चित्रण: tuput
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यूनेस्को ने भोपाल से 45 किमी दक्षिण-पूर्व में स्थित भीमबेटका के शैलाश्रयों को 2003 में मानदंड (iii) और (v) के तहत, 1,893 हेक्टेयर की संपदा के रूप में दर्ज किया। वी. एस. वाकणकर ने स्थल की पहचान 1957 में की, और भारत की नामांकन फ़ाइल अकेली भीमबेटका पहाड़ी पर 243 शैलाश्रय गिनती है, जिनमें 133 चित्रित हैं। फ़ाइल कहती है कि चित्रों की कोई सीधी तिथि नहीं है और शैली, रंग की परतों के एक-दूसरे पर चढ़ने और खुदाइयों में मिले रंगद्रव्यों के आधार पर उन्हें मध्यपाषाण काल से आगे का रखती है।
यूनेस्को ने 2003 में भीमबेटका के शैलाश्रयों को विश्व धरोहर सूची में रखा। संरक्षित क्षेत्र मध्य प्रदेश के रायसेन ज़िले की बलुआ पत्थर की पहाड़ियों के 1,893 हेक्टेयर में फैला है, और भारत की नामांकन फ़ाइल अकेली भीमबेटका पहाड़ी पर 243 शैलाश्रय गिनती है, जिनमें 133 में चित्र हैं। फ़ाइल सबसे नज़दीकी गाँव भियानपुरा को भोपाल से 45 किमी दक्षिण-पूर्व में रखती है।
यूनेस्को का अपना वर्णन छोटा है। शैलाश्रय विंध्य पर्वतों की तलहटी में, मध्य भारतीय पठार के दक्षिणी किनारे पर, अपेक्षाकृत घने जंगल के ऊपर बलुआ पत्थर की विशाल चट्टानों में हैं। प्राकृतिक शैलाश्रयों के पाँच समूह हैं, और यूनेस्को के अनुसार उनके चित्र मध्यपाषाण काल से लेकर ऐतिहासिक काल तक के प्रतीत होते हैं। स्थल से सटे इक्कीस गाँव ऐसी परंपराएँ निभाते हैं जो दीवारों की परंपराओं से बहुत मिलती हैं। हमारा मध्य प्रदेश का परिचय इसे राज्य के दो अन्य विश्व धरोहर स्थलों, खजुराहो और साँची, के साथ गिनाता है।
यूनेस्को ने 2003 में क्या दर्ज किया
विश्व धरोहर समिति ने भीमबेटका को अपने 27वें सत्र में सांस्कृतिक मानदंड (iii) और (v) पर दर्ज किया। मानदंड (iii) के अंतर्गत समिति के शब्द हैं कि भीमबेटका लोगों और उनके आसपास की भूमि के बीच लंबे संवाद को दर्शाता है, जो “उसकी शैल-कला की मात्रा और गुणवत्ता” में दिखता है। मानदंड (v) के अंतर्गत वह कहती है कि स्थल शिकार और संग्रह की अर्थव्यवस्था से निकटता से जुड़ा है, जो चित्रों में और संपदा के किनारे के आदिवासी गाँवों में उस परंपरा के बचे हुए निशानों में दिखता है।
यूनेस्को के सूची-पृष्ठ पर संपदा 1,893 हेक्टेयर की और बफ़र क्षेत्र 10,280 हेक्टेयर का है। नामांकन फ़ाइल में मुख्य क्षेत्र 1,892 हेक्टेयर है, और इकोमोस का मूल्यांकन, यानी सलाहकार संस्था की रिपोर्ट, 1,893 और 1,892 दोनों का प्रयोग करती है। इकोमोस का मूल्यांकन शैलाश्रयों को शैल-कला के सबसे घने ज्ञात जमावों में से एक बताता है।
शैलाश्रयों की गिनती अलग क्यों है
स्रोत अलग-अलग चीज़ें गिनते हैं, इसलिए उनकी संख्याएँ आपस में बदली नहीं जा सकतीं। यूनेस्को पाँच समूहों की बात करता है। इकोमोस की रिपोर्ट उन पाँच समूहों में 400 चित्रित शैलाश्रय गिनाती है, बफ़र क्षेत्र में एक और बड़े परिसर के साथ, और नोट करती है कि नामांकन ने स्वयं 133 चित्रित शैलाश्रय दर्ज किए थे। नामांकन फ़ाइल कहती है कि वाकणकर के सर्वेक्षण में क्षेत्र में 700 से अधिक शैलाश्रय मिले। भीमबेटका समूह के 243 में से 133 में चित्र हैं, और पड़ोसी लाखा जुआर समूह में दो पहाड़ियों पर 178 शैलाश्रय हैं।
पर्यटन मंत्रालय का इनक्रेडिबल इंडिया पृष्ठ एक और वर्णन देता है: सात पहाड़ियाँ और 10 किमी में फैले 750 से अधिक शैलाश्रय। भोपाल की शोधकर्ता मीनाक्षी दुबे-पाठक मुख्य क्षेत्र की पाँच पहाड़ियों के नाम विनायका, भोंरावली, भीमबेटका, लखाजुआर पूर्व और लखाजुआर पश्चिम बताती हैं। वे लिखती हैं कि केवल भीमबेटका पहाड़ी आसानी से पहुँच में है, और हर दिन बीस से कम चित्रित शैलाश्रय खुले रहते हैं।
नामांकन फ़ाइल कहती है कि भीमबेटका नाम पारंपरिक रूप से भीमबैठका से निकला है, यानी महाभारत के पाँच पांडवों में से एक भीम का आसन।
वाकणकर की 1957 की पहचान और उसके बाद की खुदाइयाँ
भारत की नामांकन फ़ाइल और इकोमोस की रिपोर्ट दोनों कहती हैं कि स्थल-परिसर की खोज वी. एस. वाकणकर ने 1957 में की। दुबे-पाठक लिखती हैं कि वाकणकर कहा करते थे कि उन्होंने ट्रेन से बलुआ पत्थर की संरचनाएँ देखीं, उतरकर खोजबीन की, और भीमबेटका पा लिया। वे कहती हैं कि उन्होंने 1988 में अपनी मृत्यु तक शैलाश्रयों का अध्ययन किया।
नामांकन 1971 को पहली व्यवस्थित जाँच गिनता है, जब सागर विश्वविद्यालय के के. डी. बाजपेयी और एस. के. पांडे ने दो शैलाश्रयों का अध्ययन किया। 1972 से वाकणकर ने करी तलाई से जाओरा तक क्षेत्र का सर्वेक्षण किया, उसे सात भौगोलिक क्षेत्रों में बाँटा, समूहों को अक्षर दिए और हर शैलाश्रय को संख्या दी, जो प्रणाली फ़ाइल के अनुसार आज भी चलती है। 1972 और 1977 के बीच वाकणकर, दक्कन कॉलेज के वी. एन. मिश्र और बासेल संग्रहालय की सुसान हास ने भीमबेटका में खुदाई की और उन्हें, नामांकन के शब्दों में, पाषाण युग की संस्कृतियों का, उत्तर अच्यूलियन से उत्तर मध्यपाषाण तक, एक अटूट क्रम मिला, साथ ही दुनिया के कुछ सबसे पुराने पत्थर के फ़र्श और दीवारें। सर्वेक्षण की प्रागैतिहास शाखा के के. डी. बनर्जी ने 1981 और 1982 में वहाँ खुदाई की। सर्वेक्षण ने 1990 में स्थल की ज़िम्मेदारी सँभाली, और प्राचीन स्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 के तहत गज़ट अधिसूचना फ़रवरी 1990 में आई।
चित्र क्या दिखाते हैं
इकोमोस चित्रों को मुख्यतः सफ़ेद और लाल बताता है, जो आसपास के जंगल के पशु-जीवन और आर्थिक तथा सामाजिक जीवन का अभिलेख हैं। उनमें विलुप्त पशु, पालतू पशु, गाड़ियाँ और रथ, अलंकरण, अभिलेख और ऐतिहासिक काल के बौद्ध प्रतीक, साज-सजे घोड़ों और हाथियों पर सवार पुरुषों के जुलूस, और युद्ध के दृश्य शामिल हैं। आकार पाँच सेंटीमीटर से लेकर शैलाश्रय III C-6 की छत के एक फीके पशु तक हैं, जो लगभग पाँच मीटर लंबा और दो मीटर चौड़ा है। कुछ शैलाश्रयों में रंग की पंद्रह परतें तक एक-दूसरे पर चढ़ी हैं।
दुबे-पाठक वाई. मथपाल की 1984 की गिनतियों का सार देती हैं। उनमें 2,330 मानव आकृतियाँ और लगभग 29 प्रजातियों के 1,377 पशु चित्र हैं, जिनमें 15 बाघ, 88 जंगली भैंसे और 113 चीतल (चित्तीदार हिरण) हैं। 561 घोड़ों में सब ऐतिहासिक काल के हैं, और उनमें से 510 पर सवार हैं। वे 161 नर्तक, 285 शिकारी आकृतियाँ और 222 हाथ भी गिनाती हैं, जिनमें अधिकतर हथेलियों की छापें हैं। शैलाश्रय III C-50 अपने पशुओं के कारण लोक में ज़ू रॉक कहलाता है। शैलाश्रय III C-19 में एक पौराणिक पशु, जिसमें वे कहती हैं कि सूअर, बैल और हाथी की विशेषताएँ मिली हैं और जो 1.26 मीटर लंबा है, एक छोटे नकाबपोश आदमी और एक बड़े केकड़े का पीछा करता दिखता है।
नामांकन चित्रित और उत्कीर्ण अभिलेखों की तिथि दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व, शुंग काल की ब्राह्मी लिपि, से लेकर सातवीं शताब्दी ईस्वी तक रखता है।
चित्रों की तिथि कैसे तय की जाती है
नामांकन साफ़ कहता है कि चित्रों की कोई निरपेक्ष तिथि नहीं है। भारत की फ़ाइल कालक्रम के आधार गिनाती है: खुदाइयों में मिले रंग, ज़्यादातर खनिज की गाँठें और सबसे पुरानी मध्यपाषाण परतों से हेमेटाइट के लाल रंग की घिसी टिकियाँ, साथ में पटीना, सांस्कृतिक सामग्री, पौधे और पशु, एक-दूसरे पर चढ़ाव और शैली।
चित्रों से ही फ़ाइल यह तर्क करती है कि कई चित्र तब बने जब सूक्ष्मपाषाण, यानी छोटे पत्थर के फलक, तीर की नोक बनने लायक छोटे हो चुके थे और जब कोई पालतू पशु नहीं था, जो मध्यपाषाण काल की ओर इशारा करता है। मालवा के मृद्भांडों की बनावट से मिलती ज्यामितीय आकृतियाँ ताम्रपाषाण काल, यानी तांबा प्रयोग करने वाले काल, की ओर इशारा करती हैं। इकोमोस ने लिखा कि शैल-कला की तिथि त्वरक द्रव्यमान स्पेक्ट्रोमीट्री से सीधे नहीं निकाली गई थी, और ऑस्ट्रेलियाई शोधकर्ताओं के साथ सीधी तिथि-निर्धारण का काम चल रहा था। उसने कहा कि वर्तमान ज्ञान के अनुसार कला मध्यपाषाण काल, लगभग 10,000 वर्ष पहले, से ऐतिहासिक और हाल के कालों तक की है। हमारे खोले स्रोतों में भीमबेटका के किसी चित्र की कोई प्रकाशित सीधी तिथि नहीं मिली।
वाकणकर की अपनी योजना, जैसा दुबे-पाठक उनकी आर. आर. आर. ब्रुक्स के साथ 1976 की पुस्तक से बताती हैं, में पाँच काल हैं। काल 1 मध्यपाषाण या उससे पहले का है, 8000 (अनिश्चित चिह्नित) से 2500 ईसा पूर्व तक। काल 2 2500 से 300 ईसा पूर्व तक चलता है, काल 3 300 ईसा पूर्व से ईस्वी 800 तक, और काल 4 तथा 5 ईस्वी 800 से वर्तमान तक। उन्होंने हरी आकृतियों को उस योजना से बाहर, उत्तर पुरापाषाण काल में रखा।
पर्यटन मंत्रालय का पृष्ठ अलग दायरा देता है। वह कहता है कि चित्र मध्यपाषाण, पुरापाषाण और नवपाषाण कालों तक जाते हैं और उनमें से कुछ को 30,000 वर्ष तक पुराना बताता है। यूनेस्को के शब्द, “मध्यपाषाण काल के प्रतीत होते हैं”, अधिक सीमित हैं, और नामांकन फ़ाइल की अपनी सावधानी और भी दृढ़ है।
वाकणकर का काल 2 उन शताब्दियों में शुरू होता है जब हड़प्पा के नगर लोथल और धोलावीरा बसे हुए थे। हमारे पढ़े स्रोत शैलाश्रयों को उन नगरों से नहीं जोड़ते। नामांकन फ़ाइल कहती है कि ताम्रपाषाण मृद्भांडों वाले परतदार निक्षेप मैदानों के ताम्रपाषाण लोगों और शैलाश्रयों के बीच संपर्क दिखाते हैं।
ऑडिटोरियम गुफा के निशान
ऑडिटोरियम गुफा भीमबेटका की सबसे बड़ी गुफा है। पर्यटन मंत्रालय गॉथिक मेहराबों और “गिरजाघर जैसे” अनुभव का वर्णन करता है। पुरातत्वविद रॉबर्ट बेडनारिक उस चट्टानी मीनार को, जिसमें वह है, पर्वत-श्रृंखला के सबसे ऊँचे बिंदु पर, समुद्र तल से 619 मीटर ऊपर रखते हैं। गुफा के केंद्र के पास एक शिला मुखिया की शिला कहलाती है, यह नाम भारतीय पुरातत्वविदों ने दिया और बेडनारिक को इसके अनुष्ठानिक प्रयोग का कोई प्रमाण नहीं मिलता।
बेडनारिक बताते हैं कि 1990 में गुफा में ग्यारह शैल-उत्कीर्णन, यानी चट्टान में काटे निशान, देखे गए। वाकणकर ने उन्हें पहले शैल-घंटा के निशान समझा था। उनमें से दो, एक प्यालेनुमा गड्ढा (गोल प्याले जैसा खोखल) और एक लहरदार खाँचा, वाकणकर ने एक अच्यूलियन निक्षेप से खोदकर निकाले थे जो उन्हें सीधे ढके हुए था। बेडनारिक लिखते हैं कि वाकणकर ने उन्हें नोटिस नहीं किया था। शेष नौ, सब प्यालेनुमा गड्ढे, मुखिया की शिला की पूर्वी सतह पर हैं। बेडनारिक ने 1996 में प्रस्ताव दिया कि वे समान आयु के हैं, और उनमें से एक की तिथि सूक्ष्म-क्षरण विश्लेषण से तय करने के प्रयास ने उसे उस पद्धति की सीमा से परे पाया, जिसके आधार पर 100,000 वर्ष से अधिक की आयु प्रस्तावित की गई है।
बेडनारिक ने बाद में उस प्रस्ताव में संशोधन किया। प्यालेनुमा गड्ढों पर अपने 2008 के शोधपत्र में वे लिखते हैं कि ऑडिटोरियम गुफा के गड्ढे शायद दोनों अच्यूलियन स्तरों के नीचे मिलने वाली एक चॉपिंग-टूल परंपरा के हों। उसी वर्ष केव आर्ट रिसर्च न्यूज़लेटर में वे कहते हैं कि भीमबेटका में प्रमाण दराकी-चट्टान, मध्य भारत के चंबल बेसिन की एक प्यालेनुमा-गड्ढों वाली गुफा, की तुलना में “बहुत कमज़ोर” है। कुमार, कृष्ण और बेडनारिक ने 2019 में लिखा कि दराकी-चट्टान की आयु जैसी प्रतीत होने वाली आयु का एकमात्र दूसरा शैल-कला संग्रह ऑडिटोरियम गुफा में है। फ़्रांसीसी विशेषज्ञ मिशेल लोर्ब्लांशे ने 1993 में देखे निशानों को प्राकृतिक ठहराया, और बेडनारिक जवाब देते हैं कि उन्होंने दूसरे गड्ढों की जाँच की थी।
इकोमोस कहता है कि ऑडिटोरियम गुफा की खाई III F को जनता के देखने के लिए सुरक्षित रखा गया। बेडनारिक लिखते हैं कि सर्वेक्षण ने 1991 में दोनों दबे उत्कीर्णनों को फिर ढक दिया, जब उसने खाई बड़ी की और स्टील की रेलिंग वाली चिनाई की दीवार बनाई, और मुखिया की शिला के नौ गड्ढे आगंतुकों के लिए खुले रहते हैं।
समिति ने भारत से क्या माँगा
इकोमोस ने नामांकन को टालने की सिफ़ारिश की थी ताकि भारत सामुदायिक भागीदारी, सीमाओं और चित्रित संग्रह के विस्तार को स्पष्ट कर सके। समिति ने इसके बजाय स्थल को दर्ज कर लिया। उसका निर्णय भारत से कहता है कि संभव हो तो एक वर्ष के भीतर नामांकित क्षेत्र की शैल-कला का सर्वेक्षण करे और उसके संरक्षण का आकलन करे। वह यह भी सुझाता है कि भविष्य में सीमा बढ़ाकर आदिवासी गाँवों के आसपास के व्यापक क्षेत्र का एक भाग शामिल किया जाए। भारत की फ़ाइल ने बताया कि चित्रों की कोई पूरी सूची मौजूद नहीं थी, और धूप में फीका पड़ना, पानी का बहाव, शैवाल और तोड़-फोड़ को नुक़सान के कारणों के रूप में गिनाया।
भीमबेटका की यात्रा
पर्यटन मंत्रालय शैलाश्रयों को भोपाल से 45 किमी दूर, भियापुरा गाँव के पास, भोपाल से होशंगाबाद राजमार्ग के किनारे रखता है। उसके सूचीबद्ध समय 7:00 से 18:00 हैं। नामांकन फ़ाइल नोट करती है कि स्थल रातापानी वन्यजीव अभयारण्य के उत्तरी किनारे के भीतर है।
दुबे-पाठक लिखती हैं कि खुले शैलाश्रयों तक साल भर सुबह से शाम तक पहुँचा जा सकता है, पक्के रास्तों, चित्रित दीवारों के सामने रेलिंग, सूचना पट्टों, चौकीदारों और मुफ़्त पुस्तिकाओं के साथ। फ़ोटोग्राफ़ी की अनुमति है। हम जिन आधिकारिक पृष्ठों को खोल सके, उनमें से किसी में टिकट का दाम नहीं दिया है, इसलिए पुरातत्व सर्वेक्षण के भोपाल मंडल से या प्रवेश-द्वार पर पुष्टि कर लें। दुबे-पाठक औसतन साल में 40,000 से अधिक आगंतुक बताती हैं, और नामांकन फ़ाइल ने नवंबर से मार्च के चरम मौसम में लगभग 2,000 प्रति माह का अनुमान लगाया था।
स्रोत और आगे पढ़ने के लिए
- UNESCO World Heritage Centre: Rock Shelters of Bhimbetka (list entry 925: description, criteria, property and buffer zone areas)
- UNESCO World Heritage Committee, Decision 27 COM 8C.21: Rock Shelters of Bhimbetka (India), 2003
- ICOMOS evaluation of the Bhimbetka nomination, No 925 (Advisory Body Evaluation, March 2003)
- Government of India, nomination dossier: Rock Shelters of Bhimbetka (UNESCO nomination file 925, prepared with the Archaeological Survey of India)
- Ministry of Tourism, Incredible India: Bhimbetka Rock Shelters (Bhopal)
- Meenakshi Dubey-Pathak, The Rock Art of the Bhimbetka Area in India, Adoranten 2014 (Scandinavian Society for Prehistoric Art)
- Robert G. Bednarik, Auditorium Cave: oldest known cave art in the world, Cave Art Research 8 (2008)
- Robert G. Bednarik, Cupules, Rock Art Research 25(1), 2008, pp. 61 to 100
- Giriraj Kumar, Ram Krishna and Robert G. Bednarik, Scientific study of the cupules in Daraki-Chattan Cave, India, Rock Art Research 36(2), 2019
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