चित्रण: tuput
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उनकी पहली फ़िल्म पथेर पांचाली ने 1956 में कान में सर्वश्रेष्ठ मानवीय दस्तावेज़ का पुरस्कार जीता, और अपराजितो ने 1957 में वेनिस में गोल्डन लायन। मार्च 1992 में अकादमी ऑफ़ मोशन पिक्चर आर्ट्स एंड साइंसेज़ ने रे को मानद पुरस्कार दिया, और गृह मंत्रालय की सूची में उनका भारत रत्न 1992 के तहत दर्ज है।
कान फ़िल्म समारोह का अभिलेखागार सत्यजित रे की पथेर पांचाली को 1956 की प्रतियोगिता की फ़िल्म बताता है और उसका पुरस्कार “Prix du document humain” यानी सर्वश्रेष्ठ मानवीय दस्तावेज़ का पुरस्कार दर्ज करता है। एक साल बाद रे की दूसरी फ़िल्म अपराजितो ने वेनिस में गोल्डन लायन जीता। 1992 में अकादमी ऑफ़ मोशन पिक्चर आर्ट्स एंड साइंसेज़ ने उन्हें “सिनेमा की कला में दुर्लभ महारत” के लिए मानद पुरस्कार दिया, और गृह मंत्रालय की सूची में उनका भारत रत्न उसी साल के तहत दर्ज है। रे का निधन 23 अप्रैल 1992 को कलकत्ता में हुआ, 70 साल की उम्र में।
एक कमर्शियल आर्टिस्ट, हाथ में नोटबुक और पीछे कोई फ़िल्म नहीं
सत्यजित रे फ़ाउंडेशन की जीवनी के अनुसार रे का जन्म 2 मई 1921 को कलकत्ता में हुआ। उन्होंने वहीं के विश्वविद्यालय में पढ़ाई की और 1940 में रवींद्रनाथ टैगोर के विश्व-भारती, शांतिनिकेतन में गए, जहाँ वे दिसंबर 1942 तक रहे। फ़ाउंडेशन बताता है कि टैगोर रे के दादा और पिता के क़रीबी दोस्त थे, और 7 अगस्त 1941 को टैगोर का निधन हुआ जब रे वहाँ विद्यार्थी ही थे। कवि की अपनी कहानी tuput के लेख टैगोर, नोबेल पुरस्कार और लौटाया हुआ नाइटहुड में है।
1943 से रे कमर्शियल आर्टिस्ट का काम करने लगे, और 1949 तक वे कलकत्ता की विज्ञापन एजेंसी डी. जे. कीमर में आर्ट डायरेक्टर थे। फ़ाउंडेशन के अनुसार उन्होंने 1947 में कलकत्ता की पहली फ़िल्म सोसाइटी बनाई। द वीक के अनुसार सिग्नेट प्रेस ने उनसे बिभूतिभूषण बंद्योपाध्याय के उपन्यास पथेर पांचाली के बच्चों वाले संक्षिप्त संस्करण का चित्रांकन करवाया, और उन्होंने पूरा उपन्यास पढ़ा और सिग्नेट संस्करण का आवरण बनाया।
1949 में फ़्रांसीसी निर्देशक जां रेनुआ द रिवर के लिए लोकेशन देखने कलकत्ता आए। रे उनके होटल गए, सप्ताहांत में शहर के बाहरी इलाक़ों की यात्राओं में उनके साथ रहे, और जब रेनुआ ने पूछा कि क्या वे फ़िल्मकार बनना चाहते हैं, तो उन्हें पथेर पांचाली की एक छोटी रूपरेखा सुनाई, फ़ाउंडेशन यह दर्ज करता है।
1950 में कीमर ने रे को काम से लंदन भेजा। वे क़रीब छह महीने वहाँ रहे और लगभग सौ फ़िल्में देखीं, जिनमें बाइसिकल थीव्स भी थी, जिसने उनके इस विश्वास को पक्का किया कि लगभग नौसिखिए कलाकारों और असली लोकेशनों के साथ एक यथार्थवादी फ़िल्म बन सकती है। उनकी नोटबुक में उपन्यास पर फ़िल्म के नोट पहले से थे। वे अनजान अभिनेता, बिना मेकअप और असली गाँव चाहते थे, ज़्यादातर दोस्तों को यह नामुमकिन लगा, और उन्होंने अपना ट्रीटमेंट घर लौटते जहाज़ पर पूरा किया।
रविवार, उधार के पैसे और एक राज्य सरकार
शूटिंग 27 अक्टूबर 1952 को शुरू हुई, उस दृश्य से जिसमें अपू और उसकी बहन दुर्गा काँस घास के खेत में एक रेलगाड़ी देखते हैं। कीमर की नौकरी के कारण रे रविवार को शूट करते थे। अगले रविवार तक मवेशी फूल खा चुके थे, इसलिए दृश्य को अगले फूलने के मौसम का इंतज़ार करना पड़ा, फ़ाउंडेशन के अनुसार।
उन्होंने अपनी बीमा पॉलिसी पर और रिश्तेदारों व दोस्तों से उधार लिया, और जब पैसे ख़त्म हो गए तो उनकी पत्नी बिजोया के गहने गिरवी रखे गए ताकि शूटिंग कुछ दिन और चल सके। शूटिंग से पहले वे क़रीब दो साल एक ऐसा प्रोड्यूसर खोजते रहे जो फ़िल्म पर पैसा लगाए, और कोई नहीं मिला, जबकि सबने उनकी पटकथा और स्केच की तारीफ़ की।
प्रोडक्शन मैनेजर अनिल चौधरी ने तब पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री डॉ. बिधान चंद्र रॉय से संपर्क करने का सुझाव दिया, और राज्य सरकार फ़िल्म का ख़र्च उठाने को राज़ी हो गई। पैसा किस्तों में आता था, और हर किस्त के लिए हिसाब मंज़ूर करवाना पड़ता था जिसमें एक महीने तक लग सकता था; लगभग एक साल के अंतराल के बाद शूटिंग 1954 की शुरुआत में फिर शुरू हुई। रक़म के बारे में रिपोर्टें अलग-अलग हैं। द वीक के अनुसार कुछ ब्योरे ₹1 लाख बताते हैं और कुछ ₹80,000, और रे के बेटे संदीप रे को ₹1 लाख पर शक था और उनके हिसाब से यह ₹60,000 से ज़्यादा नहीं थी।
कलाकार ज़्यादातर पर्दे के लिए नए थे। अपू का किरदार सुबीर बनर्जी ने निभाया, उसकी माँ का करुणा बनर्जी ने, और न उन्होंने, न गाँववालों ने पहले कभी अभिनय किया था। 80 साल की रिटायर्ड मंच अभिनेत्री चुनीबाला देवी ने इंदिर ठाकुरन की भूमिका निभाई। मुख्य लोकेशन बोराल थी, कलकत्ता के बाहरी इलाक़े का एक गाँव, और फ़िल्म की सिनेमैटोग्राफ़ी सुब्रत मित्र ने की, जो पहले स्टिल फ़ोटोग्राफ़र थे। रविशंकर ने, जिन्होंने फ़िल्म का क़रीब आधा हिस्सा देखा था, संगीत लगभग ग्यारह घंटे के एक लगातार सत्र में रिकॉर्ड किया।
फ़ाउंडेशन के अनुसार, 1954 की पतझड़ में न्यूयॉर्क के म्यूज़ियम ऑफ़ मॉडर्न आर्ट के मोनरो व्हीलर ने वर्ल्ड प्रीमियर करवाने की पेशकश की। आउटलुक इंडिया, म्यूज़ियम के अभिलेखागार के पत्रों के आधार पर, बताता है कि व्हीलर उसी साल कलकत्ता में रे से मिले थे, जब पैसे की कमी से शूटिंग रुकी हुई थी। जब एक हड़ताल के कारण रे को कलकत्ता में कच्ची फ़िल्म स्टॉक नहीं मिल सका, तो म्यूज़ियम ने लंदन में स्टॉक ख़रीदवाकर उन्हें भिजवाया। सबटाइटल के लिए न वक़्त था, न पैसा।
कान में आधी रात की स्क्रीनिंग
पथेर पांचाली 26 अगस्त 1955 को कलकत्ता में रिलीज़ हुई। दो हफ़्ते कारोबार मामूली रहा, और तीसरे हफ़्ते तक वह तीन सिनेमाघरों में भरे हॉल में चल रही थी। फ़ाउंडेशन के अनुसार पहले सिनेमाघर ने उसे छह हफ़्ते चलाया और फिर वह एक दूसरी श्रृंखला में सात हफ़्ते और चली। फ़ाउंडेशन की पुरस्कार-सूची में उसी साल नई दिल्ली में राष्ट्रपति के स्वर्ण और रजत पदक दिखते हैं।
डॉ. रॉय, जो फ़िल्म पहले देख चुके थे, ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के लिए एक स्क्रीनिंग रखवाई; फ़ाउंडेशन के अनुसार नेहरू फ़िल्म से द्रवित हुए और कुछ विरोध के बावजूद उन्होंने पक्का किया कि वह कान में भेजी जाए। द वीक दूसरा रास्ता बताता है। उसके अनुसार रॉय फ़िल्म को दिल्ली ले गए और, क्योंकि प्रिंट में सबटाइटल नहीं थे, उन्होंने नेहरू को उसे दृश्य दर दृश्य समझाया।
कान की पहली स्क्रीनिंग समारोह की छुट्टी के दिन आधी रात को थी, और ज़्यादातर जूरी सदस्य नहीं आए। लिंडसे एंडरसन और आंद्रे बाज़ाँ समेत आलोचकों और रे के दोस्तों ने एक और स्क्रीनिंग के लिए ज़ोर दिया, और पूरी जूरी के लिए दूसरी स्क्रीनिंग रखी गई। समारोह का अपना अभिलेखागार पुरस्कार को 1956 का Prix du document humain दर्ज करता है। फ़ाउंडेशन उसे जूरी का विशेष पुरस्कार कहता है।
फ़ाउंडेशन फ़िल्म के लिए देश-विदेश में क़रीब एक दर्जन पुरस्कार गिनता है। उसकी सूची में एडिनबरा में डिप्लोमा ऑफ़ मेरिट और 1956 में रोम में वैटिकन पुरस्कार हैं, 1957 में सैन फ़्रांसिस्को में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म और निर्देशन, 1958 में वैंकूवर में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म और 1959 में न्यूयॉर्क में सर्वश्रेष्ठ विदेशी फ़िल्म।
आउटलुक इंडिया के अनुसार अमेरिकी वितरक एडवर्ड हैरिसन ने फ़िल्म के लिए प्रदर्शक खोजने में दो साल लगाए, तब जाकर वह सितंबर 1958 में न्यूयॉर्क के फ़िफ़्थ एवेन्यू सिनेमा में लगी। वह सात महीने चली, जिसे पत्रिका अमेरिका में किसी विदेशी फ़िल्म का रिकॉर्ड कहती है।
अपराजितो और गोल्डन लायन
अपराजितो 1956 में आई, और आम रिलीज़ से पहले नेहरू और राजेंद्र प्रसाद के लिए उसकी विशेष स्क्रीनिंग हुई। वह देहात में अपू और उसकी विधवा माँ की कहानी कहती है, और माँ के गुज़र जाने के बाद अपू के कलकत्ता जाने की। फ़ाउंडेशन के अनुसार शुरू में बंगाली दर्शकों में उसने बहुत अच्छा कारोबार नहीं किया।
1957 में वेनिस में उसने सर्वश्रेष्ठ फ़ीचर फ़िल्म का गोल्डन लायन जीता। फ़ाउंडेशन उसी समारोह के सिनेमा नुओवो पुरस्कार और क्रिटिक्स पुरस्कार भी गिनाता है। ला बिएनाले का अभिलेखागार रे को 1957 के 18वें मोस्त्रा इंटरनाज़ियोनाले द’आर्ते चिनेमातोग्राफ़िका में अपराजितो के साथ, भारत के तहत दर्ज करता है।
रे ने तीसरी फ़िल्म की योजना नहीं बनाई थी। फ़ाउंडेशन के अनुसार जब नेहरू ने पूछा कि अब अपू का क्या होता है, तो रे ने कहा कि उनके मन में अपू की तीसरी फ़िल्म नहीं है। वेनिस की प्रेस कॉन्फ़्रेंस में उनसे पूछा गया कि क्या उनके मन में त्रयी है, और उन्होंने ख़ुद को हाँ कहते पाया। अपूर संसार 1959 में आई, जिसमें सौमित्र चटर्जी अपू बने और शर्मिला टैगोर अपनी पहली फ़िल्म में उसकी पत्नी। फ़ाउंडेशन उसके लिए 1959 में नई दिल्ली का राष्ट्रपति का स्वर्ण पदक गिनाता है।
उसी सूची में 1964 में महानगर और 1965 में चारुलता के लिए बर्लिन में सर्वश्रेष्ठ निर्देशन के सिल्वर बेयर दर्ज हैं। उसमें 1982 का वेनिस का विशेष गोल्डन लायन भी है, जिसके लिए ला बिएनाले का अभिलेखागार “Leone d’oro alla carriera” दर्ज करता है, उसी साल कान में एक श्रद्धांजलि, 1983 में ब्रिटिश फ़िल्म इंस्टीट्यूट की फ़ेलोशिप और 1987 में फ़्रांस का लीजन ऑफ़ ऑनर।
देश में मिले सम्मान
फ़ाउंडेशन 1958 का पद्म श्री, 1965 का पद्म भूषण और 1976 का पद्म विभूषण गिनाता है, और 1967 में मनीला में दिया गया रैमन मैग्सेसे पुरस्कार भी। दादा साहब फाल्के पुरस्कार, सिनेमा के लिए सरकार का आजीवन पुरस्कार, फ़ाउंडेशन की सूची में 1985 के तहत आता है और फ़िल्म फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया की विजेताओं की सूची में 1984 के तहत, जो 1969 से हर साल एक विजेता का नाम देती है। फाल्के पुरस्कार और दूसरे राष्ट्रीय सम्मानों के दो बाद के प्राप्तकर्ताओं के बारे में tuput के प्रोफ़ाइल अमिताभ बच्चन और लता मंगेशकर पर हैं।
गृह मंत्रालय की भारत रत्न प्राप्तकर्ताओं की सूची, जो देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है, रे को 1992 के तहत दर्ज करती है। tuput ने जो स्रोत खोले उनमें यह नहीं दिया गया कि इसकी घोषणा या प्रदान किस दिन हुआ।
अकादमी पुरस्कार, और उसके बाद
64वें अकादमी पुरस्कार 30 मार्च 1992 को लॉस एंजिल्स के डोरोथी चैंडलर पैविलियन में हुए, अकादमी के समारोह-पृष्ठ के अनुसार। हृदय रोग के कारण रे यात्रा नहीं कर सकते थे। ऑड्रे हेपबर्न ने मानद पुरस्कार दिया, और रे ने उसे कलकत्ता में अस्पताल के बिस्तर से स्वीकार किया। द कारवां ने 2016 में इसे पहले से रिकॉर्ड किया गया वीडियो बताया, जबकि सत्यजित रे फ़ाउंडेशन सीधे सैटेलाइट टेलीविज़न लिंक का वर्णन करता है।
फ़ाउंडेशन प्रशस्ति को इस रूप में छापता है कि वह “सिनेमा की कला में उनकी दुर्लभ महारत की मान्यता में” और उनके मानवतावादी दृष्टिकोण के लिए दी गई। कारवां ने 2016 में जोड़ा कि रे आज भी अकेले भारतीय हैं जिन्हें मानद ऑस्कर मिला है। समारोह के 24 दिन बाद उनका निधन हो गया।
पुरस्कार के बाद अकादमी ने रे प्रिज़र्वेशन प्रोजेक्ट शुरू किया। उसके अकादमी फ़िल्म आर्काइव में अब रे के निर्देशित अठारह फ़ीचर फ़िल्मों और एक लघु फ़िल्म के प्रिज़र्वेशन मास्टर और प्रोजेक्शन प्रिंट हैं।
स्रोत और आगे पढ़ने के लिए
- Festival de Cannes archive: Pather Panchali, In Competition 1956 (Prix du document humain)
- Academy of Motion Picture Arts and Sciences: The 64th Academy Awards, 30 March 1992
- Academy Film Archive: Satyajit Ray Collection (Ray Preservation Project)
- Ministry of Home Affairs, Government of India: List of recipients of the Bharat Ratna
- La Biennale di Venezia, ASAC archive: Satyajit Ray (18th Mostra, 1957, and 1982)
- Satyajit Ray Foundation: Awards won by Satyajit Ray and his films
- Satyajit Ray Foundation: Making of Pather Panchali, 1950 to 1955
- Satyajit Ray Foundation: Triumph of Pather Panchali, 1955
- Satyajit Ray Foundation: Encounter with Jean Renoir, 1949
- Satyajit Ray Foundation: The Bicycle Thieves effect, 1950
- Satyajit Ray Foundation: At Shantiniketan, 1940 to 1942
- Satyajit Ray Foundation: The Apu Trilogy
- Satyajit Ray Foundation: Biography
- Satyajit Ray Foundation: The final offerings, 1984 to 1992
- The Week, 15 May 2022: The story behind the making of Pather Panchali
- Outlook India: Park Avenue Panchali (letters in the MoMA archives)
- Film Federation of India: Dadasaheb Phalke Award winners
- The Caravan, 1 March 2016: Editor's pick on Satyajit Ray's honorary Oscar
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