1925 में दस नौजवानों ने लखनऊ के पास एक ट्रेन रोकी। राज ने 26 लोगों पर बादशाह के ख़िलाफ़ जंग छेड़ने की साज़िश का मुक़दमा चलाया और चार को फाँसी दी।
भारतीय इतिहास

1925 में दस नौजवानों ने लखनऊ के पास एक ट्रेन रोकी। राज ने 26 लोगों पर बादशाह के ख़िलाफ़ जंग छेड़ने की साज़िश का मुक़दमा चलाया और चार को फाँसी दी।

चित्रण: tuput

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9 अगस्त 1925 की शाम एक क्रांतिकारी दल के दस सदस्यों ने लखनऊ से दस मील के भीतर 8 डाउन पैसेंजर ट्रेन की ज़ंजीर खींची और गार्ड की तिजोरी तोड़ डाली। सरकार ने 26 लोगों पर सम्राट के ख़िलाफ़ जंग छेड़ने की साज़िश का आरोप लगाया, और मामला सितंबर 1925 की गिरफ़्तारियों से अप्रैल 1927 के फ़ैसले तक चला। 17 और 19 दिसंबर 1927 को चार अभियुक्तों को चार अलग-अलग जेलों में फाँसी दी गई।

tuput संपादकीय टीम · · 15 मिनट का पठन

9 अगस्त 1925 की शाम ढलते वक़्त, लखनऊ से कुछ पहले खुले देहात में रुकी एक पैसेंजर ट्रेन के पास लोहे की एक तिजोरी पर हथौड़ा बज रहा था। छेनियाँ फ़ौलाद पर ज़्यादा असर नहीं कर पाई थीं, इसलिए धावा बोलने वालों में सबसे ताक़तवर अशफ़ाक़उल्ला ख़ान ने अपना पिस्तौल एक साथी को थमाया और बड़ा हथौड़ा अपने हाथ में ले लिया। तभी अँधेरे में से दूसरी ट्रेन की आवाज़ आई और पटरी पर एक हेडलाइट बड़ी होती चली आई।

दस लोगों में से एक, मन्मथनाथ गुप्त ने अपने संस्मरण They Lived Dangerously (1956) में अगले एक मिनट का हाल लिखा है। उन्हें फ़ौजी गाड़ी का डर था। दल के नेता राम प्रसाद बिस्मिल ने देखा कि पटरी दोहरी है और उन्हें याद आया कि पंजाब मेल का वक़्त है। उन्होंने सबसे कहा कि हथियार छिपा लो और तमाशबीनों की तरह खड़े हो जाओ। अशफ़ाक़उल्ला ने हथौड़ा नीचे रख दिया। कुछ ही पलों में मेल रोशनी की गरज के साथ गुज़र गई, और उन्होंने हथौड़ा फिर उठा लिया, जब तक तिजोरी में इतना बड़ा सुराख़ नहीं हो गया कि थैले खींचकर निकाले जा सकें।

कलकत्ता से छपने वाले सार्वजनिक मामलों के संकलन इंडियन क्वार्टरली रजिस्टर ने आगे चलकर इस मामले को “हिंदुस्तान के सबसे बड़े षड्यंत्र मुक़दमों में से एक” कहा। 1927 के बाद दल ने क्या किया, यह भगत सिंह वाले लेख में है। यह लेख ट्रेन, गिरफ़्तारियों, अदालत और फाँसी के तख़्ते तक ही रहता है।

पैसा और एक घोषणापत्र

बिस्मिल ने वजह ख़ुद बताई है। उन्होंने अपनी आत्मकथा गोरखपुर जेल की फाँसी वाली कोठरी में, फाँसी का इंतज़ार करते हुए लिखी, और दल ने जो भी लिखित ब्योरा छोड़ा, उसमें यही सबसे पूरा है। उनके बयान के मुताबिक़ असहयोग आंदोलन ढीला पड़ चुका था, और जिन नौजवानों पर उन्हें भरोसा था वे ख़ाली जेब और हताश होकर आते थे। ज़िलों के संगठनकर्ताओं को दल से छोटी मासिक रक़में मिलती थीं, और जब मददगारों ने हाथ खींचा तो उन्होंने उधार लेकर उन्हें एक महीने का ख़र्च दिया। न कोई चंदा देता था, न कोई उधार। विदेशी बने नए हथियार बेचने वाला एक सौदागर उधार पर माल देने को तैयार था, पर दल के पास चुकाने को कुछ नहीं था।

इसलिए दल ने डकैती का फ़ैसला किया। निजी संपत्ति पर हाथ नहीं डालना था, बिस्मिल ने लिखा, और उन्होंने पूछा कि सरकारी पैसा क्यों न लिया जाए। एक रेल सफ़र में उन्होंने गार्ड के डिब्बे में लोहे का एक संदूक देखा था, और लखनऊ स्टेशन पर उन्होंने कुलियों को ऐसे संदूक एक ट्रेन से उतारकर ले जाते देखा, जिन पर न ज़ंजीर थी न ताला। उनके अनुमान से सहारनपुर और लखनऊ के बीच की वसूली क़रीब दस हज़ार रुपये बैठती थी।

दल के भीतर की बहस गुप्त बताते हैं। वे कहते हैं कि मुख़बिरों ने कई गाँवों की डकैतियाँ चौपट कर दीं, तो दल ने ऐसे धावे छोड़ दिए थे, और अकेले अशफ़ाक़उल्ला ने रेलवे के पैसे को हाथ लगाने के ख़िलाफ़ दलील दी, क्योंकि इससे पूरी सरकार उन पर टूट पड़ेगी। बिस्मिल ने नेतृत्व करना तभी माना जब नौजवानों ने, जो एक साथी के साथ हुए बुरे सलूक का बदला लेने के लिए किसी भी अंग्रेज़ ड्राइवर या गार्ड को मार डालना चाहते थे, वचन दिया कि जान-बूझकर किसी की हत्या नहीं की जाएगी।

दल की राजनीति काग़ज़ पर पहले ही आ चुकी थी। The Revolutionary नाम के एक पर्चे में लिखा था कि “राजनीति के क्षेत्र में क्रांतिकारी दल का तात्कालिक उद्देश्य एक संगठित और सशस्त्र क्रांति के द्वारा भारत के संयुक्त राज्यों का एक संघीय गणराज्य स्थापित करना है।” उसमें यह भी था: “यह स्वतंत्रता शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीक़ों से कभी हासिल नहीं की जा सकती।” सचींद्रनाथ सान्याल, जिन्हें मुक़दमे के जज ने बाद में दल के विचारों का मुख्य स्रोत बताया, बिस्मिल के मुताबिक़ इसे बाँकुरा में बाँटने के लिए पहले ही दो साल की सज़ा पा चुके थे। दृष्टि आईएएस हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की स्थापना, यानी उस नाम की, जिससे दल जाना जाता है, अक्टूबर 1924 में बताता है।

8 डाउन पर दस लोग

दस मिनट की चूक ने पहली योजना डुबो दी। गुप्त लिखते हैं कि एक दिन पहले दसों लखनऊ में जमा हुए और एक छोटे स्टेशन की ओर चले, इरादा था कि स्टाफ़ को क़ाबू में करके खड़ी ट्रेन से दिन की नक़दी ले ली जाए। वह ट्रेन, 8 डाउन, जो दिन भर की स्टेशन वसूली लखनऊ ले जाती थी, उनके पहुँचने से ठीक पहले भाप उड़ाती निकल गई।

9 अगस्त को उन्होंने योजना बदली। अशफ़ाक़उल्ला, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी और सचींद्रनाथ बख़्शी ने दूसरे दर्जे के टिकट लिए और ज़ंजीर खींचने का ज़िम्मा लिया, जबकि बाक़ी सात तीसरे दर्जे के डिब्बों में फैल गए। गुप्त इन सात के नाम गिनाते हैं: बिस्मिल, चंद्रशेखर आज़ाद, मुकुंदीलाल, मुरारीलाल, कुंदनलाल, बनवारीलाल और वे ख़ुद। 1972 में छपे क्रांतिकारी आंदोलन के उनके इतिहास में एक अलग सूची मिलती है, जिसमें रोशन सिंह और केशब चक्रवर्ती भी शामिल हैं, इसलिए दसों की सूची तय नहीं है।

ट्रेन जब रुकी तो शाम उतर चुकी थी, और तीसरे दर्जे के लोग ऐसे उतरे मानो देरी का सबब देखना चाहते हों। उन्होंने गार्ड को पेट के बल लिटा दिया। गुप्त लिखते हैं कि पटरी के दोनों तरफ़ दो-दो आदमी माउज़र पिस्तौलें लेकर खड़े थे, और यात्रियों से हिंदुस्तानी में कहा गया कि “हमें सिर्फ़ सरकारी माल से मतलब है।” बिस्मिल के मुताबिक़ चौदह यात्रियों के पास बंदूकें या राइफ़लें थीं, जिनमें दो हथियारबंद ब्रिटिश सिपाही भी थे, और कोई नहीं हिला। इंजन में ड्राइवर लेट गया, और एक अंग्रेज़ ने ख़ुद को शौचालय में बंद कर लिया।

नक़दी के थैले एक चादर में बाँध लिए गए। लखनऊ के रास्ते में लोगों ने पैसे निकाल लिए और ख़ाली थैले बारिश के पानी से भरे गड्ढों में फेंक दिए, जहाँ से, गुप्त के मुताबिक़, बाद में उन्होंने पुलिस को बताया कि धावा बोलने वाले किधर गए थे। दसों लोग चौक बाज़ार से होकर लखनऊ में दाख़िल हुए। सुबह गुप्त ने इंडियन डेली टेलीग्राफ़ ख़रीदा, जिसमें छपा था कि तीन लोगों की हत्या हो गई है, जिनमें एक यूरोपीय है, जबकि कोई यूरोपीय मारा नहीं गया था।

लूट की रक़म के ब्योरे अलग-अलग हैं। 2024 के एक संपादकीय में उद्धृत काकोरी की सूचना-पट्टिका 4,679 रुपये, एक आना और छह पाई बताती है। चमन लाल का बिस्मिल पर निबंध आठ हज़ार रुपये कहता है, और बिस्मिल को दस हज़ार की उम्मीद थी।

वह यात्री जो पत्नी को ढूँढने उतरा था

एक आदमी मारा गया। बिस्मिल के मुताबिक़, उनके एक आदमी ने गार्ड के डिब्बे से माउज़र लेकर उतरकर, आदेश के ख़िलाफ़, मज़े के लिए गोलियाँ चलानी शुरू कर दीं। एक यात्री अपनी पत्नी तक पहुँचने के लिए ट्रेन से उतरा था, और बिस्मिल का मानना था कि इसी आदमी की गोली से वह मरा। उनका अपना आदेश यह था कि हमला होने पर ही कोई गोली चलाए, और पटरी की निगरानी में लगाए गए दो आदमियों से कहा गया था कि वे पाँच-पाँच मिनट के अंतर से गोली चलाएँ।

गुप्त मृतक का नाम अमजद अली बताते हैं, कहते हैं कि वह यह देखने के लिए अपने डिब्बे से निकला था कि उसकी नई-नवेली दुल्हन सुरक्षित है या नहीं, और उसे “उड़ती गोलियों से मारा गया” बताते हैं, जो यात्रियों को अपनी सीटों पर बनाए रखने के लिए चलाई गई थीं। बाद के कई ब्योरे, जीकेटुडे के भी, कहते हैं कि गोली गुप्त ने ख़ुद चलाई थी।

अदालत में नाम अहमद अली था, और जज इरादे के सवाल पर सावधान थे। सज़ा सुनाते वक़्त जज ने कहा कि “यह असंभाव्य है कि अहमद अली, जिसे गोली लगी, जान-बूझकर निशाना बनाया गया हो,” और जोड़ा: “लेकिन फिर भी ट्रेन के दोनों ओर गोलियाँ चलाना मानव जीवन के प्रति उपेक्षा दिखाता था।“

26 सितंबर 1925

पुलिस की कार्रवाई हफ़्तों में शुरू हो गई। बिस्मिल कहते हैं कि सीआईडी अफ़सर हॉर्टन, जिसे जाँच सौंपी गई, ने घटनास्थल और रेलवे पुलिस की रिपोर्टें देखकर अंदाज़ा लगाया कि इसके पीछे क्रांतिकारी हैं। तिजोरी के नोट शाहजहाँपुर में मिले, और वहाँ के सरकारी स्कूल के हेडमास्टर ने एक छात्र इंदुभूषण मित्र के नाम आई चिट्ठियों की नक़ल उतारकर हॉर्टन को भेज दी। बिस्मिल के मुताबिक़ 26 सितंबर 1925 को हॉर्टन ने पूरे प्रांत में क़रीब तीस लोगों को गिरफ़्तार करवाया।

राजेंद्रनाथ लाहिड़ी नवंबर में कलकत्ता के पास दक्षिणेश्वर के एक बम बनाने वाले घर में पकड़े गए। 1925 के अंत तक पुलिस ने गिरफ़्तार किए गए कुछ लोगों के ख़िलाफ़ मामला वापस ले लिया और 26 को विशेष मजिस्ट्रेट सैयद ऐनुद्दीन के सामने भेजा, सम्राट के ख़िलाफ़ जंग छेड़ने की साज़िश और हत्या सहित डकैती (सशस्त्र लूट) की साज़िश के आरोपों पर। तीन लोग तब भी फ़रार थे: बख़्शी, आज़ाद और अशफ़ाक़उल्ला, बिस्मिल कहते हैं। दो और सरकारी गवाह बन गए, यानी माफ़ी के बदले ताज के पक्ष में गवाही देने को राज़ी हो गए, और मजिस्ट्रेट ने बाक़ी 21 को सत्र न्यायालय भेज दिया।

हिंदुस्तानी नेताओं ने जल्दी प्रतिक्रिया दी। दिसंबर 1925 में कानपुर कांग्रेस में स्वागत समिति के अध्यक्ष डॉ. मुरारीलाल ने, रजिस्टर में उनके भाषण के सार के मुताबिक़, “काकोरी मुक़दमे” की बात की, “जिसने उनके बहुत से उत्साही और सच्चे कार्यकर्ताओं को छीन लिया था, जिनमें से बहुतों को ज़मानत तक नहीं दी गई थी।” वहीं 28 दिसंबर को राजनीतिक क़ैदियों के एक सम्मेलन में स्वामी कुमारानंद ने कहा कि अफ़वाह चल रही है कि संयुक्त प्रांत की सरकार काकोरी मामले के बल पर एक अध्यादेश जारी करना चाहती है।

अठारह महीने अदालत में

हैमिल्टन नाम के एक विशेष जज ने लखनऊ में मुख्य मामले की सुनवाई की। गुप्त के मुताबिक़ उनकी शोहरत फाँसी देने वाले जज की थी। क्वार्टरली रजिस्टर दर्ज करता है कि अभियोजन के 250 से ज़्यादा गवाह बुलाए गए और लगभग 1,100 प्रदर्श पेश किए गए। खुली अदालत में मामला डेढ़ साल चला, बिस्मिल ने लिखा।

गुप्त के बयान के मुताबिक़ दोनों पक्ष बराबरी के नहीं थे। सरकार के वकील जगत नारायण मुल्ला को 500 रुपये रोज़ पर रखा गया था, जबकि बचाव समिति अपने पूरे समय के बैरिस्टर चौधरी को 500 रुपये महीना ही दे पाती थी। गोविंद बल्लभ पंत, मोहनलाल सक्सेना, ख़लीक़ुज़्ज़माँ और दूसरों ने भी बचाव में काम किया, और मोतीलाल नेहरू ने वकील ढूँढने में मदद की।

6 अप्रैल 1927

फ़ैसले की सुबह अभियुक्तों ने अदालत जाते हुए गाना गाया। गुप्त लिखते हैं कि अदालत के बाहर उन्होंने भीड़ की ओर मुड़कर “सरफ़रोशी की तमन्ना” गाई, और अंदर जाते हुए भी गाते रहे। रेख़्ता के मुताबिक़ यह ग़ज़ल पटना के शायर बिस्मिल अज़ीमाबादी की है। राम प्रसाद बिस्मिल का नाम इससे इसलिए जुड़ा है कि कहा जाता है, शुरुआती पंक्तियाँ फाँसी के तख़्ते पर उनके होंठों पर थीं।

गुप्त के बयान में हैमिल्टन ने अपने निष्कर्षों का सार सुनाया और फिर सज़ाएँ वर्णमाला के क्रम में पढ़ीं।

तीन लोगों को फाँसी की सज़ा मिली: बिस्मिल, लाहिड़ी और रोशन सिंह। सान्याल को आजीवन निर्वासन (ट्रांसपोर्टेशन फ़ॉर लाइफ़) मिला और गुप्त को चौदह साल। बाक़ियों को पाँच, सात या दस साल की क़ैद मिली, दो लोग बरी हुए, और दोनों सरकारी गवाहों को माफ़ी मिली। रजिस्टर के मुताबिक़ जज ने बिस्मिल को मार्च 1925 की बिचपुरी की डकैती और ट्रेन डकैती का दोषी पाया, और लाहिड़ी को ट्रेन डकैती का। रोशन सिंह को साज़िश और दिसंबर 1924 की बमरौली डकैती का दोषी पाया गया, ट्रेन डकैती का नहीं। सज़ा पढ़े जाते वक़्त लाहिड़ी के बगल में खड़े गुप्त ने उन्हें बंगाली में कहते सुना कि दुनिया बदली हुई सी लगती है।

उनके कारण दर्ज हैं, और वे सब कठोर नहीं थे। उन्होंने बताया कि सरकारी वकील ने ख़ुद उनसे कहा था कि “उन लोगों के मामले में, जो नौजवान हैं और जिन्होंने इस साज़िश में केवल गौण भूमिका निभाई, न्याय में दया का पुट मिलाइए,” और कहा कि उनका मानना है कि “अभियुक्तों की भारी बहुसंख्या इस साज़िश में किसी निजी लाभ या फ़ायदे के बिना शामिल हुई।” इसके उलट, उन्होंने पाया कि दल की चार डकैतियों में से हर एक में एक आदमी मारा गया था, और उन्होंने हर सदस्य को ज़िम्मेदार ठहराया। “सफ़ेद पर्चे के लेखक ने जिस रूप में क्रांति को समझा है, उसका मतलब अराजकता है,” उन्होंने लिखा।

सज़ा सुनाते समय उनकी टिप्पणियों में एक सिफ़ारिश थी जो आगे चलकर मायने रखने लगी। अगर किसी अभियुक्त ने पछतावा किया हो, उन्होंने कहा, तो “मेरी सिफ़ारिश है कि सरकार इस पर विचार करे, जैसा मैंने बनवारी के मामले में किया है।” बनवारी लाल, ट्रेन पर मौजूद दस लोगों में से एक, ने इक़बाल कर लिया था और उसे पाँच साल मिले थे।

वह अपील जिसने हालत और बिगाड़ दी

अशफ़ाक़उल्ला पर दिल्ली में गिरफ़्तारी के बाद अलग से मुक़दमा चला। गुप्त के बयान के मुताबिक़ वहाँ एक जान-पहचान वाले ने उनके साथ धोखा किया, जब वे रूस जाने के रास्ते में अफ़ग़ानिस्तान पहुँचने की कोशिश कर रहे थे। पूरक मामले में उन्हें मौत की सज़ा मिली और बख़्शी को आजीवन निर्वासन।

दोनों मामले साथ-साथ अवध की चीफ़ कोर्ट पहुँचे। अपील पर, गुप्त के मुताबिक़, सरकार ने छह अभियुक्तों की सज़ा बढ़वाने की कोशिश की, और अदालत ने पाँच की बढ़ा दी, जिनमें तीन की दस साल से आजीवन निर्वासन तक। गुप्त के अपने चौदह साल इसलिए बने रहे कि, उनके शब्दों में, अदालत ने कहा कि कम उम्र न होती तो वह उन्हें सबसे बड़ी सज़ा देती। गृह सदस्य क्रेरर ने 23 अगस्त 1927 को असेंबली में कहा, रजिस्टर के मुताबिक़, कि काकोरी का मामला, “जो कल ही ख़त्म हुआ, एक या अधिक ख़तरनाक क़िस्म के संगठनों के अस्तित्व को साबित करता है।” क्रेरर सर हरि सिंह गौर के उस प्रस्ताव का जवाब दे रहे थे जो क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट ऐक्ट में संशोधन चाहता था, जिसके तहत सरकार संगठनों को ग़ैर-क़ानूनी घोषित कर सकती थी।

चीफ़ कोर्ट के सामने, बिस्मिल ने लिखा, जजों ने गवर्नर को दिए गए उनके लिखित वादे पर यक़ीन नहीं किया कि वे दल से कोई वास्ता नहीं रखेंगे, और उन्हें बेरहम हत्यारा कहा। उनकी अपीलों में एक क़ानूनी दलील भी चलती रही। अगर फाँसी की सज़ाएँ डकैती की ज़िम्मेदारी पर टिकी थीं, उन्होंने लिखा, तो फ़ैसले ने ख़ुद उन्हें नेता बताया था, इसलिए फाँसी अकेले उन्हें होनी चाहिए, और कोई नहीं कह सकता था कि यात्री को किसकी गोली लगी। संयुक्त प्रांत की काउंसिल के निर्वाचित सदस्यों और असेंबली तथा काउंसिल ऑफ़ स्टेट के सदस्यों ने दया की अर्ज़ी दी, उन्होंने लिखा, और उनके पिता ने भी, ज़मींदारों और मानद मजिस्ट्रेटों के क़रीब 250 दस्तख़तों के साथ। असेंबली की अर्ज़ी ने ध्यान दिलाया कि सत्र न्यायाधीश ने ख़ुद पछतावे पर नरमी की सिफ़ारिश की थी। वायसराय ने सब ठुकरा दीं, और मोहनलाल सक्सेना के ज़रिए दायर की गई प्रिवी काउंसिल की अपील भी नाकाम रही।

फ़ैसले के बाद क़ैदी राजनीतिक क़ैदियों के साथ होने वाले बर्ताव के ख़िलाफ़ भूख हड़ताल पर चले गए, और रजिस्टर का घटनाक्रम 17 मई 1927 को चालीसवाँ दिन गिनता है। गुप्त कहते हैं कि फाँसी की तारीख़ अक्टूबर में दो बार तय हुई और दोनों बार टल गई, और तीसरी तारीख़, 19 दिसंबर, क़ायम रही।

17 और 19 दिसंबर 1927

बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा का आख़िरी अध्याय 16 दिसंबर को शुरू किया। पेंगुइन अनुवाद में, जैसा द बुक रिव्यू उद्धृत करता है, उन्होंने लिखा: “मैं ये पंक्तियाँ 16 दिसंबर 1927 को लिख रहा हूँ।” गोरखपुर में उनकी कोठरी, उन्होंने कहा, नौ फ़ुट गुणा नौ फ़ुट की थी, बिना छाँव के एक खुले अहाते में, और वे रात में तीन-चार घंटे सोते थे, हालाँकि उन्हें उसमें बड़ा आनंद मिलता था। 1857 के विद्रोह के बाद क्रांतिकारी आंदोलन के लिए बलि चढ़ने वाले वे संयुक्त प्रांत के पहले आदमी होंगे, उन्होंने लिखा। आत्मकथा एक दोहे पर ख़त्म होती है जिसमें बिस्मिल, रोशन, लाहिड़ी और अशफ़ाक़ का नाम है और कहा गया है कि उनके ख़ून से सैकड़ों पैदा होंगे।

लाहिड़ी को 17 दिसंबर को गोंडा में फाँसी दी गई, बाक़ियों से दो दिन पहले। प्रेस इन्फ़ॉर्मेशन ब्यूरो की न्यू इंडिया समाचार कहती है कि अंग्रेज़ों को अशांति और जेल तोड़े जाने का डर था। गुप्त वजह को एक अनकहा रहस्य बताते हैं और अपने भाई मन्मोहन की व्याख्या आगे बढ़ाते हैं, कि बाहर के लोग 18 की रात गोंडा जेल में घुसकर लाहिड़ी को छुड़ाने की योजना बना रहे थे और अधिकारियों को इसकी भनक लग गई। लाहिड़ी के आख़िरी शब्द, जैसा न्यू इंडिया समाचार उद्धृत करती है, ये थे: “मैं मर नहीं रहा हूँ, बल्कि आज़ाद भारत में फिर से जन्म लेने जा रहा हूँ।”

19 को बिस्मिल को गोरखपुर में, अशफ़ाक़उल्ला को फ़ैज़ाबाद में और रोशन सिंह को इलाहाबाद में फाँसी दी गई। सज़ाओं के बाद लखनऊ से ट्रेन में सफ़र करते हुए गुप्त एक ही डिब्बे में रोशन सिंह के साथ थे, और उन्हें याद है कि ट्रेन चलते वक़्त वे “ओम, ओम” कह रहे थे, और इलाहाबाद के प्लेटफ़ॉर्म पर अपने सुरक्षा दल के साथ उतरकर बिना पीछे देखे चलते हुए उनकी बेड़ियों की खनक भी। फाँसी की ख़बर गुप्त तक कुछ मील दूर नैनी जेल में दोपहर तक पहुँच गई।

किताब, प्रस्ताव और डाक टिकट

बिस्मिल की पांडुलिपि, द बुक रिव्यू के मुताबिक़, एक हमदर्द जेल वार्डर की मदद से तीन हिस्सों में जेल से बाहर गई। कानपुर के प्रताप के संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी ने इसे 1928 में छापा और अंग्रेज़ों ने इस पर रोक लगा दी। यह काकोरी के शहीद नाम से छपी, गुप्त कहते हैं, और पहला संस्करण एक महीने में बिक गया।

बिस्मिल का आख़िरी संदेश हिंदू-मुस्लिम एकता की अपील था। चमन लाल के मुताबिक़, जिन्होंने उसका अंग्रेज़ी अनुवाद किया है, भगत सिंह ने उसे जनवरी 1928 के पत्र कीर्ति के अंक के लिए पंजाबी में अनूदित किया। उस रूप में बिस्मिल पूछते हैं: “अगर अशफ़ाक़ जैसा धर्मनिष्ठ मुसलमान क्रांतिकारी आंदोलन में राम प्रसाद जैसे आर्य समाजी का दाहिना हाथ हो सकता था, तो बाक़ी हिंदू और मुसलमान अपने छोटे-मोटे स्वार्थ भुलाकर एक क्यों नहीं हो सकते?” उन्होंने जोड़ा: “हिंदू-मुस्लिम एकता; यही हमारी आख़िरी इच्छा थी और यही हमारी यादगार हो सकती है।”

दिसंबर 1927 में मद्रास में हुई भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने, बिना बहस सर्वसम्मति से पारित एक प्रस्ताव में, दर्ज किया “काकोरी मामले में दी गई क्रूर सज़ाओं को माफ़ न करने के सरकार के निष्ठुर रवैये पर अपनी गहरी पीड़ा।” वहीं जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में बैठी अखिल भारतीय रिपब्लिकन कांग्रेस ने कहा कि वह “काकोरी मामले के हमारे कुछ युवा देशभक्तों की न्यायिक हत्या” को आक्रोश के साथ देखती है।

इंडिया पोस्ट ने फाँसियों के सत्तर साल बाद, 19 दिसंबर 1997 को, एक डाक टिकट जारी किया जिसमें बिस्मिल और अशफ़ाक़उल्ला साथ दिखाए गए। अगस्त 2021 में उत्तर प्रदेश सरकार ने “काकोरी कांड” की जगह “काकोरी ट्रेन एक्शन” नाम कर दिया, इस आधार पर कि “कांड” शब्द अपमान का भाव देता है, दृष्टि आईएएस के मुताबिक़। 9 अगस्त 2025 को, लूट के ठीक सौ साल बाद, प्रधानमंत्री ने काकोरी के जवानों को श्रद्धांजलि दी, ऑल इंडिया रेडियो ने बताया।

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स्रोत और आगे पढ़ने के लिए

  1. Manmathnath Gupta, They Lived Dangerously: Reminiscences of a Revolutionary (People's Publishing House, 1956), Internet Archive
  2. Manmathnath Gupta, History of the Indian Revolutionary Movement (Somaiya, 1972), Internet Archive
  3. Ram Prasad Bismil, Atmakatha (autobiography written in Gorakhpur jail, December 1927), Hindi text, Internet Archive
  4. Chaman Lal, Politics of Religion/Communalism and 'The Last Message of Martyr of the Nation Sh. Ram Prasad Bismil' (English translation of the Kirti piece of January 1928), APNA
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  7. The Indian Annual Register, 1927, Vol. II (Calcutta), Home Member Crerar in the Assembly, 23 August 1927, and the Madras Congress resolutions of December 1927, Internet Archive
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  10. New India Samachar (Press Information Bureau), 16 to 31 December 2022, on Rajendra Nath Lahiri
  11. The Book Review, October 2025: review of Ram Prasad Bismil, A Glimpse of My Life (Penguin, 2025, translated by Awadhesh Tripathi)
  12. Rekhta: 'Sarfaroshi ki tamanna', ghazal by Bismil Azimabadi
  13. PWOnlyIAS, 100 Years Ago, When a Train Robbery Shook the Empire (13 August 2024), quoting the notice board at Kakori
  14. GKToday, Kakori Conspiracy Case
  15. Drishti IAS, 100 Years of the Kakori Train Action (August 2025), on the founding of the Hindustan Republican Association in October 1924
  16. Drishti IAS, Kakori Train Case now Kakori Train Action (August 2021)
  17. India Post stamp of 19 December 1997 for Ram Prasad Bismil and Ashfaqullah Khan, iStamp Gallery
  18. All India Radio, PM Modi pays tribute to Kakori heroes on 100th anniversary (9 August 2025)

यह लेख AI उपकरणों की सहायता से शोधित और लिखा गया है, और सटीकता के लिए संपादित किया गया है। यह केवल सामान्य जानकारी और चर्चा के लिए है, पेशेवर सलाह नहीं। हमारे संपादकीय मानक और अस्वीकरण देखें। कोई त्रुटि मिली? हमें बताएँ।

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काकोरी मामले में अशफ़ाक़उल्ला ख़ान पर अपने हिंदू साथियों के ख़िलाफ़ मुड़ने का दबाव डाला गया। उन्होंने इनकार कर दिया, और राज ने 27 की उम्र में उन्हें फाँसी दे दी।
फाँसी की कोठरी से बिस्मिल ने लिखा कि सरकार ने अशफ़ाक़उल्ला ख़ान को उनका दायाँ हाथ ठहरा दिया था। फाँसियों के सात दिन बाद इंडियन नेशनल कांग्रेस ने इन सज़ाओं पर अपनी पीड़ा दर्ज की।
राम प्रसाद बिस्मिल ने काकोरी में ट्रेन पर धावे की अगुवाई की, फिर फाँसी की कोठरी से लिखा कि क्रांतिकारी पचास साल तक जीत नहीं सकते। ब्रिटिश राज ने उन्हें 30 की उम्र में फाँसी दे दी।
वे तिलक की मोटर के आगे लेट गए, एक प्रतिबंधित किताब के लिए माँ से 400 रुपये लिए, और आख़िर में नौजवानों से पिस्तौल छोड़ देने को कहा। यह सब उनके अपने हिंदी पाठ में है, जिसे जज के फ़ैसले के एक समकालीन सार से मिलाकर यहाँ जाँचा गया है।
चंद्रशेखर आज़ाद काकोरी के बाद पाँच साल से ज़्यादा पुलिस से बचते रहे। अल्फ़्रेड पार्क में उन्हें रोकने में पुलिस को आधा घंटा लगा, और रिकॉर्ड आज भी एकमत नहीं कि आख़िरी गोली किसने चलाई
नेहरू, एक जीवनीकार और सरकार का अपना डाक-टिकट ब्रोशर 1921 के बेंत की सज़ा को तीन अलग ढंग से बताते हैं। अल्फ़्रेड पार्क की मुठभेड़ का रिकॉर्ड भी उतना ही बँटा है, और उस समय का एक अख़बारी इतिहास-ग्रंथ उनकी मृत्यु के दोनों ब्योरे पहले ही छाप चुका था।
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