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ऑपरेशन विजय ने 26 जुलाई 1999 तक करगिल की चोटियाँ वापस लीं, 12 जून की रात तोलोलिंग पर हमले से जुलाई में टाइगर हिल तक, और चार सैनिकों को परमवीर चक्र मिला
युद्ध और शौर्य

ऑपरेशन विजय ने 26 जुलाई 1999 तक करगिल की चोटियाँ वापस लीं, 12 जून की रात तोलोलिंग पर हमले से जुलाई में टाइगर हिल तक, और चार सैनिकों को परमवीर चक्र मिला

फ़ोटो: Reflectionsbyprajakta / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0 (क्रॉप किया गया)

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भारत की थलसेना ने ऑपरेशन विजय के तहत ऊपर की ओर जवाबी हमला किया, जबकि वायुसेना ने 26 मई 1999 से ऑपरेशन सफ़ेद सागर चलाया। तोलोलिंग पर हमला 12 जून की रात हुआ और टाइगर हिल की चढ़ाई 3 जुलाई को, और प्रेस सूचना ब्यूरो इस युद्ध के लिए चार परमवीर चक्र गिनता है।

· · 10 मिनट का पठन

3 मई की पहली सूचना से 26 जुलाई 1999 तक, भारतीय थलसेना ने राष्ट्रीय राजमार्ग 1ए, यानी श्रीनगर से लेह जाने वाली सड़क, के ऊपर की चोटियाँ उन पाकिस्तानी सैनिकों से वापस ले लीं जो नियंत्रण रेखा पार कर आए थे, और यह काम उसने रेखा को ख़ुद पार किए बिना किया। केंद्र सरकार की सूचना सेवा, प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी), इस युद्ध के लिए चार परमवीर चक्र गिनता है, जो भारत का सर्वोच्च वीरता पुरस्कार है, साथ ही नौ महावीर चक्र और 55 वीर चक्र।

घुसपैठ कैसे हुई और लड़ाई वॉशिंगटन में कैसे ख़त्म हुई, यह युद्ध के मुख्य वृत्तांत में बताया गया है। यह लेख स्वयं लड़ाई का ब्योरा देता है: तोलोलिंग, तोपख़ाना, टाइगर हिल, हवाई अभियान और इसके लिए सम्मानित चार सैनिक।

चरवाहे की सूचना से पूर्ण सतर्कता तक

करगिल समीक्षा समिति, जिसे सरकार ने 29 जुलाई 1999 को गठित किया, अपनी रिपोर्ट में घटनाक्रम देती है। चरवाहों ने 3 मई को घुसपैठ का पता लगाया और गश्ती दलों ने 7 मई को उसकी पुष्टि की। 11 मई को 15 कोर की एक स्थिति रिपोर्ट में बटालिक सेक्टर में आठ घुसपैठें गिनी गईं, जिनमें 160 से 240 घुसपैठिए शामिल थे। अगले दिन उत्तरी कमान ने जम्मू-कश्मीर के पूरे क्षेत्र को सतर्क कर दिया।

24 मई तक दो और ब्रिगेड पहुँच चुकी थीं। 25 मई को सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने वायुशक्ति के इस्तेमाल को मंज़ूरी दी, इस शर्त के साथ, जो यूनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूशन ऑफ़ इंडिया (यूएसआई) ने दर्ज की है, कि विमान नियंत्रण रेखा पार नहीं करेंगे। समिति यह भी दर्ज करती है कि नौसेना के पश्चिमी और पूर्वी बेड़े निवारण का संकेत देने के लिए उत्तरी अरब सागर में जमा किए गए।

शुरुआती हफ़्तों पर समिति का अपना निष्कर्ष दो टूक है। उसने पाया कि घुसपैठ “भारत सरकार, सेना और ख़ुफ़िया एजेंसियों के लिए पूरी तरह और सर्वथा अचानक आई।”

तोलोलिंग, 1 जून से 12 जून की रात तक

तोलोलिंग और उसके पड़ोस की चोटी प्वाइंट 4590 द्रास सेक्टर और राजमार्ग के एक लंबे हिस्से पर हावी थीं। शहीद सैनिकों के स्मारक की वेबसाइट ऑनर पॉइंट (Honour Point) तोलोलिंग को नियंत्रण रेखा के पार पाकिस्तानी घुसपैठ की सबसे गहरी पैठ बताती है।

पीआईबी के 2025 के नोट में एक पहले प्रयास का ज़िक्र है, जिसमें भारी नुकसान हुआ। 1 जून को 18 ग्रेनेडियर्स के मेजर राजेश अधिकारी ने तोपख़ाने और छोटे हथियारों की गोलाबारी के बीच अपनी कंपनी को तोलोलिंग पर आगे बढ़ाया। उन्होंने खुले मैदान से गुज़रकर अपने जवानों से गोलीबारी हटाई और एक अहम बंकर को चुप कराया, फिर वे मारे गए। उन्हें मरणोपरांत दूसरा सबसे बड़ा पुरस्कार, महावीर चक्र, मिला।

मुख्य हमला 12 जून की रात हुआ। ऑनर पॉइंट के अनुसार, 2 राजपूताना राइफ़ल्स ने रात 8:30 बजे बटालियन का हमला शुरू किया, जिसे 13 जून को सुबह 6 बजे तक चोटी लेने का आदेश था, जबकि 18 ग्रेनेडियर्स की दो कंपनियाँ उनके पीछे मज़बूत आधार बनाए रहीं। मेजर विवेक गुप्ता की चार्ली कंपनी आगे थी, जब पहली सेक्शन के तीन जवान गोली खा गए और बढ़त रुक गई। प्रशस्ति-पत्र के अनुसार गुप्ता ने उस ठिकाने पर रॉकेट लॉन्चर दाग़ा और धावा बोल दिया। उन्हें दो गोलियाँ लगीं, उन्होंने आमने-सामने की लड़ाई में तीन रक्षकों को मार गिराया, और फिर कंपनी ने वह ठिकाना ले लिया। उन्हें दोबारा गोली लगी और वहीं उनकी मृत्यु हो गई, और उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र दिया गया।

कंवल के अनुसार तोलोलिंग पर कई हफ़्तों की लड़ाई के बाद 13 जून को क़ब्ज़ा हुआ।

राजमार्ग पर खड़ी बोफोर्स तोपें

तोलोलिंग पर रास्ता साफ़ करने वाली तोपें राष्ट्रीय राजमार्ग पर ही खड़ी थीं। रक्षा विश्लेषक गुरमीत कंवल ने 26 जुलाई 2019 को डेलीओ में लिखा कि 155 मिमी की बोफोर्स मध्यम तोपें और 105 मिमी की फ़ील्ड तोपें सीधे निशाने की भूमिका में दाग़ी गईं, यानी गनर उन बंकरों पर निशाना साधते थे जो उन्हें दिखाई देते थे, पहाड़ी के ऊपर से गोले बरसाने के बजाय। वे तोलोलिंग पर गोलाबारी में 100 से ज़्यादा तोपें, मोर्टार और रॉकेट लॉन्चर बताते हैं। टाइगर हिल पर वे 122 मिमी के ग्रैड रॉकेट लॉन्चर भी जोड़ते हैं, जो सीधे निशाने पर दाग़े गए।

सेना के आँकड़े, जो उत्तरी कमान के कर्नल एस. डी. गोस्वामी ने 26 जुलाई 2016 को डीएनए को दिए, बड़े हैं। तोपख़ाने ने युद्ध में 2,50,000 से ज़्यादा गोले, बम और रॉकेट दाग़े, यानी 300 तोपों, मोर्टारों और रॉकेट लॉन्चरों से रोज़ लगभग 5,000, और जिस दिन टाइगर हिल वापस लिया गया उस दिन लगभग 9,000। हर बैटरी ने 17 दिन तक प्रति मिनट एक से ज़्यादा गोला दाग़ा। यही रिपोर्ट 155 मिमी की एफ़एच 77-बी बोफोर्स को तोपख़ाने की रीढ़ कहती है, जिसकी मारक दूरी 30 किमी है, और कहती है कि सेवा में उसे शामिल किए जाने पर विवाद के बावजूद उसने अच्छा प्रदर्शन किया।

कंवल दर्ज करते हैं कि तोपख़ाने के तीन अधिकारी और 34 जवान मारे गए, और तीन तोपख़ाना रेजिमेंटों को थलसेना प्रमुख की यूनिट प्रशस्ति मिली। पीआईबी के अनुसार, 2023 में थलसेना ने प्वाइंट 5140, कैप्टन विक्रम बत्रा के पहले करगिल लक्ष्य, का नाम तोपख़ाना रेजिमेंटों के सम्मान में गन हिल रखा।

टाइगर हिल, 3 जुलाई की चढ़ाई

3 जुलाई को भारी गोलाबारी के बीच 18 ग्रेनेडियर्स की एक प्लाटून ने टाइगर हिल की बर्फ़ीली चट्टानी दीवार पर चढ़ना शुरू किया। पीआईबी के वृत्तांत के अनुसार ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव ने पहला बंकर नष्ट किया, जिससे प्लाटून और ऊपर चढ़ सकी, और कंधे और पेट में गोलियाँ लगने के बाद भी वे आगे बढ़ते रहे। राष्ट्रपति भवन में चित्र-दीर्घा परमवीर दीर्घा पर पीआईबी का बाद का नोट इस चढ़ाई की ऊँचाई लगभग 16,500 फ़ीट बताता है और कहता है कि उन्होंने चढ़ाई करने वाले दल का नेतृत्व स्वेच्छा से किया।

18 ग्रेनेडियर्स की कमान सँभालने वाले ब्रिगेडियर कुशल ठाकुर ने 2020 में ट्रिब्यून को याद करते हुए बताया कि लेफ्टिनेंट बलवान सिंह की घातक कमांडो प्लाटून का अचानक हमला, जिसमें हवलदार मदन और यादव भी थे, रास्ता खोलने वाला रहा, जबकि कैप्टन सचिन निंबालकर ने अपनी कंपनी का आगे से नेतृत्व किया और 8 सिख ने सहायता की। ट्रिब्यून तिरंगा फहराने की तारीख़ 4 जुलाई देता है। कंवल वापसी की तारीख़ 5 जुलाई बताते हैं, इसलिए अंतिम तारीख़ इस पर निर्भर करती है कि कौन-सा वृत्तांत माना जाए।

ट्रिब्यून उन दो लड़ाइयों में बटालियन के नुकसान इस तरह गिनाता है: उसके उप-कमांडर लेफ्टिनेंट कर्नल आर. विश्वनाथन, मेजर अधिकारी, दो जूनियर कमीशंड अधिकारी और 21 अन्य रैंक। बटालियन को 52 वीरता पुरस्कार मिले, जिनमें एक परमवीर चक्र, दो महावीर चक्र और छह वीर चक्र शामिल हैं।

ऑपरेशन सफ़ेद सागर

थलसेना ने 8 मई को हमलावर हेलिकॉप्टर माँगे थे, और सरकार ने उन्हें इस्तेमाल न करने का फ़ैसला किया, क्योंकि उनसे तनाव बढ़ने का ख़तरा था, यूएसआई का पत्र कहता है। 25 मई को मंत्रिमंडलीय समिति के फ़ैसले के बाद वायुसेना ने अगले दिन ऑपरेशन सफ़ेद सागर शुरू किया। पहला हमला 26 मई को सुबह 6:30 बजे उड़ा, जिसे मिग-21, मिग-27 और मिग-23 लड़ाकू विमानों ने अंजाम दिया, और मिग-29 उन्हें कवर दे रहे थे।

शुरुआती दिनों में विमानों का नुकसान हुआ। 27 मई को एक मिग-27 में यांत्रिक ख़राबी आई और उसके पायलट फ़्लाइट लेफ्टिनेंट के. नचिकेता ने इजेक्ट किया। स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा का मिग-21, जो उन्हें खोजते हुए चक्कर लगा रहा था, मार गिराया गया, और आहूजा को मरणोपरांत वीर चक्र मिला। 28 मई को एक एमआई-17 हेलिकॉप्टर खो गया। एयर वाइस मार्शल देव गणेश लिखते हैं कि इसके बाद सशस्त्र हेलिकॉप्टर हटा लिए गए और लड़ाकू विमानों ने स्टिंगर सतह-से-हवा मिसाइलों की पहुँच से बाहर बदली हुई उड़ान-रेखाओं पर उड़ानें भरीं।

दो तारीख़ें बदलाव को चिह्नित करती हैं। यूएसआई के वृत्तांत में, 16 और 17 जून को मिग-27 और मिराज 2000 ने मुंथो ढालो के रसद डिपो पर हमला किया। फ़िलिप कैंप के अनुसार, 24 जून को दो मिराज 2000 विमानों ने टाइगर हिल पर दुश्मन की बटालियन मुख्यालय पर पेववे लेज़र-निर्देशित बम गिराए, जो वायुसेना का ऐसे बम का पहला परिचालन इस्तेमाल था। देव गणेश एक सेना संदेश का हवाला देते हैं, जो उस हमले को पाँच पाकिस्तानी अधिकारियों की मौत का श्रेय देता है, और वे पहाड़ी के चार लक्ष्य-समूहों में से तीन पर हुए व्यवस्थित हमलों को टाइगर हिल के पतन का सीधा कारण कहते हैं। यह वायुसेना के एक अधिकारी का आकलन है, कोई सर्वमान्य निष्कर्ष नहीं।

हमले के अभियान 12 जुलाई को समाप्त हुए। यूएसआई का पत्र 550 हमलावर उड़ानें, 150 टोही उड़ानें, 500 से ज़्यादा एस्कॉर्ट उड़ानें और 2,185 हेलिकॉप्टर उड़ानें गिनता है। देव गणेश, 12 जुलाई तक गिनते हुए, लगभग 580 हमलावर उड़ानें और लगभग 2,500 हेलिकॉप्टर उड़ानें बताते हैं। यूएसआई इसे 15,000 फ़ीट से ऊँचे पहाड़ों में युद्धक वायुशक्ति का पहला इस्तेमाल कहता है।

चार परमवीर चक्र

पीआईबी द्वारा दिए गए चारों पुरस्कारों के सार, उसकी दी हुई तारीख़ों के साथ, इस प्रकार हैं।

1/11 गोरखा राइफ़ल्स के लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे ने बटालिक में खालुबार रिज को साफ़ किया। ऑनर पॉइंट हमले की तारीख़ 2 से 3 जुलाई की रात बताता है और कहता है कि प्रशस्ति-पत्र में उन्हें लेफ्टिनेंट लिखा गया है, जबकि पीआईबी और बाद के रिकॉर्ड उन्हें कैप्टन कहते हैं। पीआईबी के अनुसार उन्होंने दो बंकर नष्ट किए और कंधे और पैरों में घायल होने के बावजूद और ठिकानों पर डटे रहे। ऑनर पॉइंट जोड़ता है कि चौथा वही था जहाँ उन्हें घातक गोली लगी।

ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव की टाइगर हिल की चढ़ाई का वर्णन ऊपर है। ट्रिब्यून ने जनवरी 2000 में बताया कि वे 19 वर्ष के थे और उन्हें लगभग 15 गोलियाँ लगी थीं, एक गिनती जिसे अन्य वृत्तांत अलग तरह से देते हैं।

13 जेएके राइफ़ल्स के राइफ़लमैन संजय कुमार 4 जुलाई को मुश्कोह घाटी में एक समतल चोटी वाले ठिकाने के लिए अगुआ स्काउट थे। बंकर की गोलीबारी से घायल होने पर उन्होंने उसमें मौजूद लोगों से आमने-सामने लड़ाई की और तीन को मार गिराया, फिर उनकी छोड़ी हुई मशीन गन उठाकर भागते बाक़ी लोगों पर चला दी।

13 जेएके राइफ़ल्स के कैप्टन विक्रम बत्रा ने प्वाइंट 5140 और फिर 7 जुलाई को प्वाइंट 4875 लिया, जहाँ वे शहीद हुए। उनकी कहानी बत्रा और फ़िल्म शेरशाह पर लेख में है।

ट्रिब्यून ने 23 जनवरी 2000 को बताया कि चारों को गणतंत्र दिवस पर प्रदान किया जाएगा, जो एक दशक से अधिक समय में पहले परमवीर चक्र थे, जिससे कुल संख्या 17 से 21 हो गई। पहले के 17 में से पाँच 1947 और 1948 के पहले कश्मीर युद्ध के लिए थे। पूरी सूची पुरस्कार के डिज़ाइन पर लेख में है।

भारतीय मृतकों की गिनती

आधिकारिक सामग्री में तीन आँकड़े मिलते हैं। करगिल समीक्षा समिति ने, जब युद्ध ताज़ा था, 26 जुलाई 1999 तक 474 थलसेना और वायुसेना के मृतक और 1,109 घायल दर्ज किए। पीआईबी की 2020 की विज्ञप्ति 527 भारतीय सैनिकों की मौत बताती है। 2025 में थलसेना ने कहा कि वह 545 मृतकों के परिवारों से मिल चुकी है, एक समूह जिसे पीआईबी का नोट इस तरह बाँटता है: 537 थलसेना से, पाँच वायुसेना से, एक सीमा सुरक्षा बल से और दो नागरिक। पीआईबी का 2025 का नोट यह भी कहता है कि एक हज़ार से ज़्यादा घायल हुए।

यहाँ इस्तेमाल किया गया कोई आधिकारिक नोट यह नहीं समझाता कि 527 और 545 का आपस में क्या संबंध है। वही 2020 की विज्ञप्ति कहती है कि 1,042 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए, जो एक भारतीय दावा है। करगिल समीक्षा समिति कहती है कि पाकिस्तान का नुकसान भारत से भारी था। पीटीआई ने 18 नवंबर 2010 को बताया कि पाकिस्तानी सेना ने अपनी वेबसाइट पर 453 सैनिकों और अधिकारियों के नाम रखे थे।

समीक्षा और स्मारक

करगिल समीक्षा समिति में चार सदस्य थे: अध्यक्ष के. सुब्रह्मण्यम, लेफ्टिनेंट जनरल के. के. हज़ारी (सेवानिवृत्त), बी. जी. वर्गीज़ और सतीश चंद्र। उसका सार राष्ट्रीय सुरक्षा प्रबंधन, रक्षा मंत्रालय और सेवा मुख्यालयों के पुनर्गठन, एक एकीकृत रक्षा ख़ुफ़िया एजेंसी और एक पूर्णकालिक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की सिफ़ारिश करता है। वह नाम लेकर चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ की माँग नहीं करता।

सेंटर फ़ॉर लैंड वारफ़ेयर स्टडीज़ के आशु मान दर्ज करते हैं कि इसके बाद क्या हुआ। युद्ध के जल्द बाद एकीकृत रक्षा स्टाफ़ बना, राष्ट्रीय तकनीकी अनुसंधान संगठन और रक्षा ख़ुफ़िया एजेंसी की स्थापना हुई, और पहले चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ की नियुक्ति 2019 में हुई।

भारत हर साल 26 जुलाई को करगिल विजय दिवस के रूप में मनाता है। 2025 में 26वें आयोजन पर द्रास के करगिल युद्ध स्मारक में 545 दीपक जलाए गए, ऑपरेशन विजय में मारे गए हर सैनिक के लिए एक।

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स्रोत और आगे पढ़ने के लिए

  1. Press Information Bureau, 25 July 2025: Kargil Vijay Diwas 2025, Honouring 26 Years of Valour and Victory
  2. Press Information Bureau, 26 July 2025: Indian Army commemorates 26th anniversary of Kargil Vijay Diwas
  3. Press Information Bureau, 26 July 2020: Kargil Vijay Diwas celebrations at Pune
  4. Press Information Bureau, 21 December 2025: A Gallery of Eternal Courage, Inauguration of Param Vir Dirgha at Rashtrapati Bhavan
  5. Kargil Review Committee, From Surprise to Reckoning: executive summary of the report, 25 February 2000 (hosted copy)
  6. United Service Institution of India: Role of the Indian Air Force During the Kargil War (Nutan Singh, 2024)
  7. Bharat Rakshak: Operation Safed Sagar, Air Vice Marshal Dev Ganesh, 15 October 2009
  8. Bharat Rakshak: The Mirage 2000 in Kargil, Phillip Camp, 15 October 2009
  9. Gurmeet Kanwal, DailyO, 26 July 2019: Shooting Fire in Kargil, the artillery in the 1999 war
  10. DNA, 26 July 2016: Indian Army fired 2.5 lakh shells to bomb enemy positions in Kargil war
  11. The Tribune, 23 January 2000: Four Armymen to get Param Vir Chakra (UNI)
  12. The Tribune, 4 July 2020: 21 years on, Kargil veteran recalls Tiger Hill's capture
  13. Honour Point: Major Vivek Gupta, Maha Vir Chakra, 2 Rajputana Rifles, with the text of the citation
  14. Honour Point: Captain Manoj Kumar Pandey, Param Vir Chakra, 1/11 Gorkha Rifles, with the text of the citation
  15. Centre for Land Warfare Studies: 26 Years Since Kargil, How a Crisis Fueled India's Comprehensive Military Transformation (Ashu Maan, 21 July 2025)
  16. Press Trust of India via Deccan Herald, 18 November 2010: Pak Army quietly names 453 soldiers killed in Kargil War

यह लेख AI उपकरणों की सहायता से शोधित और लिखा गया है, और सटीकता के लिए संपादित किया गया है। यह केवल सामान्य जानकारी और चर्चा के लिए है, पेशेवर सलाह नहीं। हमारे संपादकीय मानक और अस्वीकरण देखें। कोई त्रुटि मिली? हमें बताएँ।

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