Skip to content
रामनगर की रामलीला पूरे कस्बे में बिना माइक्रोफ़ोन 31 शामों तक रामायण खेलती है, और यूनेस्को उसे भारत की सबसे प्रतिनिधि रामलीलाओं में गिनता है
इतिहास-पुराण और आस्था

रामनगर की रामलीला पूरे कस्बे में बिना माइक्रोफ़ोन 31 शामों तक रामायण खेलती है, और यूनेस्को उसे भारत की सबसे प्रतिनिधि रामलीलाओं में गिनता है

फ़ोटो: Rosehubwiki, Kuber Patel / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0 (क्रॉप किया गया)

हिन्दी

हर साल अनंत चतुर्दशी से गंगा पार वाराणसी के सामने बसा रामनगर कस्बा लगभग एक महीने के लिए अयोध्या, जनकपुर, चित्रकूट, पंचवटी और लंका बन जाता है। दर्शक एक स्थल से दूसरे स्थल तक पैदल चलते हैं, दीपक रोशनी देते हैं, और हर प्रदर्शन में रामचरितमानस का पाठ होता है। यूनेस्को ने 2008 में रामलीला को सूचीबद्ध किया और रामनगर को उसके सबसे प्रतिनिधि केंद्रों में गिना।

· · 8 मिनट का पठन

रामनगर, गंगा के पूर्वी तट पर वाराणसी के सामने बसा कस्बा, हर शरद में लगभग 31 शामों के प्रसंगों में पूरी रामायण खेलता है, जिसमें कस्बे के अलग-अलग स्थल अयोध्या, जनकपुर, चित्रकूट, पंचवटी और लंका बनते हैं। यूनेस्को ने 2005 में पहले उसकी उद्घोषणा करने के बाद 2008 में रामलीला, यानी “राम का खेल”, को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की अपनी प्रतिनिधि सूची में दर्ज किया, और उसकी प्रविष्टि रामनगर और बनारस को उत्तर भारत की सबसे प्रतिनिधि रामलीलाओं में गिनती है। नवभारत लाइव ने बताया कि 2026 का सत्र 25 सितंबर को, अनंत चतुर्दशी के दिन, शुरू हुआ, जिस दिन से यह चक्र परंपरागत रूप से आरंभ होता है।

यूनेस्को की सूची में क्या है, और उसमें रामनगर कहाँ है

यूनेस्को की प्रविष्टि रामलीला को दृश्यों की एक शृंखला में रामायण की प्रस्तुति बताती है, जिसमें गीत, कथन, पाठ और संवाद शामिल हैं, और जो दशहरे के पर्व पर पूरे उत्तर भारत में खेली जाती है। वह कहती है कि सबसे प्रतिनिधि रामलीलाएँ अयोध्या, रामनगर और बनारस, वृंदावन, अल्मोड़ा, सतना और मधुबनी की हैं। संस्कृति मंत्रालय का 2021 का भारत की अमूर्त विरासत पर परिचय-पत्र यही वर्णन दोहराता है और रामलीला को देश के सूचीबद्ध तत्वों में गिनता है।

प्रविष्टि के अनुसार प्रस्तुति रामचरितमानस पर टिकी है, रामायण का वह हिंदी रूप जिसे तुलसीदास ने सोलहवीं सदी में रचा ताकि संस्कृत महाकाव्य सब तक पहुँच सके। यूनेस्को के अनुसार ज़्यादातर रामलीलाएँ दस से बारह दिन चलती हैं, पर कुछ, जैसे रामनगर की, पूरे एक महीने चल सकती हैं। वह जोड़ता है कि रामलीला पूरी आबादी को “जाति, धर्म या आयु के भेद के बिना” एक साथ लाती है। काव्य और उसके रचयिता के लिए देखें तुलसीदास और रामचरितमानस; महाकाव्य के लिए, रामायण क्या है।

महाकाव्य का नक्शा बन जाने वाला कस्बा

कोई एक मंच नहीं है। पर्यटन मंत्रालय का पोर्टल इन्क्रेडिबल इंडिया कहता है कि जैसे-जैसे कथा अध्याय दर अध्याय आगे बढ़ती है, रामनगर अयोध्या, जनकपुर, चित्रकूट, पंचवटी और लंका बन जाता है, और भक्त रामचरितमानस की अपनी-अपनी प्रतियाँ लिए कलाकारों के साथ-साथ चलते हैं।

पैमाना अलग-अलग रिपोर्टर अलग-अलग बताते हैं। हिंदुस्तान टाइम्स का अक्टूबर 2013 का एक फ़ीचर कहता है कि पाँच किलोमीटर के दायरे में स्थायी ढाँचे और कस्बे के हिस्से महाकाव्य के नाम धारण करते हैं, और कई दिन कलाकार, काशी नरेश (बनारस के पूर्व राजघराने के प्रमुख) और दर्शक सब साथ चलते हैं, कभी-कभी एक किलोमीटर से ज़्यादा। नवभारत लाइव अपनी 25 सितंबर 2026 की रिपोर्ट में खुले स्थलों की संख्या लगभग 40 बताता है, जो रामनगर के आसपास लगभग 5 से 10 किलोमीटर में फैले हैं। 2013 का फ़ीचर कहता है कि अकेली लंका एक बड़ा भूखंड है, जिसके एक सिरे पर रावण का दरबार, दूसरे पर राम का शिविर और एक कोने में अशोक वाटिका है।

रिचर्ड शेक्नर, अमेरिकी प्रदर्शन-विद्वान जिन्होंने 1976 से रामलीला का अध्ययन किया, ने 2000 में न्यूयॉर्क टाइम्स में लिखा कि कस्बा हिमालय से श्रीलंका तक उपमहाद्वीप का जीवित नमूना बन जाता है। कुर्सियाँ नहीं हैं। लोग ज़मीन पर बैठते हैं, दीवारों और छतों पर खड़े होते हैं, और राम के मार्ग पर पैदल चलते हैं। एक दृश्य के लिए मंच स्वयं महाराजा का महल, रामनगर क़िला, होता है।

दीये, आवाज़ें और वह काव्य जो संस्कृत में कभी नहीं बोला जाता

इन्क्रेडिबल इंडिया कहता है कि प्रस्तुतियाँ पारंपरिक हैं और आधुनिक रंगमंचीय प्रभावों से बहुत हद तक मुक्त हैं। शेक्नर बिना माइक्रोफ़ोन के और मिट्टी के तेल की लालटेनों और मशालों की रोशनी की बात बताते हैं। वे जोड़ते हैं कि 1940 के दशक में एक बार माइक्रोफ़ोन आज़माए गए थे और नाराज़ दर्शकों ने उन्हें तोड़ डाला। नवभारत लाइव 2026 में वही चलन बताता है: मशालें और पेट्रोमैक्स की बत्तियाँ, सुनाई देने के लिए आवाज़ ऊँची करते कलाकार, और खुले मैदान में खड़े या बैठे दर्शक।

शब्द रामचरितमानस का अनुसरण करते हैं। शेक्नर लिखते हैं कि हर रात बारह पुरुष महाराजा के पास एक घेरे में बैठकर पूरा काव्य गाते हैं, और संस्कृत मूल कभी नहीं बोला जाता। वे कहते हैं कि उन्नीसवीं सदी के मध्य तक कलाकार क्रिया को केवल अभिनय से दिखाते थे। फिर महाराजा ईश्वरी प्रसाद नारायण सिंह ने कवियों और विद्वानों से रोज़मर्रा की हिंदी में संवाद लिखवाए, जिन्हें अब अभिनेता पूरी आवाज़ में बोलते हैं। कर्ण मदोक, द चक्कर के लिए एक फ़ोटो-निबंध में, एक व्यास का वर्णन करते हैं, यानी प्रस्तुति के संयोजक का, जो भीड़ को शांत रहने को कहता है और एक कॉपी से कलाकारों को संवाद पकड़ाता है, जबकि विद्वान काव्य की अपनी प्रतियों में साथ-साथ पढ़ते चलते हैं।

फ़िलिप लुटगेंडॉर्फ़, जिनके बनारस के क्षेत्र-कार्य से द लाइफ़ ऑफ़ अ टेक्स्ट निकली, लिखते हैं कि रामचरितमानस अपने अधिकांशतः निरक्षर श्रोताओं तक हमेशा मुख्यतः मौखिक प्रस्तुति के ज़रिये पहुँचा है, जिसमें औपचारिक पाठ, लोकगायन, मौखिक व्याख्या और रंगमंच शामिल हैं।

वे बालक जो एक महीने के लिए देवता हैं

2013 का हिंदुस्तान टाइम्स फ़ीचर कहता है कि चक्र लंका के राजा रावण के जन्म से खुलता है और राम के राज्याभिषेक के बाद उनकी शिक्षाओं पर एक प्रसंग से समाप्त होता है। बीच में राम का जन्म और विवाह, वनवास, सीता का हरण और रावण पर राम की विजय आते हैं।

शेक्नर बताते हैं कि पाँच सबसे पवित्र भूमिकाएँ, राम, उनके तीन भाई और सीता, लगभग 8 से 13 वर्ष के बालक निभाते हैं, जिनकी आवाज़ अभी बदली नहीं होती। वे लिखते हैं कि माना जाता है कि ये बच्चे, जो अभी निष्कलंक हैं, देवताओं को धारण करने के योग्य एकमात्र लोग हैं। वे “एक महीने के देवता” हैं, उनके उद्धृत शब्दों में, और लोग उनके चरण छूते हैं और दर्शन करते हैं, यानी दिव्य को निहारने का कर्म। अन्य भूमिकाएँ परिवारों में चलती हैं। 2000 में रावण की भूमिका कौशल पति पाठक ने निभाई, लगभग आठ मील दूर रहने वाले एक किसान ने। 1976 में जब शेक्नर ने पहली बार रामलीला देखी थी, तब कौशल के बड़े भाई ने यह भूमिका अपने पिता के साथ बाँटी थी।

द चक्कर का लेख जोड़ता है कि पर्दे के पीछे भी यही बात है। उसके लेखक आयोजन समिति के एक सदस्य से मिले जिनके पिता व्यास रहे थे, जैसे उनके दादा और परदादा रहे थे।

वे शामें जो भीड़ खींचती हैं

शेक्नर दर्शकों की संख्या कुछ प्रसंगों के लिए कुछ हज़ार और कुछ के लिए 1,00,000 तक बताते हैं। 2013 का फ़ीचर भारी भीड़ वाली शामों के रूप में राम-सीता विवाह, दशहरा, भरत मिलाप (भाइयों का मिलन) और राज्याभिषेक के नाम लेता है, जो शेक्नर के अनुसार भोर तक चलता है।

दशहरे पर, आश्विन महीने के दसवें दिन, महाराजा पहले शस्त्रों और घोड़ों की पूजा करते हैं, फिर हाथी पर सवार होकर क़िले से लंका के मैदान तक जुलूस में आते हैं और युद्ध से पहले हट जाते हैं। “एक राजा के लिए दूसरे राजा की मृत्यु देखना उचित नहीं है,” शेक्नर के उद्धरण में उन्होंने कहा। शेक्नर के वर्णन में रावण राम के चरण छूकर समर्पण करता है, और रावण का विशाल पुतला रात लगभग दस बजे जलाया जाता है, रंग-निर्देशक अनुराधा कपूर के उस विवरण के अनुसार जिसे शेक्नर उद्धृत करते हैं। 2013 का फ़ीचर पुतले की ऊँचाई 60 फ़ुट बताता है।

आरंभ कब हुआ: विवरण सहमत नहीं हैं

हर स्रोत आरंभ को काशी नरेश के दरबार में रखता है, और कोई स्थापना-दस्तावेज़ नहीं देता। इन्क्रेडिबल इंडिया का पृष्ठ केवल इतना कहता है कि माना जाता है कि उन्नीसवीं सदी के आरंभ में रामलीला को काशी नरेश का संरक्षण मिला। शेक्नर भी 1800 के दशक के आरंभ की बात लिखते हैं।

2013 का हिंदुस्तान टाइम्स फ़ीचर महाराजा उदित नारायण सिंह का नाम लेता है और वह कथा देता है जो तब काशी नरेश के निजी सचिव और रामलीला की आयोजन संस्था के प्रमुख जय प्रकाश पाठक ने सुनाई: महाराजा छोटा मिर्ज़ापुर में व्यापारियों की आयोजित रामलीला देखने गए, उसके समाप्त हो जाने के बाद पहुँचे, और उनकी पत्नी ने सुझाया कि वे रामनगर में एक शुरू करें। वही फ़ीचर परंपरा को लगभग 200 वर्ष पुरानी कहता है।

अन्य गणनाएँ और लंबी हैं। सितंबर 2021 का हिंदुस्तान टाइम्स 238 वर्षों की अवधि का ज़िक्र करता है। एक आयोजक परिवार के सदस्य ने द चक्कर से कहा कि रामलीला “कम से कम 250 वर्षों” से चल रही है, और उसी लेख में कहा गया है कि काशी नरेश बलवंत नारायण सिंह ने इसे क़िले के भीतर शुरू किया बताया जाता है, इसके बाद उनके उत्तराधिकारी इसे कस्बे के लोगों तक ले आए। ये स्थानीय और अख़बारी आँकड़े हैं, अभिलेखीय खोजें नहीं।

संरक्षण, दो छूटे साल और उस पर दबाव

शेक्नर का तर्क है कि बनारस के महाराजाओं ने अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी में, जब उनकी सैन्य और आर्थिक शक्ति घट रही थी, अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक हैसियत बनाए रखने के लिए रामलीला का उपयोग किया, और रियासत के भारत में विलय के बाद भी संरक्षण जारी रहा। द चक्कर के अनुसार काशी नरेश की उपस्थिति के बिना रामलीला आरंभ नहीं हो सकती।

रामलीला 2020 और 2021 में नहीं खेली गई। सितंबर 2021 में हिंदुस्तान टाइम्स ने बताया कि राजपरिवार ने कोविड-19 के कारण उसे दूसरी बार स्थगित किया है, और यह 238 वर्षों की अवधि में दूसरी बार रद्द होना था। राजपरिवार के कुँवर अनंत नारायण सिंह ने यह निर्णय वाराणसी के पुलिस आयुक्त को पत्र लिखकर बताया। द चक्कर का फ़ोटो-निबंध, जो विराम के बाद लिखा गया, चक्र को फिर चलता बताता है।

यूनेस्को की अपनी प्रविष्टि एक व्यापक चिंता दर्ज करती है: वह कहती है कि टेलीविज़न धारावाहिक रामलीला के दर्शक घटा रहे हैं और उस भूमिका को कमज़ोर कर रहे हैं जो समुदायों को जोड़ती है। 2000 में लिखते हुए शेक्नर ने व्यावहारिक तनाव गिनाए, जिनमें चक्र का प्रतिभागियों से माँगा गया एक महीने का खाली समय, घटती खुली ज़मीन और युवा अभिनेताओं को ढूँढ़ने की कठिनाई शामिल हैं। उन्होंने तब लागू भूमिका-नियम भी दर्ज किए: लगभग सभी अभिनेता ब्राह्मण पुरुष और बालक थे, अपवादों में एक नाविक और बंदर तथा राक्षस सेनाएँ बनने वाले छोटे बालक थे। नवभारत लाइव ने 25 सितंबर 2026 को बताया कि सत्र एक महीना चलेगा और राम के राज्याभिषेक के साथ समाप्त होगा।

Share
Copied!

स्रोत और आगे पढ़ने के लिए

  1. UNESCO Intangible Cultural Heritage: Ramlila, the traditional performance of the Ramayana (nomination file 00110, inscribed 2008)
  2. Press Information Bureau, Ministry of Culture backgrounder: Intangible Cultural Heritage of India (20 January 2021)
  3. Incredible India (Ministry of Tourism): The Ramlila of Ramnagar in Varanasi
  4. Richard Schechner, A Maharajah's Festival for Body and Soul, New York Times, 26 November 2000 (reprint)
  5. Hinduism Today (Hindu Press International), 16 November 2013, from Hindustan Times, 24 October 2013: A Look At The Grandest Ramlila In The World
  6. Hinduism Today (Hindu Press International), 19 September 2021, from Hindustan Times, 16 September 2021: For Second Consecutive Year, Varanasi's Historic Ramlila Cancelled Due to Covid-19
  7. The Chakkar, Karan Madhok: In Ramnagar, the Folk Theatre of the Ramlila Continues its Centuries-Old Traditions
  8. Navbharat Live, 25 September 2026: Ramnagar Ramlila begins on Anant Chaturdashi (in Hindi)
  9. Seagull Books via the Centre for Performance Research: Anuradha Kapur, Actors, Pilgrims, Kings and Gods: The Ramlila at Ramnagar
  10. University of California Press: Philip Lutgendorf, The Life of a Text: Performing the Ramcaritmanas of Tulsidas (1991)

यह लेख AI उपकरणों की सहायता से शोधित और लिखा गया है, और सटीकता के लिए संपादित किया गया है। यह केवल सामान्य जानकारी और चर्चा के लिए है, पेशेवर सलाह नहीं। हमारे संपादकीय मानक और अस्वीकरण देखें। कोई त्रुटि मिली? हमें बताएँ।

#ramlila#ramnagar#varanasi#ramcharitmanas#unesco intangible heritage#dussehra#kashi naresh

अच्छा लगा? अगला लेख पाएँ।

एक बार में एक अच्छा लेख, सीधे आपके इनबॉक्स में। कोई स्पैम नहीं, जब चाहें अनसब्सक्राइब करें।

इसी श्रेणी में और: इतिहास-पुराण और आस्था
तुलसीदास ने रामचरितमानस अवधी में रामनवमी 1574 को शुरू किया, और गीता प्रेस उनकी रचनाओं की 10.8 करोड़ से अधिक प्रतियाँ छाप चुका है
उन्होंने कहा कि यह कथा उन्होंने छोटे बच्चे के रूप में पहली बार अपने गुरु से सुनी, फिर उसे गली की बोली में लिख दिया। चार सदी से ज़्यादा बाद भी रामनगर इसे 31 रातों में खेलता है, और गांधी ने इसे भक्ति-ग्रंथों में पहला स्थान दिया।
गुजरात का गरबा दिसंबर 2023 में यूनेस्को की अमूर्त विरासत सूची में भारत का 15वाँ तत्त्व बना, और वडोदरा ने उसके बाद एक साथ 46,000 से ज़्यादा लोगों के साथ उसे नाचा
आँगन में छेदों वाले मिट्टी के घड़े से लेकर 46,000 से ज़्यादा नर्तकों को समेटने वाले मैदान तक: यूनेस्को का फ़ैसला क्या दर्ज करता है, घड़े और शब्द के बारे में विद्वान क्या जोड़ते हैं, और पोशाकें कौन बनाता है।
नासिक-त्र्यंबकेश्वर 31 अक्टूबर 2026 को सिंहस्थ का ध्वज फहराएगा, हरिद्वार का कुंभ 14 जनवरी 2027 को और उज्जैन का 27 मार्च 2028 को खुलेगा, प्रयागराज के बाद के अगले तीन कुंभ मेले
तीन राज्य सरकारों ने उस उत्सव के कैलेंडर तय कर दिए हैं जिसे यूनेस्को ने 2017 में सूचीबद्ध किया था। चक्र, स्थलों, नासिक की क़ानूनी संस्था और हरिद्वार तथा उज्जैन की तैयारियों की एक गाइड।
← सभी लेख