फ़ोटो: NASA / Wikimedia Commons, Public domain (क्रॉप किया गया)
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सैटेलाइट इंस्ट्रक्शनल टेलीविज़न एक्सपेरिमेंट 1 अगस्त 1975 से 31 जुलाई 1976 तक चला, जिसमें खेती, स्वास्थ्य और स्कूली शिक्षा के कार्यक्रम ऑल इंडिया रेडियो और इसरो ने बनाए। योजना आयोग के मूल्यांकन में पाया गया कि उसकी टीमों ने जो विकास कार्यक्रम देखे, उनमें से 78 प्रतिशत को अच्छा आँका गया।
सैटेलाइट इंस्ट्रक्शनल टेलीविज़न एक्सपेरिमेंट, जिसे साइट (SITE) कहा जाता है, 1 अगस्त 1975 को शुरू हुआ और पूरे एक साल चला। भारत में बने कार्यक्रम छह राज्यों (राजस्थान, बिहार, उड़ीसा, अब ओडिशा, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक) के 20 ज़िलों के 2,400 गाँवों तक पहुँचे, नासा के एटीएस-6 उपग्रह के ज़रिये, भारत में बने रिसीवरों और डिशों तक। 1981 में प्रकाशित योजना आयोग के मूल्यांकन के अनुसार उसकी क्षेत्रीय टीमों ने जो विकास कार्यक्रम देखे, उनमें से 78 प्रतिशत को अच्छा और 90 प्रतिशत से ज़्यादा को स्थानीय परिस्थितियों के लिए प्रासंगिक आँका।
साइट को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने अहमदाबाद में अपने स्पेस एप्लीकेशंस सेंटर (एसएसी) और ऑल इंडिया रेडियो के साथ चलाया। योजना आयोग का मूल्यांकन इसे नासा, इसरो और ऑल इंडिया रेडियो का संयुक्त उद्यम बताता है।
पहली रात, 1 अगस्त 1975
अहमदाबाद में नासा के परियोजना प्रतिनिधि हावर्ड गैलोवे जूनियर ने 3 अगस्त 1975 की अपनी स्थिति-रिपोर्ट में लिखा कि उन्होंने पहला साइट कार्यक्रम अपने परिवार के साथ एसएसी परिसर के लॉन में देखा। वहाँ दो टेलीविज़न सेट थे और एक हज़ार से ज़्यादा दर्शक, और उन्हें हैरानी हुई कि इतने सारे लोग इतनी अच्छी तरह देख-सुन पा रहे थे। पिज का प्रसारण, यानी खेड़ा ज़िले के एक गाँव से स्थानीय गुजराती सेवा, अंत में अपनी तस्वीर की समकालिकता खो बैठा, क्योंकि आधा इंच की टेप एक खराब मशीन पर चलाई गई थी। उसे एक इंच की टेप पर दोबारा रिकॉर्ड किया गया और 2 अगस्त को साफ़ प्रसारित किया गया।
नासा की रिपोर्टों में दिए गए इसरो के पहले दो महीनों के सार के अनुसार हर क्लस्टर का उद्घाटन उसके मुख्यमंत्री या किसी और राज्य मंत्री ने किया और उसके बाद संचालन बिना बड़ी समस्याओं के चला।
इसरो का सार यह भी कहता है कि 15 अगस्त 1975 का स्वतंत्रता दिवस समारोह लाल किले से पूरे साइट नेटवर्क पर सीधे प्रसारित हुआ। गैलोवे ने उसी तारीख की अपनी रिपोर्ट में लिखा कि प्रधानमंत्री का भाषण साइट को सलाम से शुरू हुआ, जिसने गाँववालों को उसे देखने और सुनने दिया, और बंबई तथा कलकत्ता के टेलीविज़न केंद्रों ने अपने शहरी दर्शकों के लिए यह प्रसारण दोबारा चलाया।
प्रयोग पर सहमति कैसे बनी
परमाणु ऊर्जा विभाग और नासा ने 18 सितंबर 1969 को एक समझौता-ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए, जिसका पूरा पाठ विदेश मंत्रालय के संधि-संग्रह में है। वह परियोजना को इंडिया/यूएस आईटीवी सैटेलाइट एक्सपेरिमेंट प्रोजेक्ट कहता है और उसका उद्देश्य “भारत में विकसित शैक्षिक टीवी कार्यक्रम सामग्री” का ग्रामीण सामुदायिक रिसीवरों तक सीधा प्रसारण बताता है। नासा के इतिहास के अनुसार विक्रम साराभाई ने नासा से कहा था कि भारतीय गाँवों में शैक्षिक टेलीविज़न प्रयोग चलाने के लिए वह अपने एटीएस उपग्रहों में से एक का एक साल के लिए उपयोग करने दे।
ज्ञापन ने भूमिकाएँ बाँटीं। यान का नियंत्रण नासा के पास रहता, जबकि प्रयोग के लिए उपग्रह का उपयोग भारत के विशेष नियंत्रण में होता। कार्यक्रम बनाने की ज़िम्मेदारी “पूरी तरह भारत” की थी। नासा की प्रतिबद्धता करीब एक साल के प्रयोग-समय तक थी, आगे कोई ज़िम्मेदारी निहित नहीं थी।
ज्ञापन उद्देश्य भी गिनाता है। भारत के मुख्य शैक्षिक लक्ष्य परिवार नियोजन, बेहतर खेती और राष्ट्रीय एकता थे। गौण लक्ष्य थे स्कूली और प्रौढ़ शिक्षा, शिक्षक-प्रशिक्षण, अन्य व्यावसायिक कौशल, और स्वास्थ्य तथा स्वच्छता। तकनीकी पक्ष में भारतीय उद्देश्यों में गाँव के रिसीवर डिज़ाइन करने, लगाने और सँभालने का अनुभव पाना शामिल था।
ज्ञापन में करीब 5,000 रिसीवरों की परिकल्पना थी और कहा गया था कि अंतिम संख्या कम हो सकती है। नासा के बाद का परियोजना-इतिहास 5,000 गाँवों की बात करता है। इसरो, एसएसी, योजना आयोग और नासा का एक तकनीकी सार, सब 2,400 गाँव बताते हैं, छह क्लस्टरों में, हर एक में करीब 400 सीधे-ग्रहण केंद्र, और यह लेख इन्हीं आँकड़ों को मानता है।
गाँव में क्या लगा था
नासा के अभिलेख के अनुसार एटीएस-6 30 मई 1974 को प्रक्षेपित हुआ था। कार्यक्रम अहमदाबाद और दिल्ली के भू-केंद्रों से ऊपर भेजे जाते और 860 मेगाहर्ट्ज़ पर एक वीडियो संकेत तथा दो ऑडियो चैनलों के साथ नीचे प्रसारित होते। प्रयोग से पहले लिखा गया नासा का एक अभिलेख बताता है कि भारत में बने एंटीना और टेलीविज़न सेटों का परीक्षण हुआ था और वे अपने विनिर्देशों पर खरे उतरे। गैलोवे ने लिखा कि स्वतंत्रता दिवस के पुनःप्रसारण के लिए उन्होंने जो एंटीना इस्तेमाल किया, वह उसी 3 मीटर यानी करीब 10 फ़ुट के प्रकार का था जो सीधे-ग्रहण सेटों में लगा था।
रमन श्रीनिवासन का नासा-इतिहास कहता है कि एक कंप्यूटर प्रोग्राम ने गाँव खास तौर पर उनके पिछड़ेपन के आधार पर चुने। ज़्यादातर में बिजली नहीं थी, इसलिए सेटों को ग्रामीण हालात के अनुरूप बदला गया और कई सौर ऊर्जा और बैटरियों पर चले। एक स्थिति-रिपोर्ट में गैलोवे ने दर्ज किया कि उड़ीसा में बैटरी से चलने वाले सेट बहुत अच्छा काम कर रहे थे, मुख्य बिजली वाले सेटों से बेहतर, जो वोल्टेज के उतार-चढ़ाव से परेशान थे। डाउन टु अर्थ के अनुसार ये कार्यक्रम ऐसे देश में पहुँचे जहाँ केवल सात शहरों में स्थानीय टेलीविज़न केंद्र थे।
योजना आयोग का मूल्यांकन कहता है कि कार्यक्रम दो प्रसारणों में रोज़ चार घंटे चलते थे, चार भाषाओं में: हिंदी, उड़िया, तेलुगु और कन्नड़। सुबह का सत्र 5 से 12 साल के स्कूली बच्चों के लिए था, और शाम का वयस्कों के लिए, मुख्यतः उनके लिए जो पढ़ नहीं सकते थे या जिन्होंने अभी पढ़ना सीखा था। नासा का अभिलेख अवधि सुबह डेढ़ घंटे और शाम को ढाई घंटे बताता है।
पर्दे पर क्या था
कार्यक्रम बनाने की मुख्य ज़िम्मेदारी ऑल इंडिया रेडियो पर थी। गैलोवे की रिपोर्टें बंबई और अहमदाबाद के साइट स्टूडियो और कटक के एक निर्माण केंद्र का ज़िक्र करती हैं। इसरो का दो महीने का सार कहता है कि अहमदाबाद स्टूडियो ने अगस्त 1975 में पिज ट्रांसमीटर के लिए करीब साढ़े नौ घंटे और सितंबर में करीब साढ़े बारह घंटे के गुजराती कार्यक्रम बनाए।
योजना आयोग की टीम ने गिना कि विकास कार्यक्रमों में क्या-क्या था। वे प्रसारण-समय का 17 से 30 प्रतिशत लेते थे, और उसका तीन-चौथाई हिस्सा खेती और स्वास्थ्य को गया। विकास कार्यक्रमों के दो-पाँचवें से ज़्यादा खेती से जुड़े थे और करीब एक-तिहाई स्वास्थ्य से।
शिक्षक और सुबह की कक्षाएँ
सुबह के कार्यक्रम कक्षाओं के लिए थे। गैलोवे ने अक्टूबर 1975 में राजस्थान का दौरा किया, जब स्कूलों में 14 से 28 अक्टूबर तक छुट्टी थी, और रिपोर्ट किया कि उपग्रह-समय का उपयोग उसके बजाय 16 से 27 अक्टूबर तक गाँव के शिक्षकों के प्रशिक्षण पाठ्यक्रम के लिए हुआ। पाठ्यक्रम में हर शिक्षक दो व्याख्यानों के बीच टीवी कार्यक्रम देखता था। उन्होंने लिखा कि शिक्षकों ने उनसे कहा कि टीवी की कक्षा उनकी अब तक की सबसे दिलचस्प कक्षा थी, और कुछ गाँवों में उन्हें लगा कि स्कूलों में दाखिले बढ़े हैं।
उन्होंने दर्ज किया कि प्रशिक्षण-योजना कम से कम 2,400 गाँवों में औसतन दस शिक्षक प्रति गाँव तक पहुँचने के लिए थी, यानी कम से कम 96,000 शिक्षक। इसरो का इतिहास-पृष्ठ साइट को एक साल में 50,000 प्राथमिक स्कूल के विज्ञान शिक्षकों को प्रशिक्षित करने का श्रेय देता है। पहली संख्या एक योजना है, दूसरी वह आँकड़ा है जो इसरो बताता है कि किया गया।
योजना आयोग ने क्या पाया
योजना आयोग ने अपने कार्यक्रम मूल्यांकन संगठन (पीईओ) से प्रयोग का अध्ययन कराया, और काम तीन चरणों में हुआ: जुलाई 1975 में आधार-रेखा सर्वेक्षण, अगस्त 1975 से जुलाई 1976 तक तीन दौरों में अवलोकन, और अगस्त से नवंबर 1976 तक दोबारा सर्वेक्षण। अध्ययन में केवल वयस्कों के कार्यक्रम शामिल थे। टीम ने छह राज्यों में से हर एक में एक ज़िला चुना और चुने हुए गाँवों में 2,140 परिवारों से बात की, जिनमें टेलीविज़न रहित गाँव तुलना के लिए थे।
रिपोर्ट के सार से निष्कर्ष:
- तीन-चौथाई उत्तरदाताओं को लगा कि विकास कार्यक्रम उपयोगी थे और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल थे, और एक-चौथाई से ज़्यादा ने दिखाई गई नई पद्धतियों की विस्तृत जानकारी ले ली।
- करीब 52 प्रतिशत दर्शक सीखी हुई बातों को लागू करने के पक्ष में थे, और 87 प्रतिशत अपने पास पहले से मौजूद जानकारी के साथ ही उन पद्धतियों को आज़माने को तैयार थे।
- जानकारी और रुख में सबसे ज़्यादा बढ़त खेती में रही, उसके बाद परिवार नियोजन, पशुपालन और स्वास्थ्य में, और रिपोर्ट के अनुसार देखने के साथ जानकारी बढ़ी।
- साल के अंत में काफ़ी उत्तरदाताओं ने कहा कि सरकार गरीब तबकों के कल्याण में ज़्यादा रुचि ले रही है, ज़्यादा उदार ऋणों और अन्य सुविधाओं के साथ। रिपोर्ट के अनुसार कभी-कभार देखने वालों का भी दृष्टिकोण व्यापक हुआ।
मूल्यांकन ने और क्या दर्ज किया
वही रिपोर्ट उपकरणों और दर्शकों के बारे में स्पष्ट है। अगस्त 1975 में अधिक से अधिक 70 प्रतिशत सेट चालू थे, और बाद में बिजली गुल होने और उपकरणों की खराबी से स्थिति गिरी। बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश में बाकी तीन राज्यों से ज़्यादा देखने के दिन गए। प्रति सेट दर्शक पहले दौर में करीब 200 से 600 लोगों से घटकर तीसरे में करीब 60 से 80 रह गए, कुल मिलाकर 59 प्रतिशत की गिरावट। एक-तिहाई से ज़्यादा उत्तरदाता घरेलू या खेती के काम के कारण प्रसारण से चूके, और करीब एक-चौथाई बीमारी या थकान के कारण।
तीसरे दौर तक वयस्क पारिवारिक सदस्यों में केवल एक-तिहाई दर्शक थे, और पीईओ कहता है कि विभागीय प्रसार तंत्र ने कार्यक्रमों में पर्याप्त हिस्सा नहीं लिया और न ही स्पष्ट करने तथा सहयोग देने की अपनी भूमिका निभाई। श्रीनिवासन का नासा-इतिहास व्यापक सबक निकालता है कि ग्रामीण टेलीविज़न ने बड़े सामाजिक बदलाव का वादा किया और तकनीकी उपायों की सीमाएँ भी दिखाईं। गैलोवे की रिपोर्टें मानसून की उन बाढ़ों का वर्णन करती हैं जिन्होंने गाँवों को काट दिया और मरम्मत धीमी की, और दर्ज करती हैं कि इसरो राज्य सरकारों पर तय समझौते के अनुसार हर साइट-गाँव में बिजली देने का दबाव डाल रहा था।
31 जुलाई 1976 के बाद
साल तय समय पर खत्म हुआ, जैसा ज्ञापन ने अनुमान लगाया था। नासा ने उपग्रह को दूसरी कक्षा में भेज दिया, और श्रीनिवासन लिखते हैं कि सैकड़ों पोस्टकार्डों और गाँववालों के प्रतिनिधिमंडलों ने अधिकारियों से प्रसारण जारी रखने की याचिका की।
इसरो का इतिहास-पृष्ठ बताता है कि आगे क्या आया। खेड़ा संचार परियोजना गुजरात के खेड़ा ज़िले में स्थानीय स्तर पर बने कार्यक्रमों की क्षेत्रीय प्रयोगशाला थी, और इसरो के अनुसार उसे ग्रामीण संचार के लिए यूनेस्को-आईपीडीसी पुरस्कार मिला। सैटेलाइट टेलीकम्युनिकेशन एक्सपेरिमेंट्स प्रोजेक्ट (स्टेप) 1977 से 1979 तक फ्रांस-जर्मनी के सिम्फ़नी उपग्रह पर चला, साइट के टेलीविज़न पर ज़ोर के अगले चरण के रूप में। उसके उद्देश्य थे घरेलू संचार के लिए भूस्थिर उपग्रहों का परीक्षण करना और प्रस्तावित इनसैट प्रणाली के लिए ज़मीनी खंड के कौशल बनाना।
श्रीनिवासन निष्कर्ष निकालते हैं कि साइट ने इसरो को उपग्रह नेटवर्क के लिए ज़रूरी ज़मीनी प्रणालियाँ बनाने और सँभालने की दक्षता दी, और देश-विदेश में संगठन की साख बढ़ाई। ग्लोबल मीडिया जर्नल का साइट के पचास साल पर 2025 का अंक ई. वी. चितनिस को कार्यक्रम प्रबंधक, प्रमोद काले को इलेक्ट्रॉनिक्स और टीवी हार्डवेयर का परियोजना प्रबंधक, और एसएसी के निदेशक यश पाल को प्रमुख व्यक्ति बताता है। भारतनेट इंटरनेट को गाँव तक कैसे पहुँचाता है गाँवों को केबल से जोड़ने के बाद के प्रयास को बताता है, और इसरो का किफ़ायती अंतरिक्ष रिकॉर्ड उसके बाद के अभियानों को।
एसएसी का इतिहास-पृष्ठ कहता है कि इनसैट-2ए, 2बी, 2सी, 2डी और 2ई उपग्रह, जो 1992, 1993, 1995, 1997 और 1999 में प्रक्षेपित हुए, केंद्र में डिज़ाइन, निर्मित और योग्यता-परीक्षित किए गए।
स्रोत और आगे पढ़ने के लिए
- ISRO: Genesis
- Space Applications Centre, ISRO: Overview and history
- Ministry of External Affairs: Memorandum of Understanding between India and the USA regarding the India-USA ITV Satellite Experiment Project, 18 September 1969 (India Bilateral Treaties and Agreements, volume 6)
- Planning Commission: Evaluation Report on Satellite Instructional Television Experiment (SITE), 1981 (NITI Aayog Library record)
- Planning Commission, Programme Evaluation Organisation: PEO Study No. 119, Evaluation Report on SITE, 1981 (summary, archived copy)
- NASA Technical Reports Server: Satellite Instructional Television Experiment (SITE), reports from the NASA resident representative in India (H. L. Galloway Jr., 1976)
- NASA Technical Reports Server: ATS-6, Satellite Instructional Television Experiment
- NASA Space Science Data Coordinated Archive: ATS-6
- NASA History Division: Beyond the Ionosphere, chapter 16, No Free Launch: Designing the Indian National Satellite (Raman Srinivasan)
- Global Media Journal, Indian Edition: Editor's note, December 2025 issue on 50 years of SITE
- Down To Earth: The passing of scientific threads (on Yash Pal)
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