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ब्रह्मोस मिसाइल पहली बार 12 जून 2001 को दागी गई, लगभग 2.8 मैक की रफ़्तार से बताई गई 290 किमी की दूरी तय करती है, जहाज़ों, ज़मीनी लॉन्चरों, विमानों और पनडुब्बियों के लिए बनी है, और अब तीन देशों से उसके निर्यात अनुबंध हैं
युद्ध और शौर्य

ब्रह्मोस मिसाइल पहली बार 12 जून 2001 को दागी गई, लगभग 2.8 मैक की रफ़्तार से बताई गई 290 किमी की दूरी तय करती है, जहाज़ों, ज़मीनी लॉन्चरों, विमानों और पनडुब्बियों के लिए बनी है, और अब तीन देशों से उसके निर्यात अनुबंध हैं

चित्रण: tuput

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ब्रह्मोस को जन्म देने वाला समझौता भारत और रूस ने 12 फ़रवरी 1998 को मॉस्को में किया, और पहली मिसाइल 12 जून 2001 को ओडिशा के चांदीपुर के तट से दागी गई। कंपनी मानक मिसाइल की क्रूज़ गति लगभग 2.8 मैक और मार 290 किमी तक बताती है, और उसके संस्करण जहाज़ों, ज़मीन, विमानों और पनडुब्बियों के लिए हैं। पहला निर्यात अनुबंध फ़िलीपींस ने 28 जनवरी 2022 को किया।

· · 9 मिनट का पठन

ब्रह्मोस को जन्म देने वाला समझौता भारत और रूस ने 12 फ़रवरी 1998 को मॉस्को में किया, और पहला ब्रह्मोस 12 जून 2001 को ओडिशा के चांदीपुर के तट से एक लॉन्चर से दागा गया। उस संयुक्त उपक्रम से जो निकला, वह दो चरणों वाली सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल है, जिसके बारे में बनाने वाले कहते हैं कि वह लगभग 2.8 मैक (ध्वनि की रफ़्तार से तीन गुना के क़रीब) की गति से चलती है और 290 किमी तक मार करती है। ब्रह्मोस एयरोस्पेस उसे भारतीय थलसेना, नौसेना और वायुसेना में सेवा में बताता है।

ब्रह्मोस एयरोस्पेस इसे निर्यात अनुबंध पाने वाला भारत का पहला पूर्ण पैमाने का हथियार कहता है। फ़िलीपींस ने जनवरी 2022 में अनुबंध किया, और जुलाई 2026 तक वियतनाम और इंडोनेशिया भी हस्ताक्षर कर चुके थे।

1998 का समझौता, जो मॉस्को में हुआ

कंपनी का अपना इतिहास खाड़ी युद्ध से शुरू होता है। वह कहती है कि 1990 के दशक की शुरुआत में उस युद्ध के बाद भारत को अपनी सशस्त्र सेनाओं के लिए क्रूज़ मिसाइल प्रणाली की ज़रूरत बढ़ती महसूस हुई, और रूस के साथ उसकी पुरानी दोस्ती ने रास्ता दिया। 12 फ़रवरी 1998 को ए. पी. जे. अब्दुल कलाम ने, जो तब रक्षा अनुसंधान और विकास विभाग के सचिव थे, भारत की ओर से मॉस्को में एक अंतर-सरकारी समझौते पर हस्ताक्षर किए। रूस की ओर से रूस के पहले उप रक्षा मंत्री एन. वी. मिखाइलोव ने हस्ताक्षर किए।

इस समझौते से ब्रह्मोस एयरोस्पेस बना, जो भारत के रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) और रूस की NPO मशीनोस्त्रोयेनिया का संयुक्त उपक्रम है, जिसे आमतौर पर NPOM कहा जाता है। नाम ब्रह्मपुत्र और मोस्क्वा नदियों को जोड़ता है। कंपनी के अनुसार उपक्रम में भारत की हिस्सेदारी 50.5 प्रतिशत और रूस की 49.5 प्रतिशत है। दोनों सरकारों ने 7 फ़रवरी 2014 को समझौते को अनिश्चित काल के लिए बढ़ाने पर सहमति दी।

दोनों पक्ष क्या लाए

कंपनी बँटवारे को सीधे शब्दों में बताती है। DRDO पहले ही जड़त्वीय नौवहन प्रणालियाँ (जो मिसाइल को उसकी अपनी गति नापकर दिशा देती हैं), मिशन सॉफ़्टवेयर, और पृथ्वी तथा अग्नि मिसाइलों के लिए चलित लॉन्चर बना चुका था। NPOM के पास रैमजेट इंजनों की विशेषज्ञता थी, और साथ में अंतरिक्ष प्रणालियों, प्रक्षेपण यानों और क्रूज़ मिसाइलों की तकनीकें थीं।

रैमजेट ईंधन को उस हवा में जलाता है जिसे मिसाइल की अपनी रफ़्तार इंजन में दबाकर भर देती है, इसलिए उसे चलना शुरू करने के लिए बूस्टर चाहिए। ब्रह्मोस एयरोस्पेस ठीक यही बनावट बताता है। ठोस ईंधन वाला एक बूस्टर मिसाइल को सुपरसोनिक गति तक पहुँचाकर अलग हो जाता है, और तरल ईंधन वाला रैमजेट उसे 2.8 मैक के क़रीब की गति से आगे ले जाता है।

पिल्लै और पहला प्रक्षेपण

उपक्रम के संस्थापक मुख्य कार्यकारी अधिकारी और प्रबंध निदेशक ए. शिवथानु पिल्लै थे। ब्रह्मोस एयरोस्पेस की उनकी रूपरेखा के अनुसार वे 1986 में DRDO से जुड़े और कलाम के अधीन समेकित निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (IGMDP) के कार्यक्रम निदेशक बने, जिसे 1983 में देश के भीतर मिसाइलों की एक शृंखला बनाने के लिए मंज़ूर किया गया था। उसमें यह भी जोड़ा गया है कि वे इससे पहले ISRO में SLV-3 उपग्रह प्रक्षेपण यान परियोजना की मूल टीम के सदस्य रहे थे, और उन्होंने ब्रह्मोस संयुक्त उपक्रम की अवधारणा विकसित की। 12 जून 2023 की एक कंपनी विज्ञप्ति उन्हें पद्म भूषण डॉ. ए. एस. पिल्लै लिखती है।

पहला सफल प्रक्षेपण 12 जून 2001 को हुआ। मिसाइल ओडिशा में चांदीपुर के तट के पास एक स्थिर खड़े लॉन्चर से दागी गई। कंपनी के इतिहास के अनुसार उसके बाद उपक्रम रक्षा प्रदर्शनियों में दिखने लगा, और 2001 में मॉस्को के MAKS एयर शो में ब्रह्मोस दिखाई गई, जो उसका पहला अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शन था।

12 जून 2023 को एक कंपनी कार्यक्रम में, उस प्रक्षेपण की 22वीं वर्षगाँठ पर, पिल्लै ने उपक्रम के तरीक़े को कंपनी की दर्ज की हुई उनकी बात के अनुसार इस तरह बताया: “हमने किसी चुनौती को कभी ‘ना’ नहीं कहा।”

बनाने वालों के प्रकाशित आँकड़े

अपने मिसाइल पृष्ठ पर ब्रह्मोस एयरोस्पेस मानक मिसाइल की क्रूज़ गति 2.8 मैक के क़रीब और उड़ान की मार 290 किमी तक बताता है, पूरे रास्ते सुपरसोनिक। वह 200 किग्रा तक का पारंपरिक वारहेड ले जाती है। मिसाइल 15 किमी की ऊँचाई तक क्रूज़ कर सकती है और उड़ान के अंत में केवल 5 मीटर तक नीचे आ सकती है। यह “दागो और भूल जाओ” सिद्धांत पर काम करती है, यानी दागे जाने के बाद वह अपना रास्ता ख़ुद तय करती है और उसे दिशा देने के लिए किसी संचालक की ज़रूरत नहीं पड़ती।

कंपनी इस मिसाइल की तुलना सबसोनिक क्रूज़ मिसाइलों से करती है और तीन गुना वेग, 2.5 से 3 गुना मार और नौ गुना गतिज ऊर्जा का दावा करती है। ये निर्माता के आँकड़े हैं। पृष्ठ यह भी कहता है कि मिसाइल की बनावट ज़मीन, समुद्र और समुद्र के भीतर के मंचों के लिए एक जैसी है, और उसे एक कनस्तर में रखा और दागा जाता है, जो प्रक्षेपण नली का काम भी करता है।

एक मिसाइल, दागने के चार तरीक़े

कंपनी के अनुसार नौसेना 2005 से ब्रह्मोस तैनात करती आई है। उसका जहाज़-आधारित पृष्ठ मिसाइल को भारतीय विध्वंसकों और फ़्रिगेटों पर “प्रमुख प्रहारक हथियार” बताता है, जो ऊर्ध्वाधर या झुके हुए लॉन्चर से दागी जाती है, और कहता है कि अलग-अलग प्रक्षेप-पथों पर तेज़ी से एक के बाद एक बौछार दागी जा सकती है।

ज़मीन पर, ANI ने अप्रैल 2024 में बताया कि भारतीय थलसेना के शस्त्रागार में 2007 से ब्रह्मोस की कई रेजिमेंटें हैं।

हवा से दागा जाने वाला संस्करण वायुसेना के सुखोई-30MKI लड़ाकू विमान के लिए बनाया गया। कंपनी कहती है कि 2016 में एकीकरण के लिए मंज़ूर हुआ हवाई लॉन्चर भारत में ही डिज़ाइन और विकसित किया गया, कि हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने एयरो इंडिया 2015 में एक संशोधित Su-30MKI सौंपा, और लॉन्चर के साथ पहली प्रदर्शन उड़ान 25 जून 2016 को हुई। लड़ाकू विमान से पहली जीवित फ़ायरिंग 22 नवंबर 2017 को बंगाल की खाड़ी में एक समुद्री लक्ष्य पर हुई। मिसाइल को विमान के धड़ से छोड़ा गया, और फिर उसके इंजन जल उठे। कंपनी जोड़ती है कि 2019 की फ़ायरिंग ने लंबी स्टैंड-ऑफ़ दूरियों से ज़मीनी हमले और जहाज़-रोधी प्रहार की पुष्टि की, और इसे Su-30 को लैस करने वाला सबसे भारी और सबसे शक्तिशाली हथियार कहती है।

पनडुब्बियों के लिए कंपनी 20 मार्च 2013 के एक परीक्षण का ज़िक्र करती है, जब ब्रह्मोस का एक संस्करण विशाखापट्टनम के तट के पास पानी में डूबे एक मंच से सीधा ऊपर उठा और अपनी पूरी 290 किमी की दूरी उड़ा। वह कहती है कि उस फ़ायरिंग ने पनडुब्बियों में लगाए जाने के लिए मिसाइल की तैयारी की पुष्टि की।

ज़्यादा मार: विस्तारित मार वाले परीक्षण

11 मार्च 2017 को चांदीपुर की एकीकृत परीक्षण रेंज से एक विस्तारित मार वाला ब्रह्मोस एक चलित स्वायत्त लॉन्चर से दागा गया, यानी उस सड़क वाहन से जो ज़मीनी संस्करण को ढोता और दागता है। कंपनी की विज्ञप्ति ने कहा कि मिसाइल ने अपने मिशन के मानदंड पूरे किए और 2.8 मैक की गति पर 290 किमी से काफ़ी ज़्यादा मार दिखाई। तब कंपनी के CEO और प्रबंध निदेशक सुधीर मिश्रा ने कहा कि सेनाएँ अब “400 किमी से कहीं दूर के दुश्मन के लक्ष्य गिरा” सकती हैं। विज्ञप्ति ने ब्रह्मोस की मार पर लगी सीमा हटने का श्रेय भारत की मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था (Missile Technology Control Regime) की पूर्ण सदस्यता को दिया, जो मिसाइलों के निर्यात पर रोक लगाने वाले देशों का एक समूह है।

रक्षा मंत्रालय ने 2022 में विस्तारित मार की दो और फ़ायरिंग दर्ज कीं। 5 मार्च को विध्वंसक INS चेन्नई ने विस्तारित मार वाली ज़मीनी हमले की ब्रह्मोस दागी, और मंत्रालय ने कहा कि विस्तारित प्रक्षेप-पथ और जटिल पैंतरों के बाद उसने अपने लक्ष्य को सटीकता से भेदा। 12 मई को वायुसेना ने Su-30MKI से विस्तारित मार वाले संस्करण का पहला प्रक्षेपण किया और मिसाइल ने बंगाल की खाड़ी में अपने तय लक्ष्य को भेदा। किसी भी विज्ञप्ति में मार का आँकड़ा नहीं दिया गया, इसलिए लंबे संस्करण की मंत्रालय की आधिकारिक मार अप्रकाशित है।

कार्यक्रम को दर्ज रूप में एक झटका भी लगा है। 14 जुलाई 2021 को CSIS मिसाइल थ्रेट परियोजना ने बताया कि 12 जुलाई को दागी गई एक विस्तारित मार वाली ब्रह्मोस प्रक्षेपण के कुछ ही देर बाद विफल हो गई, और रक्षा उद्योग के सूत्रों ने प्रणोदन की ख़राबी की ओर इशारा किया। रिपोर्ट इकोनॉमिक टाइम्स और शेफ़र्ड न्यूज़ का हवाला देती है और उसमें कोई आधिकारिक बयान नहीं है।

देश में ऑर्डर

1 मार्च 2024 को रक्षा मंत्रालय ने नौसेना की युद्धक और प्रशिक्षण ज़रूरतों के लिए ब्रह्मोस मिसाइलों के वास्ते ब्रह्मोस एयरोस्पेस के साथ ₹19,518.65 करोड़ का अनुबंध किया, PTI ने बताया। जहाज़ पर लगने वाली प्रणाली के लिए ₹988 करोड़ का एक अलग अनुबंध था। दोनों उस दिन हुए ₹39,125 करोड़ के पाँच अनुबंधों में शामिल थे।

DRDO ने 15 जून 2026 को एक अलग क्रूज़ मिसाइल, लंबी दूरी की ज़मीनी हमला क्रूज़ मिसाइल, उड़ाई, और उस उड़ान का ब्योरा हमारे DRDO की 2026 की परीक्षण शृंखला वाले लेख में है, जबकि भारत में बने हथियारों और विदेश में उनकी बिक्री की व्यापक कहानी हमारे भारत के रक्षा उद्योग वाले लेख में है।

पहला निर्यात, फिर वियतनाम और इंडोनेशिया

ब्रह्मोस एयरोस्पेस ने 28 जनवरी 2022 को फ़िलीपींस के राष्ट्रीय रक्षा विभाग के साथ तट-आधारित जहाज़-रोधी मिसाइल प्रणाली के लिए अनुबंध किया। प्रेस सूचना ब्यूरो के बयान ने अनुबंध को “भारत सरकार की ज़िम्मेदार रक्षा निर्यात को बढ़ावा देने की नीति की ओर एक अहम क़दम” कहा। ANI ने बाद में सौदे को 375 मिलियन डॉलर का बताया और कहा कि उसमें तीन बैटरियाँ शामिल हैं, यानी लॉन्चर और मिसाइलों की वे इकाइयाँ जो तट के एक हिस्से की रखवाली करती हैं।

ANI के अनुसार पहली मिसाइलें 19 अप्रैल 2024 को पहुँचीं, जिन्हें भारतीय वायुसेना के एक C-17 परिवहन विमान से फ़िलीपींस के नौसैनिक कोर (मरीन कोर) तक पहुँचाया गया। फ़िलीपीन डेली इन्क्वायरर ने 23 अप्रैल 2025 को बताया कि दूसरी खेप समुद्र के रास्ते भेजी गई।

30 मई 2026 को भारत के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने सिंगापुर में शांग्री-ला डायलॉग में कहा कि भारत ने वियतनाम को ब्रह्मोस की आपूर्ति के लिए सौदा कर लिया है और इंडोनेशिया के साथ ऐसे ही सौदे के अंतिम चरण में है, रॉयटर्स ने बताया। सिंह ने कोई आँकड़े नहीं दिए। रॉयटर्स ने इससे पहले एक सूत्र के हवाले से बताया था कि प्रशिक्षण और लॉजिस्टिक सहायता समेत वियतनाम का सौदा लगभग 60 अरब रुपये (629 मिलियन डॉलर) का हो सकता है। इस मूल्य की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

7 जुलाई 2026 को इंडोनेशिया के राष्ट्रपति भवन ने घोषणा की कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के बीच जकार्ता में हुई बातचीत के बाद इंडोनेशिया के रक्षा मंत्रालय ने ब्रह्मोस का अनुबंध किया है। घोषणा में कोई मूल्य नहीं बताया गया। रॉयटर्स ने भारत सरकार के एक अधिकारी के हवाले से बताया कि भारत अस्त्र हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल की भी आपूर्ति करेगा।

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स्रोत और आगे पढ़ने के लिए

  1. BrahMos Aerospace: About the joint venture
  2. BrahMos Aerospace: History of BrahMos
  3. BrahMos Aerospace: The BrahMos supersonic cruise missile
  4. BrahMos Aerospace: Pillars of BrahMos (Dr A. Sivathanu Pillai)
  5. BrahMos Aerospace: Ship-based weapon system
  6. BrahMos Aerospace: Air-launched weapon system
  7. BrahMos Aerospace: Submarine-launched weapon system
  8. BrahMos Aerospace: Extended Range (ER) missile successfully test-fired, 11 March 2017
  9. BrahMos Aerospace: Silver Jubilee Year celebrations conclude, 12 June 2023
  10. Press Information Bureau, Ministry of Defence: Indian Navy successfully fires extended range BrahMos land attack missile, 5 March 2022
  11. Press Information Bureau, Ministry of Defence: extended range version of air-launched BrahMos launched from Su-30 MKI, 12 May 2022 (Hindi release)
  12. Press Information Bureau release of 28 January 2022 on the Philippines contract, as published by BrahMos Aerospace
  13. PTI via The Week: India inks defence deals worth Rs 39,125 crore, 1 March 2024
  14. ANI via Business Standard: India delivers BrahMos missiles to Philippines under $375 mn deal, 19 April 2024
  15. Philippine Daily Inquirer: Second batch of India-made BrahMos missiles sent to PH, 23 April 2025
  16. Reuters via Internazionale: India says signed BrahMos missile deal with Vietnam, 30 May 2026
  17. The Jakarta Post (agencies): Indonesia, India sign BrahMos missile deal, 7 July 2026
  18. CSIS Missile Threat: Extended-range BrahMos missile fails flight test, 14 July 2021

यह लेख AI उपकरणों की सहायता से शोधित और लिखा गया है, और सटीकता के लिए संपादित किया गया है। यह केवल सामान्य जानकारी और चर्चा के लिए है, पेशेवर सलाह नहीं। हमारे संपादकीय मानक और अस्वीकरण देखें। कोई त्रुटि मिली? हमें बताएँ।

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