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राजा रवि वर्मा के बंबई प्रेस ने 12 जुलाई 1894 को अपना पहला ओलियोग्राफ़ शकुंतला का जन्म छापा, और 2026 में उनकी यशोदा और कृष्ण 167.2 करोड़ रुपये में बिकी
कला और सिनेमा

राजा रवि वर्मा के बंबई प्रेस ने 12 जुलाई 1894 को अपना पहला ओलियोग्राफ़ शकुंतला का जन्म छापा, और 2026 में उनकी यशोदा और कृष्ण 167.2 करोड़ रुपये में बिकी

फ़ोटो: Raja Ravi Varma / Wikimedia Commons, Public domain (क्रॉप किया गया)

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1848 में किलिमानूर में जन्मे राजा रवि वर्मा ने 1873 में मद्रास में पहला पुरस्कार जीता और 1894 में बंबई में लिथोग्राफ़ प्रेस शुरू किया। उसकी देवी-देवताओं और शकुंतला की रंगीन छवियाँ उन घरों तक पहुँचीं जो कभी असली चित्र नहीं ख़रीद सकते थे। अप्रैल 2026 में उनका एक तैलचित्र नीलामी में 167.2 करोड़ रुपये में बिका।

· · 8 मिनट का पठन

आउटलुक बिज़नेस के अनुसार 1 अप्रैल 2026 को मुंबई में सैफ़्रनआर्ट की एक नीलामी में राजा रवि वर्मा की यशोदा और कृष्ण 167.20 करोड़ रुपये (17,978,495 अमेरिकी डॉलर) में बिकी, जबकि अनुमान 80 से 120 करोड़ रुपये का था। यह 1890 के दशक का एक तैलचित्र है, जिसमें यशोदा गाय दुह रही हैं और शिशु कृष्ण दूध के प्याले की ओर हाथ बढ़ा रहे हैं। जिस चित्रकार ने इसे बनाया, उसने 1894 में बंबई में एक छापाख़ाना भी खोला, और ओपन पत्रिका के अनुसार उसकी देवी-देवताओं की रंगीन छवियाँ महज़ 2 रुपये में भी बिकती थीं।

अप्रैल 2026 की रिकॉर्ड बिक्री

आउटलुक बिज़नेस के अनुसार ख़रीदार सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया के प्रबंध निदेशक डॉ. साइरस एस. पूनावाला थे, जिन्होंने कहा कि इस चित्र को समय-समय पर जनता के सामने दिखाया जाना चाहिए। किसी भारतीय कृति का इससे पहले का नीलामी रिकॉर्ड, जो एक साल पहले बना, एम. एफ़. हुसैन की अनटाइटल्ड (ग्राम यात्रा) का था, जो 118 करोड़ रुपये से ऊपर बिकी थी। द प्रिंट की बिक्री-रिपोर्ट में यही आँकड़े हैं।

गूगल आर्ट्स एंड कल्चर की एक फ़ीचर के अनुसार भारत सरकार ने 1979 में रवि वर्मा को राष्ट्रीय कला निधि घोषित किया और उनके चित्रों का निर्यात रोक दिया। पुरावशेष तथा कला निधि अधिनियम, 1972 के तहत कला निधि वह कृति है जिसे केंद्र सरकार राजपत्र अधिसूचना से घोषित करे, और केंद्र सरकार या उसकी अधिकृत एजेंसी के सिवा कोई उसका निर्यात नहीं कर सकता।

किलिमानूर से 1873 के मद्रास पुरस्कार तक

केरल पर्यटन उनकी तिथियाँ 29 अप्रैल 1848 से 2 अक्टूबर 1906 देता है और जन्म त्रावणकोर राज्य के अभिजात वर्ग में किलिमानूर में बताता है। मॉडर्निस्ट जर्नल्स प्रोजेक्ट की जीवनी के अनुसार महाराजा आयिल्यम तिरुनाल उन्हें 14 वर्ष की उम्र में त्रावणकोर के महल में ले गए, जहाँ एक दरबारी चित्रकार ने उन्हें जलरंग सिखाया और बाद में ब्रिटिश चित्रकार थियोडोर जेनसन ने तैलरंग। ओपन पत्रिका जोड़ती है कि जेनसन ने उन्हें औपचारिक रूप से सिखाने से इनकार किया और उन्हें देखने दिया।

पहला दर्ज पुरस्कार 1873 में आया। मॉडर्निस्ट जर्नल्स प्रोजेक्ट के अनुसार उन्होंने उस साल मद्रास की चित्रकला प्रदर्शनी में पहला पुरस्कार जीता, और उनके एक वंशज की बनाई साइट के अनुसार उसके साथ गवर्नर का स्वर्ण पदक मिला। द प्रिंट चित्र का नाम नायर स्त्री केश सँवारती हुई बताता है।

वियना पर विवरण अलग हैं। मॉडर्निस्ट जर्नल्स प्रोजेक्ट की एक जीवनी कहती है कि 1873 की वियना प्रदर्शनी में जीतने के बाद वे दुनिया भर में मशहूर हुए। द प्रिंट अपने पाठ में पहला पुरस्कार बताता है और उसी चित्र के फ़ोटो-कैप्शन में प्रशस्ति-प्रमाणपत्र। tuput को वियना का कोई ऐसा रिकॉर्ड नहीं मिला जो पुरस्कार का नाम दे, इसलिए यह लेख मद्रास पर टिका है, उस पुरस्कार पर जिस पर कई स्रोत सहमत हैं।

शिकागो 1893 भी दो तरह से दर्ज है। गणेश शिवस्वामी फ़ाउंडेशन की गूगल आर्ट्स एंड कल्चर फ़ीचर के अनुसार उन्होंने वर्ल्ड्स कोलंबियन एक्सपोज़िशन में दस चित्र भेजे और दो पदक तथा एक डिप्लोमा पाया, जबकि वंशज की समय-रेखा तीन स्वर्ण पदक बताती है।

बड़ौदा के महल के लिए चौदह चित्र

बड़ौदा के गायकवाड़ सयाजीराव तृतीय ने नए लक्ष्मी विलास पैलेस के दरबार हॉल के लिए चौदह पौराणिक चित्र बनवाए। स्क्रॉल.इन ऊटी की मुलाक़ात को 1888 का बताता है और कहता है कि विषय भागवत पुराण में कृष्ण की लीलाएँ और रामायण तथा महाभारत के प्रसंग थे। गणेश शिवस्वामी फ़ाउंडेशन आदेश को 1889 का बताता है। दोनों कहते हैं कि चित्र किलिमानूर में उनके भाई सी. राजा राजा वर्मा और बहन मंगलाबाई थंपुरट्टी की मदद से बने।

स्क्रॉल.इन के विवरण में राजा राजा वर्मा पौराणिक चित्रों के भूदृश्यों और पृष्ठभूमि के चित्रकार और आजीवन सहयोगी थे, और उनकी डायरी चित्रकार के जीवन के उत्तरार्ध के मुख्य स्रोतों में से एक है। इन्क्रेडिबल इंडिया के अनुसार वडोदरा का महाराजा फ़तेह सिंह संग्रहालय रवि वर्मा की वे कृतियाँ दिखाता है जो महाराजा ने बनवाई थीं, जिनमें पौराणिक दृश्य और राजसी व्यक्ति-चित्र हैं। उनके कई विषयों के पीछे का महाकाव्य महाभारत क्या है में समझाया गया है, और शकुंतला के कवि, जिस नायिका पर वे एक से अधिक बार लौटे, कालिदास, शकुंतला के कवि में हैं।

प्रेस: 12 जुलाई 1894

द प्रिंट के मैप एकेडमी अंश और ओपन पत्रिका के अनुसार 1884 में त्रावणकोर के पूर्व दीवान टी. माधव राव ने सुझाव दिया कि रवि वर्मा अपने चित्र यूरोप में ओलियोग्राफ़ के रूप में छपवाएँ। ओलियोग्राफ़ वह रंगीन लिथोग्राफ़ है जिस पर वार्निश करके उसे तैलचित्र जैसा दिखाया जाता है। इस विचार पर लगभग दस साल कुछ नहीं हुआ।

1894 में रवि वर्मा फ़ाइन आर्ट लिथोग्राफ़िक प्रेस बंबई में खुला। ओपन और द प्रिंट उसे गिरगाँव में बताते हैं, जबकि वंशज की समय-रेखा घाटकोपर कहती है। ओपन के अनुसार राजा राजा वर्मा ने उसे बंबई के उद्योगपति गोवर्धनदास खटाऊ मखनजी के साथ मिलकर खड़ा किया, और गणेश शिवस्वामी फ़ाउंडेशन के अनुसार उन्होंने ही वह साझेदारी जुटाई। ओपन शुरुआती निवेश 50,000 रुपये बताती है; शिवस्वामी फ़ाउंडेशन जोड़ता है कि महाराजा के 50,000 रुपये इसे चलाने के लिए काफ़ी नहीं थे।

पहली छवि शकुंतला का जन्म का क्रोमोलिथोग्राफ़ थी, जो लगभग 1890 के उस चित्र से बनी जो अब शिवस्वामी फ़ाउंडेशन के पास है। उसकी सूची-प्रविष्टि छवि के शुभारंभ की तिथि 12 जुलाई 1894 देती है। ओपन के अनुसार वह 6 रुपये में बिकी, और लक्ष्मी तथा सरस्वती 2-2 रुपये में उसके बाद आईं; द प्रिंट ओपन का हवाला देकर यही आँकड़े दोहराता है। ओपन जोड़ती है कि हर चित्र के लिए सात से 30 लिथोग्राफ़ी पत्थर चाहिए थे।

रंग के पीछे जर्मन हाथ

राजा रवि वर्मा हेरिटेज फ़ाउंडेशन की एक गूगल आर्ट्स एंड कल्चर कहानी के अनुसार एक जर्मन छापेख़ाने वाले, फ़्रित्ज़ श्लाइशर, शुरू से तकनीकी रूप से इसे संभालते थे। वे पत्थर पर आकृतियाँ बनाने के विशेषज्ञ थे और उन्होंने भाप से चलने वाली मशीनें लगाईं। दूसरे जर्मन, पी. गेरहार्ट, चित्रों को पत्थर पर उतारते थे और पत्तेदार पृष्ठभूमियों के लिए जाने जाते थे। कहानी के अनुसार दुकान की कामकाजी भाषा जर्मन थी, जैसा पत्थरों के निशानों से दिखता है, और दो मशीनें एक घंटे में 800 छापे तक निकाल सकती थीं। वह प्रेस को कुछ समय के लिए भारत की सबसे बड़ी चित्र-छपाई संस्था कहती है।

प्रेस के लिए काम करने वाले चित्रकारों में, द प्रिंट के अंश के अनुसार, एम. वी. धुरंधर, जी. वी. वेंकटेश राव और दादासाहब फाल्के थे, जिनका बाद का काम दादासाहब फाल्के और पहली भारतीय फ़िल्म में बताया गया है।

स्थान-बदल, एक बिक्री और एक आग, तिथियों के मतभेद के साथ

प्रेस गिरगाँव से बंबई के उपनगर घाटकोपर गया और फिर लोनावला के पास मालवली। ओपन और द प्रिंट इसका एक कारण बंबई में प्लेग बताते हैं। तिथियों पर, द प्रिंट में घाटकोपर 1898 में और मालवली 1901 से है, वंशज की समय-रेखा में लोनावला 1899 में है, और हेरिटेज फ़ाउंडेशन कहता है कि 1898 और 1901 के बीच प्रेस को कम से कम दो बार खोला और फिर से जोड़ा गया।

गणेश शिवस्वामी फ़ाउंडेशन श्लाइशर को बिक्री की तिथि 20 जुलाई 1901 बताता है। द प्रिंट में भी 1901 है, 25,000 रुपये में, सौ से ज़्यादा चित्रों को पुनः छापने की अनुमति के साथ, जबकि ओपन 1903 कहती है। हेरिटेज फ़ाउंडेशन कहता है कि श्लाइशर और एक साझेदार, श्रीराम पंत, ने 1901 में प्रेस को पट्टे पर लिया और उनके मालिक बनने के लिए भी 1903 देता है। द प्रिंट के अनुसार उन्होंने उसका नाम एफ़.ए.एल. प्रेस, बंबई रख दिया और उसमें क्रिसमस कार्ड, पोस्टकार्ड, विज्ञापन और लेबल जोड़े। ओपन के विवरण में कॉपीराइट उनके पास था और उन्होंने छवियों को विज्ञापनों और कैलेंडरों के लिए इस्तेमाल किया।

अंत के विवरण अलग-अलग हैं। द प्रिंट का अंश और वंशज की समय-रेखा लोनावला के कारख़ाने में 1972 में आग लगना बताते हैं। ओपन में 1973 में आग के बाद अस्थायी बंदी और 1980 में अंत है। द प्रिंट कहता है कि प्रेस 1975 में बंद हुआ और उसकी बची छवियाँ तथा मास्टर पत्थर 2000 में नीलाम हुए।

छवियों ने क्या किया, और आलोचकों ने क्या कहा

कैम्ब्रिज का म्यूज़ियम ऑफ़ आर्कियोलॉजी एंड एंथ्रोपोलॉजी 23 छवियों की एक शृंखला गॉड्स ऑफ़ इंडिया रखता है, जिसे आई. एच. एन. इवांस ने इकट्ठा किया और जो लगभग 1915 की है, और हर पर “रवि वर्मा प्रेस. कार्ला लोनावला.” छपा है। संग्रहालय इतिहासकार क्रिस्टोफ़र पिन्नी को उद्धृत करता है कि सेट की काली वाली छवि का “चित्रकार रवि वर्मा से कोई सीधा संबंध साफ़ तौर पर नहीं है”। प्रेस की और छवियाँ वेलकम कलेक्शन में हैं, जिसकी सूची के अनुसार उनमें से एक की संरचना, विश्वामित्र का अपनी नवजात पुत्री को ठुकराना, विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूज़ियम के एक चाँदी के पानी-पात्र के पैनल का नमूना बनी, जैसा विद्या देहेजिया ने अक्टूबर 2022 के बर्लिंगटन मैगज़ीन में दिखाया।

जेस्टोर डेली दो विद्वानों का सार देती है। पिन्नी ने 1997 में तर्क दिया कि प्रेस ने हिंदू धार्मिक और राजनीतिक विचार फैलाए और ब्रिटिश अधिकारी नए माध्यम को “प्रिंट राष्ट्रवाद” कहते थे। जैकबसन ने 2004 में रवि वर्मा को “गॉड पोस्टर उद्योग” का संस्थापक कहा।

आलोचक साफ़ बोले हैं। गणेश शिवस्वामी फ़ाउंडेशन दर्ज करता है कि कुछ ने इस काम को “बाज़ार कला” कहा। आनंद कुमारस्वामी ने द न्यू एज में 16 अप्रैल 1914 को लिखते हुए रवि वर्मा को भद्दा कहा, जो अंश मॉडर्निस्ट जर्नल्स प्रोजेक्ट में छपा है।

कृतियाँ कहाँ देखें

तिरुवनंतपुरम की राजा रवि वर्मा आर्ट गैलरी, जिसे केरल पर्यटन का सितंबर 2024 का न्यूज़लेटर श्री चित्रा आर्ट गैलरी के पास 12,000 वर्ग फ़ुट की बताता है, में उनकी 134 कृतियाँ हैं, जिनमें 46 चित्र, 14 ओलियोग्राफ़ और 16 पेंसिल रेखाचित्र शामिल हैं, और वहाँ राजा राजा वर्मा और मंगलाबाई की कृतियाँ भी दिखाई जाती हैं। न्यूज़लेटर के अनुसार उसके खुलने का समय मंगलवार से रविवार, सुबह 10:00 से शाम 4:45 बजे तक है, और वह कहता है कि किलिमानूर महल ने 1935 में अपने तैलचित्र दान किए। नई दिल्ली की नेशनल गैलरी ऑफ़ मॉडर्न आर्ट, जो अपने पास 17,039 कलाकृतियाँ बताती है, उन्हें उन दस मास्टर कलाकारों में सबसे पहले गिनाती है जिनकी कृतियाँ उसके संग्रह का हिस्सा हैं।

ओपन के अनुसार चेन्नई की सी. पी. रामास्वामी अय्यर फ़ाउंडेशन के पास 130 ओलियोग्राफ़ हैं।

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स्रोत और आगे पढ़ने के लिए

  1. ThePrint, 'How Raja Ravi Varma Press revolutionised printing in modern India' (22 February 2026), excerpt from MAP Academy's Encyclopedia of Art
  2. Open magazine, Nanditha Krishna, 'Raja Ravi Varma: When the Gods Came Home'
  3. Google Arts & Culture, 'Wanderers Between Worlds: Story of the Ravi Varma Press' (The Raja Ravi Varma Heritage Foundation)
  4. Google Arts & Culture, The Ganesh Shivaswamy Foundation story on Ravi Varma and the press
  5. Google Arts & Culture, 'Birth of Shakuntala' (c. 1890), The Ganesh Shivaswamy Foundation
  6. Google Arts & Culture, 'The Classic Trail: Decoding the Art of Investment' (1979 art treasure declaration)
  7. Kerala Tourism newsletter no. 373 (September 2024), Raja Ravi Varma Art Gallery, Thiruvananthapuram
  8. Museum of Archaeology and Anthropology, Cambridge, oleograph of Kali, Ravi Varma Press, Karla Lonavla (Z 44986.7)
  9. Wellcome Collection, chromolithograph of Viswamitra and Shakuntala, Ravi Varma Press (catalogue record 26597i)
  10. Scroll.in (3 August 2020), 'A Family Affair: Few Know About the Artistic Prowess of Raja Ravi Varma's Siblings'
  11. JSTOR Daily, 'Why Is Raja Ravi Varma's Art So Valuable Today?'
  12. Outlook Business (2 April 2026), 'Raja Ravi Varma's Yashoda and Krishna Sells at Record-Breaking Rs 167.20 Crore'
  13. ThePrint, 'Calendar artist to Rs 167 cr sale: how Raja Ravi Varma still defines India's imagination'
  14. Modernist Journals Project, Brown and Tulsa Universities, biography of Raja Ravi Varma
  15. rajaravivarma.org, biography and timeline compiled by a descendant of the painter
  16. National Gallery of Modern Art, New Delhi, collection page
  17. Incredible India (Ministry of Tourism), Maharaja Fateh Singh Museum, Vadodara
  18. Archaeological Survey of India, The Antiquities and Art Treasures Act, 1972 (text)

यह लेख AI उपकरणों की सहायता से शोधित और लिखा गया है, और सटीकता के लिए संपादित किया गया है। यह केवल सामान्य जानकारी और चर्चा के लिए है, पेशेवर सलाह नहीं। हमारे संपादकीय मानक और अस्वीकरण देखें। कोई त्रुटि मिली? हमें बताएँ।

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