फ़ोटो: grassrootsgroundswell / Wikimedia Commons, CC BY 2.0 (क्रॉप किया गया)
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भारतीय सैनिकों का मार्सेल में उतरना 26 सितंबर 1914 को शुरू हुआ और कुछ ही हफ़्तों में वे यप्रे के पास लड़ रहे थे। ख़ुदादाद ख़ान और दरवान सिंह नेगी को 7 दिसंबर 1914 की एक ही अधिसूचना में विक्टोरिया क्रॉस के लिए राजपत्रित किया गया, और गढ़वाल ब्रिगेड 10 मार्च 1915 को नव-शापेल में उतरी।
इतिहासकार डेविड ओमिसी के अनुसार प्रथम विश्व युद्ध के दौरान लगभग 15 लाख लोग भारतीय सेना में खिंचकर आए, और 1914-1918-Online विश्वकोश के लिए युद्ध-हानि का लेख लिखने वाले एंड्रयू टेट जार्बो के अनुसार उनमें से दस लाख से कुछ ज़्यादा यूरोप, अफ़्रीका और मध्य पूर्व के रणक्षेत्रों में भेजे गए। जिस सेना ने युद्ध शुरू किया वह कहीं छोटी थी। ओमिसी की तालिका 1914 में 1,59,134 कार्यरत भारतीय अधिकारी और जवान देती है, जिनके ऊपर 2,333 ब्रिटिश अधिकारी थे।
यह लेख 1914 और 1915 में फ़्रांस और बेल्जियम में भारतीय सैनिकों, भारतीयों के जीते पहले विक्टोरिया क्रॉस, नव-शापेल में गढ़वाल ब्रिगेड, और उनके नाम सँजोने के लिए बने दो स्मारकों का पीछा करता है, एक उत्तरी फ़्रांस में और एक दिल्ली में। युद्ध के बाद 1919 में पंजाब में जो हुआ, वह जलियाँवाला बाग़ वाले लेख में है, और सिख सैनिकों के एक चौकी को आख़िरी आदमी तक थामे रखने का पहले का मामला सारागढ़ी वाले लेख में है।
कितनों ने सेवा की, और आँकड़े क्यों अलग हैं
कुल संख्या इस पर निर्भर करती है कि कौन गिन रहा है और “सेवा” किसे माना गया। जार्बो 1914 से 1919 के अंत के बीच भर्ती हुए 8,77,068 लड़ाके और 5,63,369 ग़ैर-लड़ाके (सहायक कर्मी, जिन्हें सेना अनुचर कहती थी) देते हैं, जो जोड़ने पर 14,40,437 बनते हैं। लंदन का नेशनल आर्मी म्यूज़ियम कहता है कि भारत के लगभग 14 लाख लोगों ने सेवा की, कुछ ग़ैर-लड़ाकू भूमिकाओं में। उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने 10 नवंबर 2018 को फ़्रांस में बोलते हुए कहा कि 15 लाख ने स्वेच्छा से भर्ती ली थी और लगभग 8 लाख ने युद्ध के मोर्चों पर लड़ाई लड़ी।
मृतकों की गिनती भी अलग है। जार्बो ब्रिटिश वॉर ऑफ़िस के 1922 के आँकड़े उद्धृत करते हैं, जो 1919 के अंत तक 53,486 भारतीय मृत, 64,350 घायल और 2,937 लापता दर्ज करते हैं, और वे नोट करते हैं कि उसी किताब में 47,746 मारे गए या मरे का एक दूसरा, “अनुमानित” आँकड़ा भी है। यूनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूशन ऑफ़ इंडिया के राणा छिन्ना और कॉमनवेल्थ वॉर ग्रेव्स कमीशन के आदिल छिन्ना लिखते हैं कि इंडिया गेट अविभाजित भारत के “the over 74,000” (74,000 से ऊपर) उन कर्मियों की याद दिलाता है जो युद्ध में मरे। इन आँकड़ों का स्रोतों ने मिलान नहीं किया है, इसलिए यहाँ हर एक का श्रेय दिया गया है।
ओमिसी लिखते हैं कि 1914 में सेना का लगभग आधा हिस्सा पंजाब से भर्ती हुआ था, लगभग छठा हिस्सा पठानों और गोरखों से, और एक तिहाई से कम बाक़ी भारत से।
मार्सेल, 26 सितंबर 1914
पेरिस में भारत का दूतावास, फ़्रांस के युद्ध स्मारकों की अपनी गाइड में, कहता है कि इंडियन एक्सपेडिशनरी फ़ोर्स ए की पहली दो इन्फैंट्री डिवीज़नें और तीन कैवेलरी ब्रिगेड 26 सितंबर 1914 से मार्सेल और ऑरलियाँ में पहुँचने लगीं। फ़्रांसीसी नागरिकों ने उनका फूलों और “Vive les Hindous!” (हिंदुओं की जय!) के नारों से स्वागत किया।
इंपीरियल वॉर म्यूज़ियम (IWM) बताता है कि उन्हें तुरंत उत्तर क्यों भेजा गया। अक्तूबर 1914 तक ब्रिटिश एक्सपेडिशनरी फ़ोर्स अपने 70 प्रतिशत सैनिक खो चुकी थी, और इंडियन एक्सपेडिशनरी फ़ोर्स ए के 45,000 लोग तब पहुँचे जब वह टूटने के कगार पर थी। म्यूज़ियम कहता है कि उन्होंने जर्मनी के तीखे हमलों के बीच मोर्चा थामे रखने के लिए लड़ाई लड़ी और संभवतः 1914 में मित्र राष्ट्रों को लड़ाई में बनाए रखा।
एक ही राजपत्र अधिसूचना में दो विक्टोरिया क्रॉस
7 दिसंबर 1914 के लंदन गज़ेट ने भारतीय सेना के सैनिकों के पहले विक्टोरिया क्रॉस एक ही वॉर ऑफ़िस अधिसूचना में छापे। 1ली बटालियन, 39वीं गढ़वाल राइफ़ल्स के नायक दरवान सिंह नेगी का उल्लेख “the night of the 23rd-24th November, near Festubert” (23-24 नवंबर की रात, फ़ेस्तुबेर के पास) के लिए हुआ, जब उनकी रेजिमेंट खाइयाँ वापस ले रही और साफ़ कर रही थी। राजपत्र कहता है कि सिर में दो जगह और बाँह में घायल होने के बावजूद वे “one of the first to push round each successive traverse” (हर अगले मोड़ पर सबसे पहले आगे बढ़ने वालों में से एक) थे, यानी खाई के वे मोड़ जो दुश्मन को नज़र से छिपाते हैं।
उसी अधिसूचना में 129वीं ड्यूक ऑफ़ कनॉट्स ओन बलूची के सिपाही ख़ुदादाद का नाम है, 31 अक्तूबर 1914 को बेल्जियम के होलबेके में किए कार्य के लिए। उनकी टुकड़ी के प्रभारी ब्रिटिश अधिकारी घायल हो चुके थे और दूसरी गन एक गोले से बेकार हो गई थी। प्रशस्ति-पत्र कहता है कि ख़ुदादाद, ख़ुद घायल होने पर भी, “remained working his gun until all the other five men of the gun detachment had been killed.” (अपनी गन चलाते रहे, जब तक गन टुकड़ी के बाक़ी पाँचों आदमी मारे नहीं गए।)
ख़ुदादाद ख़ान की कार्रवाई पहले की थी, और बर्मिंघम सिटी यूनिवर्सिटी द्वारा उद्धृत नेशनल आर्मी म्यूज़ियम की प्रोफ़ाइल उन्हें विक्टोरिया क्रॉस पाने वाला पहला भारतीय कहती है। Victoria Cross Online जोड़ता है कि नेगी को उनका पदक सबसे पहले सौंपा गया, 5 दिसंबर 1914 को। मीर दस्त ने बाद में अप्रैल 1915 में यप्रे की दूसरी लड़ाई में यह क्रॉस जीता और, उसी बर्मिंघम सिटी यूनिवर्सिटी पृष्ठ के अनुसार, वह इसे जीतने वाले चौथे भारतीय थे।
नव-शापेल, 10 मार्च 1915
भारत के दूतावास की गाइड के अनुसार लाहौर और मेरठ डिवीज़नों से बनी भारतीय कोर ने नव-शापेल में एक इकाई के रूप में अपनी पहली बड़ी कार्रवाई लड़ी। Western Front Association दर्ज करता है कि पैदल हमला 10 मार्च 1915 को सुबह 8.05 बजे 35 मिनट की गोलाबारी के बाद शुरू हुआ, और भारतीय कोर ने हमले के दाहिने हिस्से पर, गाँव से दूर, हमला किया।
सर जॉन फ़्रेंच का संदेश, जो 14 अप्रैल 1915 को राजपत्र में छपा, कहता है कि सुबह 8.05 बजे मेरठ डिवीज़न की गढ़वाल ब्रिगेड ने अपने सामने की जर्मन खाइयों पर धावा बोला और ब्रिटिश 25वीं ब्रिगेड के साथ दुश्मन की उन पंक्तियों को ले लिया जहाँ छर्रों से तार कट चुके थे। फिर दोनों ब्रिगेड आगे बढ़ीं और “succeeded in getting a footing in the village” (गाँव में पाँव जमाने में सफल रहीं)। फ़्रेंच ने लिखा कि सुबह 11 बजे तक नव-शापेल का पूरा गाँव ब्रिटिश हाथों में था। दूतावास की गाइड गढ़वाल और मेरठ डिवीज़नों को सेंध लगाने की अगुआई में रखती है और कहती है कि गाँव लगभग 90 मिनट में गिर गया।
गढ़वालियों में एक थे 2री बटालियन, 39वीं गढ़वाल राइफ़ल्स के राइफ़लमैन गबर सिंह नेगी। 28 अप्रैल 1915 को छपा उनका विक्टोरिया क्रॉस प्रशस्ति-पत्र कहता है कि वे बमों के साथ एक संगीन दल का हिस्सा थे जो जर्मन मुख्य खाई में घुसा और “the first man to go round each traverse” (हर मोड़ पर घूमकर जाने वाले पहले आदमी) थे, दुश्मन को तब तक पीछे धकेलते रहे जब तक उन्होंने समर्पण नहीं कर दिया। वह जोड़ता है कि वे इस कार्रवाई के दौरान मारे गए।
योजना का निशाना औबर्स रिज की ऊँची ज़मीन भी था, जहाँ तक नहीं पहुँचा जा सका। Western Front Association कहता है कि हमले से मित्र राष्ट्रों के उद्देश्य को कोई वास्तविक अल्पकालिक लाभ नहीं हुआ, और दूतावास की गाइड 11,000 से ज़्यादा मित्र हताहत गिनती है, जिनमें भारी भारतीय हानि भी है। कोई स्रोत लड़ाई का अलग भारतीय कुल नहीं देता। Western Front Association कहता है कि दोनों भारतीय डिवीज़नों को भारी हताहत झेलने पड़े, हालाँकि ब्रिटिश 7वीं और 8वीं डिवीज़नों के पैमाने पर नहीं, और जार्बो भारतीय पैदल बटालियनों पर पड़ी मार को भारी बताते हैं।
लूस से मेसोपोटामिया और हाइफ़ा तक
भारतीय पैदल डिवीज़नें 1915 के अंत में पश्चिमी मोर्चा छोड़ गईं। दूतावास की गाइड 25 सितंबर 1915 को शुरू हुई लूस की लड़ाई को फ़्रांस में उनकी आख़िरी बड़ी कार्रवाई बताती है, जिसमें लाहौर और मेरठ डिवीज़नों के लगभग 4,000 हताहत हुए। नायडू ने 2018 में कहा कि भारतीय सैनिकों को 1915 के अंत में अग्रिम मोर्चे की ड्यूटी से हटा लिया गया। दो कैवेलरी डिवीज़नें फ़्रांस में रहीं।
सेना का ज़्यादातर युद्ध कहीं और लड़ा गया। जार्बो लिखते हैं कि 6,75,000 से ज़्यादा भारतीय लड़ाके और ग़ैर-लड़ाके मध्य पूर्व में तैनात हुए, जो सेना का सबसे बड़ा और सबसे लंबा अभियान था, जिसमें 29,555 मृत, 32,608 घायल और 1,035 लापता हुए। फ़्रांस में 1,38,608 ने सेवा की, और 7,710 मारे गए, 16,441 घायल हुए और 834 लापता हुए, जिससे भेजी गई संख्या के अनुपात में फ़्रांस ज़्यादा ख़तरनाक मोर्चा रहा: वहाँ लगभग 18 प्रतिशत हताहत बने, जबकि मेसोपोटामिया में 10 प्रतिशत से कुछ कम। दूतावास की गाइड लड़ाकों के लिए पश्चिमी मोर्चे का अलग हिसाब देती है, 8,550 से ऊपर मारे गए और 50,000 घायल।
सितंबर 1918 में भारतीय कैवेलरी ने फ़िलिस्तीन की मेगिद्दो की लड़ाई में केंद्रीय भूमिका निभाई, जार्बो लिखते हैं। उसी महीने हाइफ़ा में जोधपुर लांसर्स के मेजर ठाकुर दलपत सिंह अपनी रेजिमेंट की अगुआई करते हुए मारे गए, और छिन्ना दर्ज करते हैं कि डेक्कन हॉर्स 23 सितंबर को जॉर्डन वैली डे के रूप में और 61वीं कैवेलरी उसे हाइफ़ा डे के रूप में मनाती है।
ब्राइटन के अस्पताल और घर की चिट्ठियाँ
घायलों का इलाज फ़्रांस के साथ इंग्लैंड में भी हुआ। जार्बो लिखते हैं कि सर वॉल्टर लॉरेंस ने बूलोन, मार्सेल और रूआं में, और ब्राइटन में, भारतीय अस्पतालों के लिए इमारतें खोजीं, जहाँ रॉयल पैविलियन, यॉर्क प्लेस स्कूल और किचनर इंडियन हॉस्पिटल नाम का एक खंड इस्तेमाल हुआ। Brighton Dome कहता है कि पैविलियन दो हफ़्ते से कम में 600 बिस्तरों का अस्पताल बन गया और उसने दिसंबर 1914 की शुरुआत में पहले मरीज़ लिए। जार्बो दर्ज करते हैं कि बूलोन के अस्पताल में 1914 और 1915 में 19,858 मरीज़ भर्ती हुए और 223 की मृत्यु हुई, और किचनर अस्पताल में भर्ती 3,890 में से 26 की मृत्यु हुई।
वहाँ मरने वाले हिंदू और सिख मरीज़ों का अंतिम संस्कार साउथ डाउन्स के पैचम डाउन पर हुआ। Brighton and Hove City Council कहती है कि मुंबई के ई. सी. हेनरीक्स का डिज़ाइन किया छतरी स्मारक, जिसका अनावरण 1921 में प्रिंस ऑफ़ वेल्स ने किया, 53 लोगों की स्मृति में है।
सैनिकों की चिट्ठियाँ सेंसर पढ़ते थे, जो 40 से 90 चिट्ठियों के अनूदित अंशों के साथ साप्ताहिक रिपोर्टें बनाते थे; Brighton Dome, ओमिसी का हवाला देते हुए, कहता है कि अभिलेखागार लगभग 4,000 पन्नों का है और ज़्यादातर मूल चिट्ठियाँ बची नहीं हैं। ओमिसी मई 1915 में एक मुसलमान हवलदार (भारतीय सेना का सार्जेंट) की लिखी एक चिट्ठी उद्धृत करते हैं: “For God’s sake don’t come, don’t come to this war in Europe.” (ख़ुदा के लिए मत आना, यूरोप की इस जंग में मत आना।) वे यह भी लिखते हैं कि शांतिकाल की भर्ती औसतन लगभग 1,250 लोग महीना थी, और 1915 के अंत तक सेना हानियों की भरपाई के लिए ज़रूरी 10,000 महीना ले रही थी।
नव-शापेल और इंडिया गेट के नाम
नव-शापेल का भारतीय स्मारक उस जगह के पास है जहाँ भारतीय कोर को सबसे भारी हताहत झेलने पड़े, छिन्ना लिखते हैं। दूतावास की गाइड कहती है कि उसे सर हर्बर्ट बेकर ने डिज़ाइन किया, 1927 में कपूरथला के महाराजा, मार्शल फ़र्दिनांद फ़ॉश और भारतीय पूर्व-सैनिकों की एक बड़ी टुकड़ी की मौजूदगी में उसका अनावरण हुआ, और उस पर अंग्रेज़ी, गुरुमुखी, हिंदी और उर्दू में अभिलेख हैं। वह वहाँ 4,863 भारतीय सैनिकों और मज़दूरों को, जिनकी कोई ज्ञात क़ब्र नहीं, स्मृत बताती है, जबकि Western Front Association, कॉमनवेल्थ वॉर ग्रेव्स कमीशन को दोहराते हुए, “over 4,700” (4,700 से ऊपर) कहता है। फ़ॉश ने पूर्व-सैनिकों से कहा, दूतावास के प्रतिलेखन में, “They showed us the way.” (उन्होंने हमें रास्ता दिखाया।)
इंडिया गेट, अखिल भारतीय युद्ध स्मारक, का डिज़ाइन सर एडविन लुटियंस ने बनाया और अनावरण वायसराय लॉर्ड इरविन ने 12 फ़रवरी 1931 को किया, छिन्ना के अनुसार। Britannica उसकी ऊँचाई लगभग 138 फ़ुट (42 मीटर) बताता है, और कहता है कि ड्यूक ऑफ़ कनॉट ने 1921 में नींव का पत्थर रखा। अभिलेख मेहराब को भारतीय सेनाओं के उन मृतकों को समर्पित करता है जो “France and Flanders, Mesopotamia and Persia, East Africa, Gallipoli” (फ़्रांस और फ़्लैंडर्स, मेसोपोटामिया और फ़ारस, पूर्वी अफ़्रीका, गैलीपोली) और अन्यत्र गिरे, और उन मृतकों को भी जोड़ता है “whose names are here recorded” (जिनके नाम यहाँ दर्ज हैं) जो उत्तर-पश्चिम सीमांत पर और तीसरे अफ़ग़ान युद्ध में गिरे। छिन्ना लिखते हैं कि उस पर 13,516 नाम खुदे हैं, और Britannica, कॉमनवेल्थ वॉर ग्रेव्स कमीशन का हवाला देते हुए, कहता है कि 13,000 से ज़्यादा।
हर मोर्चे के साथ एक-सा बर्ताव नहीं हुआ। जार्बो नोट करते हैं कि इराक़ का बसरा स्मारक 665 भारतीय अधिकारियों के नाम देता है पर 33,222 भारतीय अन्य रैंकों को हर इकाई के लिए सिर्फ़ एक संख्या के रूप में दर्ज करता है। छिन्ना लिखते हैं कि इंपीरियल वॉर ग्रेव्स कमीशन ने यूरोप में, जहाँ ज़्यादा आगंतुकों की उम्मीद थी, भारतीय रैंक-और-फ़ाइल के नाम भी लिखने का फ़ैसला किया।
भारत और फ़्रांस में स्मरण
छिन्ना लिखते हैं कि आज़ादी के बाद युद्ध को औपनिवेशिक अतीत का हिस्सा माना गया, और सार्वजनिक स्मरण शताब्दी के साथ लौटा, जिसका नेतृत्व यूनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूशन ऑफ़ इंडिया ने विदेश मंत्रालय के साथ किया। दूतावास की गाइड के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 अप्रैल 2015 को नव-शापेल का दौरा किया। उपराष्ट्रपति नायडू ने 10 नवंबर 2018 को विलेर-गिस्लें में भारत सरकार के बनाए एक स्मारक का उद्घाटन किया, जहाँ कंबराई की लड़ाई में भारतीय कैवेलरी लड़ी थी। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और प्रधानमंत्री मोदी ने 12 फ़रवरी 2025 को मार्सेल के मज़ार्ग युद्ध क़ब्रिस्तान का दौरा किया, जहाँ 1,003 भारतीय सैनिक स्मृत हैं।
स्रोत और आगे पढ़ने के लिए
- The London Gazette, supplement of 7 December 1914 (issue 28999, page 10425): Victoria Cross for Naik Darwan Sing Negi and Sepoy Khudadad
- The London Gazette, supplement of 28 April 1915 (issue 29146, page 4143): Victoria Cross for Rifleman Gobar Sing Negi
- The London Gazette, supplement of 14 April 1915 (issue 29128, page 3673): Sir John French's despatch on the opening of the Battle of Neuve Chapelle
- Embassy of India, Paris: Indian Soldiers in France during World Wars, War Memorials and Cemeteries
- Imperial War Museums: India and the First World War
- National Army Museum: British Indian Army, Soldiers of the First World War
- 1914-1918-Online International Encyclopedia of the First World War: War Losses (India), Andrew Tait Jarboe, 2022
- 1914-1918-Online International Encyclopedia of the First World War: Commemoration, Cult of the Fallen (India), Rana Chhina and Adil Chhina, 2018
- 1914-1918-Online International Encyclopedia of the First World War: Military Planning and Wartime Recruitment (India), David Omissi, 2021
- Encyclopaedia Britannica: India Gate
- Western Front Association: The Battle of Neuve Chapelle, 1915
- Victoria Cross Online: Khudadad Khan VC
- Birmingham City University, Stories of Sacrifice: Victoria Cross winners (National Army Museum profile of Khudadad Khan)
- Brighton Dome and Brighton Festival: Envelope sent from the Indian Military Hospital, Royal Pavilion Estate, 1915
- Brighton and Hove City Council: The Chattri Memorial
- Outlook India (PTI), 10 November 2018: Vice President inaugurates the war memorial at Villers-Guislain
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