चित्रण: tuput
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2 जुलाई और 2 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने उन आदेशों को रद्द किया जो गढ़े हुए या ग़लत उद्धृत मुक़दमों पर टिके थे। वही अदालत फ़ैसलों के अनुवाद और सुनवाइयों के ट्रांसक्रिप्शन में एआई इस्तेमाल करती है, और अदालतों में एआई के उसके मसौदा नियम 2 सितंबर तक भी अंतिम नहीं हुए थे।
2 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने ₹425,27,99,100, यानी लगभग ₹425 करोड़, का एक सीमा शुल्क जुर्माना रद्द कर दिया, अधिकारी के दिए मुक़दमों की जाँच ख़ुद करने के बाद। उसके आदेश के अनुसार इनमें से कुछ मुक़दमे हैं ही नहीं या उनके हवाले नक़ली हैं, और बाक़ी असली हैं पर वह नहीं कहते जो आदेश उनसे कहलवाता है। दो महीने में इस कारण से किसी आदेश को शून्य करने का यह दूसरा फ़ैसला था।
सुप्रीम कोर्ट फ़ैसलों के अनुवाद और सुनवाइयों के ट्रांसक्रिप्शन में भी एआई का उपयोग करता है, और जून 2026 से वह अदालतों में एआई के मसौदा नियमों पर टिप्पणियाँ ले रहा है। यह लेख बताता है कि अदालत और सरकार के दस्तावेज़ों के मुताबिक़ हर औज़ार क्या करता है, क्या नहीं करता, और दस्तावेज़ कहाँ आपस में असहमत हैं।
सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक़ उसके औज़ार क्या करते हैं
क़ानून और न्याय राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल के लोक सभा जवाब में, जिसे पीआईबी ने 25 जुलाई 2025 को छापा, अदालत के एआई इस्तेमाल गिनाए गए हैं। एक सॉफ़्टवेयर संविधान पीठ के मामलों में मौखिक बहस का ट्रांसक्रिप्शन करता है। राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (एनआईसी) के साथ मिलकर अदालत फ़ैसलों का अंग्रेज़ी से 18 भारतीय भाषाओं में अनुवाद करती है। वह औज़ार SUVAS है, सुप्रीम कोर्ट विधिक अनुवाद सॉफ़्टवेयर। आईआईटी मद्रास के साथ अदालत ने इलेक्ट्रॉनिक फ़ाइलिंग की ख़ामियाँ पकड़ने वाला एक औज़ार बनाया है, और उसका प्रोटोटाइप 200 एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड के लिए खोला जा चुका था, यानी उन वकीलों के लिए जो सुप्रीम कोर्ट में याचिकाओं पर हस्ताक्षर करके उन्हें दाख़िल करते हैं।
पीआईबी की 11 फ़रवरी 2026 की पृष्ठभूमि-पत्री जोड़ती है कि ट्रांसक्रिप्शन अब नियमित सुनवाई वाले दिनों तक फैल रहा है, और अंतिम पुष्टि इंसान करते हैं।
दो औज़ार कम तय हैं। 2025 का जवाब कहता है कि SUPACE, किसी मामले के तथ्य छाँटने और पूर्व-निर्णय खोजने के लिए बनी प्रणाली, “विकास की प्रायोगिक अवस्था में” है और अदालत के जीपीयू और टीपीयू ख़रीदने के बाद तैनात की जा सकती है। फ़रवरी 2026 की पृष्ठभूमि-पत्री कहती है कि वह “नियमित न्यायिक उपयोग के लिए अभी तैनात नहीं” है। अदालत का नवंबर 2025 का अपना श्वेत पत्र SUPACE को ऐसा मंच बताता है जो मामले के रिकॉर्ड का विश्लेषण करता है और मुख्य पूर्व-निर्णय निकालता है, इस स्थिति का ज़िक्र किए बिना।
दूसरा औज़ार LegRAA है, लीगल रिसर्च एनालिसिस असिस्टेंट, जिसे एनआईसी की एआई डिवीज़न और पुणे के ई-कोर्ट उत्कृष्टता केंद्र ने बनाया है। टेक ऑब्ज़र्वर की रिपोर्ट के अनुसार 31 जुलाई 2026 के लोक सभा जवाब में सरकार ने तब भी LegRAA को पायलट कहा। पृष्ठभूमि-पत्री कहती है कि नतीजे सुझाने या फ़ैसले लिखने में उसकी कोई भूमिका नहीं है।
दस्तावेज़ कुछ जगह असहमत हैं। पीआईबी SUVAS के लिए 18 भाषाएँ गिनता है, जबकि श्वेत पत्र कहता है कि उसने 2023 में लगभग 36,000 फ़ैसले 19 भाषाओं में अनुवादित किए। 2025 के जवाब का एक वाक्य कहता है कि औज़ार “सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया द्वारा निर्णय लेने की प्रक्रिया में इस्तेमाल किए जा रहे हैं।” बाक़ी हर सरकारी दस्तावेज़ इसका उलटा कहता है, इसलिए tuput इसे छूटा हुआ “नहीं” पढ़ता है, हालाँकि मंत्रालय से यह पुष्ट नहीं कर सका।
₹7,210 करोड़ में से ₹53.57 करोड़
न्याय विभाग की चलाई ई-कोर्ट्स चरण III योजना का परिव्यय ₹7,210 करोड़ है। 7 दिसंबर 2023 का राज्यसभा संलग्नक इसे मदों में बाँटता है, जिनमें से एक “भविष्य की तकनीकी प्रगति” है, ₹53.57 करोड़ की। 19 दिसंबर 2025 को रिपोर्ट हुआ लोक सभा जवाब इस मद को एआई और ब्लॉकचेन को कवर करने वाली बताता है। tuput के अपने गणित से यह कुल का 0.74 प्रतिशत है।
उसी जवाब ने कहा कि न्यायिक प्रक्रियाओं में एआई अपनाने की अभी कोई औपचारिक नीति या दिशानिर्देश नहीं हैं। उसने कहा कि एआई सिर्फ़ नियंत्रित पायलट में चलता है, उन्हीं क्षेत्रों के भीतर जिन्हें परियोजना रिपोर्ट मंज़ूर करती है, और उसका उपयोग हर हाई कोर्ट के अपने नियम तय करते हैं। सुप्रीम कोर्ट की ई-कमेटी ने डेटा सुरक्षा पर छह हाई कोर्ट जजों और तकनीकी विशेषज्ञों की एक उप-समिति बनाई, और पायलटों में किसी प्रणालीगत पक्षपात या अन्य समस्या की सूचना नहीं दी। tuput को इस बयान के पीछे कोई प्रकाशित ऑडिट नहीं मिला।
10 दिसंबर 2025 को मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने सुप्रीम कोर्ट की एआई समिति का न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा के अधीन पुनर्गठन किया, ताकि सुप्रीम कोर्ट और निचली अदालतों में एआई औज़ारों की निगरानी हो।
हाई कोर्ट रेखा अलग-अलग जगह खींचते हैं
केरल हाई कोर्ट की अपने ज़िला न्यायपालिका के लिए नीति 19 जुलाई 2025 की है। वह एआई औज़ारों को किसी निष्कर्ष, राहत, आदेश या फ़ैसले तक पहुँचने के लिए इस्तेमाल करने से रोकती है। अधिकारियों को मंज़ूरी के बिना क्लाउड-आधारित एआई सेवाओं से बचना है, मंज़ूर औज़ारों के नतीजों की, क़ानूनी हवालों समेत, पुष्टि करनी है, और हर उपयोग का ऑडिट रिकॉर्ड रखना है।
21 अक्टूबर 2025 के एक केरल ज्ञापन ने फिर 1 नवंबर 2025 से राज्य की सभी अदालतों में गवाहों के बयान दर्ज करने के लिए Adalat.AI नाम का स्पीच-टू-टेक्स्ट औज़ार अनिवार्य कर दिया। हाई कोर्ट एआई को मामलों का फ़ैसला करने से रोकता है और गवाही टाइप करने के लिए उसे ज़रूरी बनाता है।
बार एंड बेंच ने 4 अप्रैल 2026 को जिस गुजरात हाई कोर्ट की नीति की ख़बर दी, वह भी एआई को फ़ैसले और आदेश लिखने, ज़मानत और सज़ा तय करने, और सबूतों को छाँटने या आँकने से रोकती है। वह सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट जैसे स्रोतों से सत्यापित क़ानूनी शोध की इजाज़त देती है, और उल्लंघन को कदाचार मानती है।
सुप्रीम कोर्ट के मसौदा नियम
सुप्रीम कोर्ट की एआई समिति ने 3 जून 2026 को अदालतों में एआई के उपयोग के लिए मसौदा विनियम, 2026 प्रकाशित किए और 20 जून तक टिप्पणियाँ माँगीं। 16 जून की एक सूचना ने समय-सीमा 15 जुलाई कर दी। मसौदा सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्टों, निचली अदालतों और अधिकरणों को कवर करेगा, हर एक पर वह उस तारीख़ से लागू होगा जो उसके मुख्य न्यायाधीश तय करें।
विनियम 4 कहता है कि एआई को “हर समय मानवीय विवेक के अधीन कड़ाई से रहना” चाहिए। विनियम 20 अकेले एआई से निकले किसी भी नतीजे को मना करता है और भागने के जोखिम, दोबारा अपराध, ज़मानत की पात्रता या गवाह की विश्वसनीयता के लिए एआई जोखिम-अंकन को मना करता है। विनियम 43 कहता है कि जिस पक्ष ने याचिका में एआई इस्तेमाल किया, उसे घोषणा दाख़िल करनी होगी, और एआई से गढ़ी सामग्री दाख़िल करने वाला व्यक्ति एआई को अपनी सफ़ाई में पेश नहीं कर सकता।
इंटरनेट फ़्रीडम फ़ाउंडेशन की 15 जुलाई 2026 की टिप्पणियाँ विनियम 20 की मनाहियों का समर्थन करती हैं। वे विनियम 16 और 17 पर आपत्ति करती हैं, जो जब तक उलटा साबित न हो, एआई अपनाने के पक्ष में धारणा बनाते हैं, और विनियम 22(2)(e) पर, जो शीर्ष संस्था में MeitY के एक संयुक्त सचिव को बैठाता है। सुप्रीम कोर्ट का 2 सितंबर 2026 का आदेश कहता है कि विनियम “अभी अंतिम होने हैं।“
गढ़े हुए केस-क़ानून पर सुप्रीम कोर्ट के तीन आदेश
चैटबॉट ऐसा विश्वसनीय लगने वाला पाठ रच सकते हैं जो सिर्फ़ गढ़ा हुआ होता है, और सुप्रीम कोर्ट अब तीन बार इस बात से निपट चुका है कि जब वह पाठ किसी आदेश में पहुँच जाए तो क्या होता है।
27 फ़रवरी 2026 को न्यायमूर्ति नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे ने एक निचली अदालत के 19 अगस्त 2025 के उस आदेश का संज्ञान लिया जो ऐसे चार फ़ैसलों पर टिका था जिनके बारे में याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वे हैं ही नहीं। आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने नोट किया था कि वे एआई से बने लगते हैं, पर पुनरीक्षण याचिका ख़ारिज कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे फ़ैसलों पर निर्भरता कदाचार होगी, चूक नहीं, अटॉर्नी जनरल, सॉलिसिटर जनरल और बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया को नोटिस जारी किया, और वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान को सहायता के लिए नियुक्त किया।
2 जुलाई 2026 को, पूजा रमेश सिंह बनाम जम्मू और कश्मीर बैंक में, उसी पीठ ने एस्सेल इन्फ्राप्रोजेक्ट्स के ख़िलाफ़ एक दिवालिया मामले में एनसीएलटी के 28 अगस्त 2024 और एनसीएलएटी के 11 सितंबर 2025 के आदेश रद्द कर दिए। फ़ैसले का पैराग्राफ़ 15 एनसीएलटी के उद्धृत छह प्राधिकारों की जाँच करता है। तीन हवाले मौजूद नहीं हैं, एक असली फ़ैसले का ग़लत हवाला है, और दो असली हवाले हैं जिनके पैराग्राफ़ मौजूद नहीं हैं। बैंक के हलफ़नामे में कहा गया कि उसके वकील ने उन्हें सुनवाई में उद्धृत नहीं किया था और एनसीएलटी ने उन्हें अपने शोध से पाया।
अदालत ने ठहराया कि अनसत्यापित एआई सामग्री का हवाला देना अधिवक्ता के लिए कदाचार और जज के लिए गंभीर चूक है, और उस पर टिका फ़ैसला “क़ानून की नज़र में कोई फ़ैसला नहीं” है। उसने बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया को एक समिति बनाने का निर्देश दिया जो मार्गदर्शक सिद्धांत और अनुशासनात्मक कार्रवाई तय करे, और कहा कि यह फ़ैसला एआई के उचित उपयोग को नहीं छूता। tuput को समिति गठित करने वाली बार काउंसिल की कोई अधिसूचना नहीं मिली।
2 सितंबर 2026 के गडिया आदेश ने उसी निर्णय को दोहराया। न्यायमूर्ति दत्ता ने लिखा कि “सहायता कभी न्याय-निर्णय की जगह नहीं ले सकती” और एआई “प्रशिक्षण के पहियों का काम बेशक कर सकता है, पर पायलट की सीट उसे सौंप देना नासमझी भी होगा और ख़तरनाक भी।” अदालत ने 8 अक्टूबर 2025 का सीमा शुल्क आदेश और गुजरात हाई कोर्ट का 20 जनवरी 2026 का वह आदेश रद्द किया जिसने उसे बरक़रार रखा था। नया फ़ैसला उसी रैंक के दूसरे अधिकारी के पास जाता है, और मूल आदेश लिखने वाले अधिकारी पर कार्रवाई उस अधिकारी के नियुक्ति प्राधिकरण पर छोड़ दी गई है।
अदालतों के बाहर भाषिणी
अदालतों के बाहर सबसे अच्छी तरह दर्ज सरकारी औज़ार भाषिणी है, जो इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) का भाषा मंच है। पीआईबी की फ़रवरी 2026 की पृष्ठभूमि-पत्री कहती है कि जुलाई 2022 से वह 12 लाख डाउनलोड पार कर चुका है, 36 या उससे ज़्यादा भाषाओं को समर्थन देता है, 350 से ज़्यादा एआई मॉडल जोड़ता है और उसके 450 या उससे ज़्यादा सक्रिय ग्राहक हैं। अदालत का श्वेत पत्र कहता है कि अदालतें भाषिणी का उपयोग बोली को टेक्स्ट में बदलने और दस्तावेज़ों के ऑडियो संस्करण बनाने में करती हैं, एक ऐसे वाक्य में जिसमें कोई आँकड़ा नहीं है। हमारे पुराने लेख भाषिणी और भारतीय भाषाओं के एआई और इंडियाएआई मिशन के पीछे के पैसे को कवर करते हैं।
रिकॉर्ड जो नहीं दिखाता
ऊपर के किसी भी दस्तावेज़ में SUVAS, ट्रांसक्रिप्शन औज़ार या ई-फ़ाइलिंग जाँचकर्ता की कोई त्रुटि दर नहीं दी गई है। 31 जुलाई 2026 का जवाब, जैसा टेक ऑब्ज़र्वर ने रिपोर्ट किया, कहता है कि LegRAA और डिजिटल कोर्ट्स 2.1 का आगे का उपयोग सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्टों के नियमों और नीतियों से तय होगा। मसौदा नियमों पर टिप्पणी की खिड़की 15 जुलाई 2026 को बंद हुई, और 2 सितंबर को भी सुप्रीम कोर्ट विनियमों को अंतिम होना बाक़ी बता रहा था।
स्रोत और आगे पढ़ने के लिए
- PIB: Use of Artificial Intelligence in Supreme Court, Lok Sabha reply (25 July 2025)
- PIB Backgrounder: From Digitisation to Intelligence, How AI is Enhancing Access to Justice in India (11 February 2026)
- Rajya Sabha Unstarred Question 589, Annexure I: components and costs of eCourts Phase III (7 December 2023)
- DD News: AI use in courts remains in pilot phase, no formal policy yet (19 December 2025)
- Tech Observer: NIC develops AI tools LegRAA and Digital Courts for judges (1 August 2026)
- Supreme Court Centre for Research and Planning: White Paper on Artificial Intelligence and Judiciary (November 2025)
- LawBeat: CJI Surya Kant reshapes AI Committee, puts Justice P S Narasimha at the helm (11 December 2025)
- High Court of Kerala: Policy Regarding Use of Artificial Intelligence Tools in District Judiciary (official memorandum, 19 July 2025)
- High Court of Kerala: Official Memorandum on mandatory recording of witness depositions using Adalat.AI (21 October 2025)
- High Court of Gujarat: Policy on the Use of Artificial Intelligence in Judicial and Court Administration
- Bar and Bench: Gujarat High Court bans use of AI by judges, court staff in judicial work (4 April 2026)
- Supreme Court of India: notices of 3 and 16 June 2026 and draft Regulations for Use of Artificial Intelligence in Courts, 2026
- Internet Freedom Foundation: Comments on the Draft Regulations on the use of AI in Courts, 2026 (15 July 2026)
- SCC Online: AI-made fake precedents surface in trial court order, Supreme Court issues notice (Gummadi Usha Rani v. Sure Mallikarjuna Rao, 27 February 2026)
- Supreme Court of India: Pooja Ramesh Singh v. Jammu and Kashmir Bank Ltd., judgment of 2 July 2026
- Supreme Court of India: Vijay Ghanshyam Gadiya v. Union of India, order of 2 September 2026
- PIB Backgrounder: Democratising AI in India (10 February 2026)
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