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ब्रिटेन ने 1834 में 8 लाख ग़ुलामों को आज़ाद किया, और कुछ ही महीनों में भारतीय मज़दूरों से भरा पहला जहाज़ मॉरीशस के एक गन्ना बाग़ान तक पहुँचा दिया। इसके बाद जो हुआ उसे क्या नाम दिया जाए, इस पर इतिहासकार पचास साल से बहस कर रहे हैं।
मॉरीशस के पोर्ट लुई में बंदरगाह के किनारे पत्थर की चौदह सीढ़ियों की एक छोटी सी क़तार है, जो घाट से ऊपर चढ़ती है और फिर बस वहीं ख़त्म हो जाती है।
1834 से 1920 के बीच 462,000 से ज़्यादा लोग इन्हीं सीढ़ियों पर चढ़े। लगभग सभी, यानी 97.5 प्रतिशत, भारत से आए।
हर एक के हाथ में एक छपा हुआ काग़ज़ था। उस पर अंग्रेज़ी में लिखा था “एग्रीमेंट”। जिन गाँवों से इनमें से ज़्यादातर लोग आए थे, वहाँ की भोजपुरी में “एग्रीमेंट” बोलते-बोलते गिरमिट बन गया, और जो उससे बँध गया वह गिरमिटिया कहलाया, यानी उस अनुबंध वाला आदमी।
काग़ज़ के उसी पन्ने की वजह से त्रिनिदाद में हिंदू मंदिर हैं और फ़िजी में दिवाली के दीये। और उसी की वजह से इतिहासकारों ने पचास साल इस बहस में बिताए हैं कि यह दूसरे नाम की ग़ुलामी थी या नहीं।
ब्रिटेन ने 8 लाख लोगों को आज़ाद किया और उसे फ़ौरन मज़दूर चाहिए थे
ग़ुलामी उन्मूलन क़ानून 1 अगस्त 1834 को लागू हुआ और उसने ब्रिटिश साम्राज्य के अधिकांश हिस्से में 8 लाख से ज़्यादा लोगों को आज़ाद कर दिया। संसद ने मुआवज़े में 2 करोड़ पाउंड दिए, और वह मुआवज़ा मालिकों को मिला।
गन्ने के बाग़ान मालिकों ने अपने खेतों को देखा और हिसाब लगाया। ब्रिटेन ने इसका विकल्प आज़माने के लिए मॉरीशस चुना और इस आज़माइश को नाम दिया, महान प्रयोग। मक़सद यह साबित करना था कि “आज़ाद” अनुबंध पर काम करने वाला मज़दूर ग़ुलाम से ज़्यादा पैदावार दे सकता है।
यह अनुबंध इंडेंचर कहलाता था, यानी तय समय के लिए काम का करार। एक ही मालिक के पास, एक ही तय उपनिवेश में, पाँच साल, और बदले में जहाज़ का सफ़र, मज़दूरी और राशन। 2 नवंबर 1834 को एटलस नाम के जहाज़ ने पहले गिरमिटिया भारतीयों को पोर्ट लुई में उतारा।
लिवरपूल के एक व्यापारी की चिट्ठी
1836 में जॉन ग्लैडस्टन ने कलकत्ता की एक फ़र्म को चिट्ठी लिखकर लंबे अनुबंध पर 100 “जवान, फुर्तीले, हट्टे-कट्टे” मज़दूर माँगे। ग्लैडस्टन के ब्रिटिश गयाना में गन्ने के बाग़ान थे और वे एक भावी ब्रिटिश प्रधानमंत्री के पिता थे।
हेस्पेरस और व्हिटबी नाम के जहाज़ 29 जनवरी 1838 को कलकत्ता से चले और 5 मई को ब्रिटिश गयाना पहुँचे। जहाज़ों पर सवार 414 लोगों में से 18 की रास्ते में ही मौत हो गई। इनमें से करीब आधे छोटानागपुर के पठार के आदिवासी थे, जिन्हें काग़ज़ों में “हिल कुली” लिखा गया।
उन बाग़ानों में जो हुआ वह इतना बुरा था कि भारत ने उसी साल खेप भेजने पर रोक लगा दी। यह आवाजाही 1842 में फिर खुल गई और उसके बाद पचहत्तर साल और चली।
वे सब गए कहाँ
सबसे बड़ा हिस्सा मॉरीशस के खाते में गया, वही 462,000 लोग। ब्रिटिश गयाना, यानी आज का गयाना, करीब 239,000 लोगों तक पहुँचा। आज के दक्षिण अफ़्रीका में पड़ने वाले नटाल ने 1860 से करीब 152,000 लोग लिए, त्रिनिदाद ने 1845 से करीब 144,000, फ़िजी ने 1879 से करीब 61,000, जमैका ने करीब 36,000 और सूरीनाम ने करीब 34,000।
पूरी व्यवस्था का कुल जोड़ इस पर निर्भर करता है कि गिन कौन रहा है, दस लाख से ज़्यादा से लेकर बीस लाख तक। ठीक-ठीक कोई नहीं जानता। लाखों दूसरे दक्षिण एशियाई बिना किसी अनुबंध के ही गए, और बहुतों ने घर लौटने के बजाय किसी नए उपनिवेश में दूसरा अनुबंध लिख दिया।
वह आदमी जो गाँव तक आता था
भर्ती का पूरा काम कमीशन पर चलता था। गाँव तक जो आदमी पहुँचता था उसे अरकाटी कहते थे, यानी वह एजेंट जिसे बंदरगाह के डिपो तक पहुँचाए गए हर आदमी के हिसाब से पैसा मिलता था। अकाल, बाढ़, महामारी और क़र्ज़ ने उसका ज़्यादातर समझाना-बुझाना ख़ुद ही कर दिया।
उसका सबसे आम हथकंडा था भूगोल को धुँधला रखना। भर्ती होने वालों से कहा जाता कि काम कलकत्ता में है या उसके आसपास किसी शहर में, और बहुतों को असली मंज़िल का पता तब चला जब वे डिपो के भीतर पहुँच चुके थे, नाम लिखा चुके थे और अपने जान-पहचान वालों से बहुत दूर थे। अनुबंध में लिखी आपराधिक सज़ाओं को तो लगभग किसी ने नहीं समझा।
बिहार और पूर्वी संयुक्त प्रांत, यानी आज के पूर्वी उत्तर प्रदेश, के भोजपुरी बोलने वाले कलकत्ता से रवाना होते थे। तमिल और तेलुगु बोलने वाले मद्रास से जाते थे। फ़िजी जाने वाले ज़्यादातर लोग पूर्वी उत्तर प्रदेश से थे। नटाल जाने वालों में करीब दो तिहाई दक्षिण भारतीय थे।
समुद्र में दस हफ़्ते, कभी-कभी बीस
1879 में लियोनिडास को कलकत्ता से फ़िजी पहुँचने में बहत्तर दिन लगे। जहाज़ पर सवार 498 लोगों में से सत्रह की रास्ते में हैज़े और चेचक से मौत हुई, और उस अगस्त में 463 लोगों को क्वारंटीन से छोड़ा गया।
1856 से 1857 के बुरे मौसम में कैरिबियाई रास्ते पर हर सौ में से सत्रह लोग सफ़र में ही मर गए। पहुँच जाने से कुछ ख़त्म नहीं होता था। 1870 में जमैका और 1900 में मॉरीशस में गिरमिटिया मज़दूरों के बीच सालाना मौतें 12 प्रतिशत के आसपास रहीं।
पाँच साल, और काम छोड़कर चले जाने पर अपराध का रिकॉर्ड
अनुबंध की अवधि पाँच साल थी। राशन उसमें लिखा होता था: रोज़ चावल, दाल, घी और नमक। नटाल में मज़दूरी दस से बीस शिलिंग महीना थी, और औरतों को उसकी आधी। त्रिनिदाद में मर्द को दिन के करीब पच्चीस सेंट मिलते थे और औरत को सोलह।
जो शर्त सबसे ज़्यादा मायने रखती थी वह मज़दूरी नहीं थी। अनुबंध तोड़ना दीवानी नहीं, आपराधिक जुर्म था। ग़ैरहाज़िर रहना, कोई काम करने से मना करना, या लिखित परमिट के बिना बाग़ान से बाहर निकल जाना, इनमें से कुछ भी आपको मजिस्ट्रेट के सामने खड़ा कर सकता था। “डबल कट” के नियम के तहत एक दिन का काम छूटने पर दो दिन की मज़दूरी कटती थी।
नटाल की अदालतें नतीजा दिखा देती हैं। 1903 से 1908 के बीच मालिकों ने गिरमिटिया मज़दूरों के ख़िलाफ़ 15,611 शिकायतें दर्ज कराईं। मज़दूरों ने 374।
हर सौ मर्दों पर चालीस औरतें
1860 के दशक के आख़िर से भर्ती करने वालों को हुक्म था कि हर सौ मर्दों के साथ चालीस औरतें भेजी जाएँ। यह कोटा आम तौर पर पूरा नहीं होता था, और शुरू के कुछ सालों में तो अनुपात सौ पर तीन तक गिर गया था।
कैरिबियाई देशों में गए भारतीयों में करीब एक तिहाई औरतें थीं, और उनमें से दो तिहाई से ज़्यादा अकेली या विधवा थीं। कुछ औरतें विधवा जीवन, जाति के बंधनों या ख़राब शादी से निकल रही थीं, और जहाज़ ही निकलने का रास्ता था। यह सचमुच एक चुनाव था और इसे चुनाव ही गिना जाना चाहिए।
यह ग़ैरबराबरी उनके लिए ख़तरनाक भी थी। यौन संबंध के बदले राशन रोक लिया जाता था। अकेली औरतों को अक्सर अकेले रहने की इजाज़त नहीं थी और उन्हें किसी मर्द के साथ रख दिया जाता था। कई उपनिवेशों के अदालती रिकॉर्ड बताते हैं कि भारतीय मर्दों के हाथों औरतों की हत्या बार-बार दोहराया जाने वाला सिलसिला था।
इन औरतों के साथ हुआ बर्ताव भारत में अभियान चलाने वालों का सबसे तीखा हथियार बन गया।
क्या यह ग़ुलामी थी? पचास साल, और कोई फ़ैसला नहीं
1974 में ह्यू टिंकर की किताब अ न्यू सिस्टम ऑफ़ स्लेवरी, यानी “ग़ुलामी की नई व्यवस्था”, छपी। उनका तर्क था कि 1834 में काग़ज़ बदले, मशीन नहीं: भर्ती में धोखा, बाग़ान पर दंड का क़ानून, और ऐसी सुरक्षाएँ जो काग़ज़ पर थीं और कहीं नहीं। यह मुहावरा चल निकला, और तब से इस विषय के बड़े हिस्से में इसी से बहस होती रही है।
फ़िजी के भारतीयों के इतिहासकार के.एल. गिलियन ने 1975 में टिंकर की कड़ी समीक्षा लिखी, और वह बहस आज भी टिंकर-गिलियन विवाद के नाम से जानी जाती है। दोनों इस बात पर सहमत थे कि गिरमिट दमनकारी था। असहमति इस पर थी कि उसके लिए “ग़ुलामी” सही शब्द है या नहीं।
डेविड नॉर्थरप ने 1995 में लिखा कि गिरमिट आज़ाद मज़दूरों के पलायन का ही एक रूप था, जो ग़ुलामों के व्यापार से कहीं ज़्यादा उन्हीं दशकों के यूरोपीय मज़दूर आवागमन से मिलता-जुलता है। मॉरीशस पर काम करने वाली मरीना कार्टर और क्रिस्पिन बेट्स कहते हैं कि ग़ुलामी का लेबल इन प्रवासियों के अपने फ़ैसलों और उनके पारिवारिक रिश्तों को मिटा देता है। ब्रिज लाल ने फ़िजी के प्रवास परमिट एक-एक करके पढ़े और पाया कि भर्ती हुए लोग सिर्फ़ अकाल का मलबा नहीं थे। सुगत बोस उन गिरमिट जैसी व्यवस्थाओं की ओर इशारा करते हैं जो ग़ुलामी ख़त्म होने से पहले भी चल रही थीं, उन लोगों की ओर जो घर लौट गए, और उनकी ओर भी जिन्होंने अपनी मर्ज़ी से दूसरा अनुबंध लिख दिया।
इनके सामने वे लोग खड़े हैं जो ख़ुद वहाँ मौजूद थे। दक्षिण अफ़्रीका में गांधी के साथ काम करने वाले हेनरी पोलक ने नटाल के गिरमिट को “अस्थायी ग़ुलामी” कहा। फ़िजी की जाँच के लिए भेजे गए डब्ल्यू.डब्ल्यू. पियर्सन ने पाया कि सुरक्षा के क़ानून न सिद्धांत में पर्याप्त सुरक्षा देते थे, न व्यवहार में।
दोनों पक्ष एक साझा ज़मीन मानते हैं। भर्ती में धोखा रोज़ की बात थी, आपराधिक सज़ाओं ने पाँच साल तक वहाँ से निकलना नामुमकिन बना दिया था, और सुरक्षा के इंतज़ाम ज़्यादातर नाकाम रहे। फ़र्क़ इस बात में है कि कौन अनुबंध, मज़दूरी, वापसी के टिकट और उन लोगों को कितना वज़न देता है जिन्होंने ख़ुद रुकने या लौटने का फ़ैसला किया। प्रवासियों के पास जो भी चुनाव था, वह अधूरी जानकारी, ताक़त के अभाव और कमीशन पर काम करने वाले भर्ती एजेंट के बीच घिरा हुआ था। नेशनल आर्काइव्स, जिसके पास इस विषय के बहुत से सबूत रखे हैं, आज भी इसे तय हो चुका सवाल नहीं, खुला सवाल कहता है।
वह किताब जिसने इसे ख़त्म कराने में मदद की
तोताराम सनाढ्य ने इक्कीस साल फ़िजी में बिताए, घर लौटे, और सब लिख डाला। फ़िजी द्वीप में मेरे इक्कीस वर्ष 1914 में छपी, किसी गिरमिटिया की लिखी पहली किताब। फ़िजी ने उस पर रोक लगा दी। भारत ने उसे पढ़ा। अगले ही साल सरकार ने सी.एफ़. एंड्रयूज़ और डब्ल्यू.डब्ल्यू. पियर्सन को फ़िजी भेजा ताकि वे ख़ुद जाकर देखें।
गोपाल कृष्ण गोखले 4 मार्च 1912 को इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में गिरमिट पर पूरी तरह रोक लगाने का प्रस्ताव पहले ही ला चुके थे। वह प्रस्ताव गिर गया, पर वायसराय ने जल्द क़दम उठाने और मज़दूरी से जुड़े जुर्मों में जेल की सज़ा ख़त्म करने का वादा किया। मदन मोहन मालवीय ने मार्च 1916 में फिर कोशिश की और वे भी हार गए। गांधी ने इसे ख़त्म कराने को राष्ट्रीय माँग बना दिया। दक्षिण अफ़्रीका में बिताए अपने इक्कीस सालों में वे ख़ुद नटाल के उस 3 पाउंड वाले कर के ख़िलाफ़ लड़ चुके थे, जो अनुबंध पूरा होने के बाद वहीं रुक जाने वाले भारतीयों पर लगाया जाता था।
यह व्यवस्था मार्च 1917 में युद्धकालीन अध्यादेशों के तहत रोक दी गई, और सरकारी वजह बताई गई जहाज़ों की कमी और सेना में भर्ती। आख़िरी अनुबंध 1 जनवरी 1920 को रद्द हुए।
जहाज़ जो पीछे छोड़ गए
उन चौदह सीढ़ियों पर चढ़ने वाले लोगों के वंशज आज मॉरीशस की आबादी का 70 प्रतिशत से ज़्यादा हैं। गिरमिटिया मूल के भारतीय गयाना, त्रिनिदाद और टोबैगो तथा फ़िजी की आबादी का 30 से 40 प्रतिशत हैं, और सूरीनाम की करीब 27 प्रतिशत।
वे ऐसी भाषाएँ बोलते हैं जो और कहीं नहीं मिलतीं: फ़िजी हिंदी, सूरीनाम की सरनामी हिंदुस्तानी, और मॉरीशस की भोजपुरी। 2016 में यूनेस्को ने मॉरीशस के गीत-गवई को, यानी शादी से पहले होने वाली भोजपुरी गीतों की रस्म को, दुनिया की जीवित विरासत की सूची में शामिल किया। ये गीत जहाज़ों के निचले खानों में सवार होकर वहाँ पहुँचे थे।
फ़िजी, गयाना, सूरीनाम और त्रिनिदाद के जो गिरमिट रजिस्टर बच गए हैं, वे यूनेस्को की “मेमोरी ऑफ़ द वर्ल्ड” सूची में दर्ज हैं, क्योंकि इनमें से ज़्यादातर परिवारों के लिए वही अकेला रिकॉर्ड है जो उनका कोई पुरखा छोड़ गया: एक नाम, एक गाँव, पिता का नाम, क़द, और शरीर पर कोई निशान।
इतिहासकार इसे क्या नाम दें, इस पर बहस करते रह सकते हैं। जिन लोगों को इसने गढ़ा, उन्होंने अपना नाम बहुत पहले चुन लिया था, और वह वही नाम है जिसे उनके परदादा घाट पर खड़े होकर ग़लत उच्चारण के साथ बोल गए थे।
स्रोत और आगे पढ़ने के लिए
- UNESCO World Heritage Centre: Aapravasi Ghat, Mauritius
- The National Archives (UK): Indian Indentured Labour, migration histories project
- The National Archives (UK): How to look for records of Indian indentured labourers
- Royal Historical Society: Indian Indentured Trade and 'The First Crossing', 29 January 1838
- Indentured Labour Route Project, Government of Mauritius: Indenture in the World
- Coolitude, University of Edinburgh: The Abolition of Indentured Labour Migration
- Slavery and Abolition: The Tinker-Gillion Controversy in Indo-Fijian Indenture Historiography
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