की अपनी रिपोर्ट में, कहता है कि प्रजातियों का वर्णन 16 अक्टूबर को हुआ। शोध-पत्र का पूरा पाठ सदस्यता के पीछे है, इसलिए यह लेख शोध-पत्र के दावों के लिए सार और प्रकाशन रिकॉर्ड पर, और दोनों समाचार रिपोर्टों से जुड़े ब्योरों के लिए उन्हीं रिपोर्टों पर निर्भर है।

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स्रोत और आगे पढ़ने के लिए

  1. Kashmeera, Sureshan and Fathima-Nourin, Discovery of three new species of the genus Rhysida Wood, 1862 (Chilopoda: Scolopendromorpha), from Southern India, International Journal of Tropical Insect Science (published 12 October 2026)
  2. Kashmeera, Karthika, Anjana and Sureshan, Update on the geographical distribution records of some Scolopendromorph centipedes (Chilopoda) in India, Proceedings of the National Academy of Sciences, India Section B (online 4 December 2025)
  3. Joshi, Karanth and Edgecombe, The out-of-India hypothesis: evidence from an ancient centipede genus, Rhysida, and systematics of Indian species, Zoological Journal of the Linnean Society 189 (2020)
  4. UNESCO World Heritage Centre: Western Ghats (Statement of Outstanding Universal Value)
  5. Zoological Survey of India: home page
  6. Kerala Tourism: Neyyar Wildlife Sanctuary
  7. Down To Earth: Three new centipede species discovered in Western Ghats (20 October 2026)
  8. GKToday: Scientists Describe Three New Centipede Species in South India (17 October 2026)

यह लेख AI उपकरणों की सहायता से शोधित और लिखा गया है, और सटीकता के लिए संपादित किया गया है। यह केवल सामान्य जानकारी और चर्चा के लिए है, पेशेवर सलाह नहीं। हमारे संपादकीय मानक और अस्वीकरण देखें। कोई त्रुटि मिली? हमें बताएँ।

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