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जोधपुर के पास के बिश्नोई गाँवों में पड़ोसी गाँवों से काफ़ी ज़्यादा काले हिरन हैं, और समुदाय हरे पेड़ न काटने के अपने नियम की जड़ 1730 के खेजड़ली में खोजता है, जहाँ 363 ग्रामीणों के मारे जाने की बात कही जाती है
पर्यावरण

जोधपुर के पास के बिश्नोई गाँवों में पड़ोसी गाँवों से काफ़ी ज़्यादा काले हिरन हैं, और समुदाय हरे पेड़ न काटने के अपने नियम की जड़ 1730 के खेजड़ली में खोजता है, जहाँ 363 ग्रामीणों के मारे जाने की बात कही जाती है

फ़ोटो: Zenit / Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0 (क्रॉप किया गया)

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इंडियन फ़ॉरेस्टर में 2015 के एक अध्ययन ने पाया कि बिश्नोई निवासियों वाले गाँवों में उनके बिना वाले गाँवों से काफ़ी ज़्यादा काले हिरन हैं, जबकि आवास और मानव आबादी में कोई फ़र्क़ नहीं था। समुदाय हरे पेड़ न काटने के अपने नियम की जड़ सितंबर 1730 के खेजड़ली में खोजता है, जहाँ ज़्यादातर विवरण 363 मौतें गिनते हैं। पर्यावरण और वन मंत्रालय ने 1,00,000 रुपये का एक वन्यजीव पुरस्कार अमृता देवी बिश्नोई के नाम पर रखा है, और 11 सितंबर राष्ट्रीय वन शहीद दिवस है।

· · 9 मिनट का पठन

अधिकतर स्रोत जिस विवरण को दोहराते हैं, उसके अनुसार 11 सितंबर 1730 को जोधपुर से करीब 18 किमी दूर खेजड़ली में 363 बिश्नोई ग्रामीण महाराजा के आदमियों को खेजड़ी के पेड़ काटने से रोकने की कोशिश में मारे गए। खेजड़ी (प्रोसोपिस सिनेरेरिया) रेगिस्तान का वह पेड़ है जिसकी पत्तियाँ बकरियों, भेड़ों और ऊँटों का चारा बनती हैं और जिसकी फलियाँ बिश्नोई सब्ज़ी के रूप में खाते हैं और पारंपरिक दवा में इस्तेमाल करते हैं। करीब तीन सदी बाद, पश्चिमी राजस्थान के एक अध्ययन में बिश्नोई निवासियों वाले गाँवों में उनके बिना वाले गाँवों से काफ़ी ज़्यादा काले हिरन मिले।

काले हिरन की गिनती क्या दिखाती है

वेस्ट वर्जीनिया यूनिवर्सिटी के जोनाथन सी. हॉल और बीकानेर की महाराजा गंगा सिंह यूनिवर्सिटी के अनिल के. छांगाणी ने यह तुलना अक्टूबर 2015 में इंडियन फ़ॉरेस्टर (खंड 141, अंक 10) में प्रकाशित की। उन्होंने परखा कि क्या बिश्नोई गाँवों में दूसरे गाँवों से ज़्यादा काले हिरन हैं। सार में “बिश्नोई वाले गाँवों में काफ़ी ज़्यादा काले हिरन” दर्ज है, और दोनों तरह के गाँवों के बीच उपलब्ध आवास या मानव आबादी में कोई उल्लेखनीय फ़र्क़ नहीं बताया गया। काले हिरन ने कुल आवास का करीब एक तिहाई हिस्सा इस्तेमाल किया, और वे अध्ययन के चारों वर्षों में टिके रहे।

लेखक निष्कर्ष निकालते हैं कि काले हिरन के संरक्षण में बिश्नोई भूमि का महत्व हो सकता है और सांस्कृतिक परंपराएँ मानव-प्रधान भू-दृश्यों में वन्यजीवों का साथ दे सकती हैं। पन्ने पर गाँवों की गिनती नहीं दी गई है, इसलिए अंतर कितना बड़ा है, यह शोधपत्र से ही पढ़ना होगा।

साक्ष्य की एक दूसरी, नई कड़ी रेचल कार्सन सेंटर के एनवायरनमेंट एंड सोसाइटी पोर्टल के अमीर सोहेल और फ़रहत नाज़ से आती है। उनका 2024 का निबंध उस नृवंशविज्ञान सर्वेक्षण पर आधारित है जो उन्होंने 2022 और 2023 में जोधपुर ज़िले के तीन गाँवों, खेजड़ली, जाजीवाल और गराब में किया। वे बताते हैं कि बिश्नोई गाँवों में थार रेगिस्तान के कुछ हिस्सों से काफ़ी ज़्यादा प्राकृतिक वनस्पति आवरण और वन्यजीव थे, ख़ासकर ज़्यादा खेजड़ी के पेड़ और काले हिरन। वे समुदाय के पशु देखभाल केंद्रों, मरुस्थलीकरण के विरुद्ध खेजड़ी रोपण, और पेड़ों, पशुओं और पानी के लिए रखे गए पवित्र उपवनों का भी वर्णन करते हैं।

सितंबर 1730 का खेजड़ली

स्रोत रूपरेखा पर एकमत हैं। जोधपुर के महाराजा अभय सिंह को लकड़ी चाहिए थी और उन्होंने खेजड़ी के पेड़ काटने के लिए आदमी खेजड़ली भेजे। रॉयल राजस्थान फ़ाउंडेशन के साथ तैयार हुआ सहापीडिया का लेख कहता है कि लकड़ी उन भट्ठों में जलाई जानी थी जो एक नए महल के गारे के लिए चूना पकाते हैं, और पेड़ों को जोधपुर के मेहरानगढ़ क़िले तक ले जाया जाना था। सोहेल और नाज़ गाँव में महाराजा के प्रतिनिधि के रूप में गिरिधर भंडारी का नाम लेते हैं।

एक ग्रामीण अमृता देवी बिश्नोई ने आपत्ति की, क्योंकि खेजड़ी काटना बिश्नोई आचार के विरुद्ध है। सोहेल और नाज़ कहते हैं कि उन्होंने और उनकी बेटियों ने पेड़ों को गले लगाया और कहा, “अगर सिर देकर भी पेड़ बच जाए, तो सौदा सस्ता है।” सहापीडिया यही वाक्य अलग शब्दों में देता है, और कहता है कि आदमियों ने पेड़ तक पहुँचने के लिए उनके शरीर को काट दिया। द ट्रिब्यून उनकी बेटियों के नाम आसू, रत्नी और भागू बताता है। आसपास के ग्रामीणों ने उनकी मिसाल पर चलकर जान दी, और सोहेल और नाज़ मृतकों की संख्या 363 रखते हैं, जिनमें अमृता देवी और उनकी बेटियाँ शामिल हैं।

सोहेल और नाज़ तथा सहापीडिया, दोनों के अनुसार महाराजा ने कटाई रोक दी और माफ़ी माँगी। दोनों यह भी कहते हैं कि उन्होंने ताम्रपत्र पर एक आदेश जारी किया, जिसमें बिश्नोई गाँवों में और उनके आसपास पेड़ काटने और पशुओं के शिकार पर रोक लगाई गई। सोहेल और नाज़ जोड़ते हैं कि उन्होंने जो राज्य संरक्षण दिया था वह आज लागू नहीं है, और इलाक़े के पशु और पेड़ अब राष्ट्रीय क़ानूनों के दायरे में हैं।

जहाँ स्रोत असहमत हैं

363 का आँकड़ा सबसे आम है, और वह सोहेल और नाज़, सहापीडिया और मोंगाबे इंडिया में मिलता है। फ्यूचर जनरेशन्स ग्रेजुएट स्कूल के रॉबर्ट फ़्लेमिंग, जो 2005 में खेजड़ली के उपवन गए थे, ने “करीब 360” लोगों के बारे में लिखा। 2017 में देहरादून के फ़ॉरेस्ट रिसर्च इंस्टिट्यूट में भारतीय वानिकी अनुसंधान और शिक्षा परिषद के महानिदेशक ने याद किया कि खेजड़ली में 360 से ज़्यादा बिश्नोई मारे गए थे।

दूसरे ब्योरे भी इधर-उधर होते हैं। सहापीडिया घटना की तारीख़ 11 सितंबर 1730 बताता है और नोट करता है कि कुछ विद्वान इसे 9 सितंबर की मानते हैं। वह कहता है कि 49 गाँवों के 363 बिश्नोई मारे गए, और जमावड़े में 83 गाँवों के लोग आए थे, पर इस फ़ासले को समझाता नहीं। उसकी सुर्ख़ी 362 और अमृता देवी कहती है, जबकि पाठ 363 कहता है। डाउन टू अर्थ 2018 में नरसंहार को 1786 में रखता है, और द ट्रिब्यून 2016 में 1787 की एक लोक-तारीख़ और अपना आदेश वापस लेने वाले एक राजा का ज़िक्र करता है। 1787 वह विक्रम संवत है जो सितंबर 1730 को सबसे संभावित रूप से समेटता है, क्योंकि वह पंचांग सामान्य कालगणना से करीब 57 साल आगे चलता है, इसलिए लोक-तारीख़ उसी घटना का वर्णन हो सकती है। यह पढ़त tuput की अपनी है, और किसी भी अख़बार ने यह नहीं कहा।

सहापीडिया के नोट द्वितीयक रचनाओं का हवाला देते हैं: हिंदू समुदायों और पारिस्थितिकी पर पंकज जैन की पुस्तक और दो विश्वविद्यालयी शोध-प्रबंध। न सहापीडिया, न इस लेख के लिए खोले गए किसी और पन्ने में 1730 का कोई अभिलेख उद्धृत है, और कोई यह नहीं कहता कि ताम्रपत्र कहाँ रखा है या उसका पाठ नहीं छापता। मृतकों की संख्या, माफ़ी और आदेश समुदाय के विवरण और बाद के लेखकों पर टिके हैं, और यहाँ उसी रूप में कहे गए हैं।

उनतीस नियम

बिश्नोई नाम को बिस (बीस) और नौ के रूप में पढ़ा जाता है, जो जाम्भोजी के नाम से जाने जाने वाले गुरु जंभेश्वर के 29 नियमों की ओर संकेत है। सोहेल और नाज़ उनके वर्ष 1451 से 1536 और पंथ की स्थापना 1485 बताते हैं। डाउन टू अर्थ इसके बजाय गुरु के 29 सिद्धांतों को 1542 का बताता है। जिन नियमों को सोहेल और नाज़ उद्धृत करते हैं, उनमें “हरे पेड़ न काटो” और “सभी जीवों के प्रति दयालु रहो” हैं।

फ़्लेमिंग जोड़ते हैं कि अनुयायियों से कहा जाता है कि पानी पीने से पहले कपड़े से छानें और उपले और लकड़ियाँ जलाने से पहले झाड़ लें, ताकि छोटे जीव न मरें। वे लिखते हैं कि कुछ संदर्भ उनतीस के बजाय बीस कहते हैं, और सूचियाँ थोड़ी अलग हैं। पशुओं और पौधों से जुड़े नियमों की गिनती भी स्रोत के अनुसार अलग है: फ़्लेमिंग चार गिनते हैं, डाउन टू अर्थ आठ। डाउन टू अर्थ जोड़ता है कि बिश्नोई लकड़ी बचाने के लिए अपने मृतकों को दफ़नाते हैं और अति-चराई के कारण बकरियाँ और भेड़ें रखने से बचते हैं, जिसे वह धार्मिक सिद्धांतों से जोड़ता है।

बचाव केंद्र, सड़क के पेड़ और एक अदालत

मोंगाबे इंडिया ने अप्रैल 2020 में बताया कि पश्चिमी राजस्थान में केंद्रित बिश्नोई शिकार पर नज़र रखते हैं, उसकी सूचना वन विभाग को देते हैं और घायल पशुओं को बचाते हैं। जोधपुर के माछिया जैविक उद्यान के बचाव केंद्र के पशु-चिकित्सक डॉ. श्रवण सिंह ने इस मीडिया संस्थान को बताया कि लाए गए घायल पशुओं में से 70 प्रतिशत से ज़्यादा बिश्नोई समुदाय से आते हैं। कुत्तों के काटने की वजह आम है, और पशुओं में चिंकारा, काला हिरन और नीलगाय शामिल हैं।

उसी लेख के अनुसार 2007 में पंजीकृत एनजीओ बिश्नोई टाइगर फ़ोर्स के हाल तक महासचिव रहे रामनिवास बिश्नोई ने बताया कि सदस्यों ने जोधपुर के पास सड़क किनारे के पेड़ काटने के सरकारी आदेश का विरोध किया और, उनके शब्दों में, 30 किमी सड़क के पेड़ बचा लिए। यह भी दर्ज है कि बिश्नोई शिकायतकर्ताओं ने 1998 में जोधपुर के पास मारे गए दो काले हिरनों का मामला करीब 20 साल चलाया, जब तक कि 2018 में एक स्थानीय अदालत ने आरोपी फ़िल्म अभिनेता को सज़ा नहीं सुनाई।

सोहेल और नाज़ तथा डाउन टू अर्थ, दोनों बताते हैं कि बिश्नोई महिलाएँ कभी-कभी अनाथ या घायल हिरन के बच्चों को अपना दूध पिलाती हैं।

खेजड़ली के नाम पर एक पुरस्कार और एक दिवस

पर्यावरण और वन मंत्रालय ने अमृता देवी बिश्नोई वन्यजीव संरक्षण पुरस्कार, 2007 के लिए नामांकन आमंत्रित किए, जिसकी अंतिम तारीख़ 20 सितंबर 2007 थी। सूचना में ग्रामीण व्यक्तियों, संस्थाओं या सामुदायिक संगठनों को, ग्राम सभा समेत, जो वन्यजीवों की रक्षा में अनुकरणीय साहस या वीरता दिखाते हैं, 1,00,000 रुपये (एक लाख रुपये) नक़द, एक पदक और एक प्रशस्ति-पत्र देने की बात है। कोई आयु सीमा नहीं है। सोहेल और नाज़ कहते हैं कि भारत सरकार ने यह पुरस्कार 2000 में स्थापित किया। इस लेख के लिए खोली गई मंत्रालय की सूचना में स्थापना का वर्ष नहीं दिया गया है।

वे यह भी कहते हैं कि 11 सितंबर को 2013 में राष्ट्रीय वन शहीद दिवस घोषित किया गया। सहापीडिया वही वर्ष देता है। 11 सितंबर 2017 को देहरादून के फ़ॉरेस्ट रिसर्च इंस्टिट्यूट ने अपने फ़ॉरेस्टर मेमोरियल पर पुष्पांजलि और दो मिनट के मौन के साथ यह दिवस मनाया। उसका प्रेस नोट आईसीएफ़आरई के महानिदेशक की यह टिप्पणी उद्धृत करता है कि भारत के जंगलों और वन्यजीवों की रक्षा में अब तक करीब 1,400 वनकर्मी जान दे चुके हैं।

चिपको से रिश्ता दावा है, यहाँ दस्तावेज़ी नहीं

मोंगाबे इंडिया और डाउन टू अर्थ, दोनों कहते हैं कि खेजड़ली ने उत्तराखंड में 1970 के दशक के चिपको आंदोलन को प्रेरित किया, और डाउन टू अर्थ इसे दुनिया का पहला पर्यावरण आंदोलन कहता है। दोनों में से कोई ऐसा दस्तावेज़ नहीं देता जो दिखाए कि चिपको के आयोजकों ने खेजड़ली से प्रेरणा ली। खाद्य और कृषि संगठन के चिपको वाले विवरण में, जो शोभिता जैन का है, कहा गया है कि आंदोलन की आधिकारिक शुरुआत 24 अप्रैल 1973 को चमोली ज़िले के मंडल में सर्वोदय कार्यकर्ताओं ने की, और उसमें बिश्नोइयों का ज़िक्र नहीं है। उस आंदोलन के अपने अभिलेख के लिए tuput का लेख सुंदरलाल बहुगुणा और चिपको आंदोलन देखें।

सोहेल और नाज़ केवल इतना लिखते हैं कि जिन 363 की मृत्यु हुई, उन्होंने “संभवतः” भारत का पहला पर्यावरण आंदोलन संगठित किया।

फ़रवरी 2026 का खेजड़ी आदेश

सोहेल और नाज़ बिश्नोई भूमि पर दबावों में वनों की कटाई, गिरता भूजल, खनन, शिकार और भूमि अधिग्रहण गिनाते हैं। जोधपुर के आसपास का रेगिस्तान ग्रेट इंडियन बस्टर्ड का भी क्षेत्र है, जिसकी थार में गिनती भारतीय वन्यजीव संस्थान ने अपने 2024 से 2025 के सर्वेक्षण में करीब 130 पक्षी रखी। राजस्थान का राज्य-परिचय जोधपुर और रेगिस्तानी ज़िलों को राज्य में रखता है, और राजपूत कौन थे पर लेख मारवाड़ के शासकों की पृष्ठभूमि बताता है।

ख़ुद खेजड़ी पर, फ़्री प्रेस जर्नल ने 13 फ़रवरी 2026 को बताया कि बीकानेर में संतों और बिश्नोई समुदाय के 11 दिन के आंदोलन के बाद राजस्थान सरकार के राजस्व विभाग ने पूरे राज्य में खेजड़ी के पेड़ काटने पर पूर्ण रोक का आदेश दिया, जब तक कि वृक्ष संरक्षण क़ानून बन नहीं जाता। अख़बार के अनुसार राज्य मंत्री के. के. बिश्नोई और दो अन्य बिश्नोई नेता यह आदेश धरना स्थल तक ले गए। आदेश का पाठ tuput को उपलब्ध नहीं था, और इस लेख के लिए खोले गए पन्ने यह नहीं बताते कि क़ानून तब से पारित हुआ या नहीं।

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स्रोत और आगे पढ़ने के लिए

  1. Sohel and Naz, The Bishnoi: Revisiting Religious Environmentalism and Traditional Forest and Wildlife Management in the Thar Desert, Environment and Society Portal, Rachel Carson Center (Summer 2024)
  2. Hall and Chhangani, Cultural Tradition and Wildlife Conservation in the Human-Dominated Landscape of Rural Western Rajasthan, India, Indian Forester 141(10), 2015
  3. Ministry of Environment and Forests: Invitation of nominations for the Amrita Devi Bishnoi Wildlife Protection Award, 2007
  4. Forest Research Institute, Dehradun (ICFRE): Press note, National Forest Martyrs Day observed at FRI, 11 September 2017
  5. Sahapedia: When Amrita Devi and 362 Bishnois sacrificed their lives for the Khejri tree
  6. Mongabay India: Bishnois organise and educate themselves to take environment conservation beyond religion (Azera Parveen Rahman, 7 April 2020)
  7. Future Generations Graduate School, Occasional Paper No. 13: A note on the Bishnoi and antelope in India (Robert L. Fleming Jr., February 2010)
  8. Down To Earth: The power of community (Prahlad Singh Shekhawat, 19 April 2018)
  9. The Tribune: Guardians of trees and protectors of chinkara (Yash Goyal, 31 July 2016)
  10. The Tribune: Remembering Amrita's sacrifice (updated 10 September 2019)
  11. Food and Agriculture Organization, Unasylva 146: Standing up for trees, Women's role in the Chipko Movement (Shobita Jain)
  12. Free Press Journal: Rajasthan bans khejri tree felling after 11-day protest (13 February 2026)

यह लेख AI उपकरणों की सहायता से शोधित और लिखा गया है, और सटीकता के लिए संपादित किया गया है। यह केवल सामान्य जानकारी और चर्चा के लिए है, पेशेवर सलाह नहीं। हमारे संपादकीय मानक और अस्वीकरण देखें। कोई त्रुटि मिली? हमें बताएँ।

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