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शोले 15 अगस्त 1975 को रिलीज़ हुई, 1980 तक मुंबई के मिनर्वा थिएटर में चली और 2025 में 4K में बहाल की गई, उस अंत के साथ जिसे सेंसर ने काट दिया था
कला और सिनेमा

शोले 15 अगस्त 1975 को रिलीज़ हुई, 1980 तक मुंबई के मिनर्वा थिएटर में चली और 2025 में 4K में बहाल की गई, उस अंत के साथ जिसे सेंसर ने काट दिया था

फ़ोटो: Srishti Sethi / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0 (क्रॉप किया गया)

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रमेश सिप्पी की शोले की शूटिंग बेंगलुरु से करीब 50 किमी दूर रामदेवरा बेट्टा की ग्रेनाइट पहाड़ियों पर हुई, और यह 1975 से 1980 तक मुंबई के मिनर्वा थिएटर में चली। फ़िल्म हेरिटेज फ़ाउंडेशन और सिप्पी फ़िल्म्स ने इसकी बहाली में करीब तीन साल लगाए, और यह संस्करण 27 जून 2025 को बोलोन्या में मूल अंत के साथ दिखाया गया।

· · 8 मिनट का पठन

शोले 15 अगस्त 1975 को सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई। निर्देशन रमेश सिप्पी का था, निर्माता उनके पिता जी.पी. सिप्पी थे, और लेखक सलीम खान और जावेद अख़्तर। इसकी शूटिंग कर्नाटक के रामनगर ज़िले में रामदेवरा बेट्टा की ग्रेनाइट पहाड़ियों पर हुई, और यह 1975 से 1980 तक मुंबई के मिनर्वा थिएटर में चली। मूल अंत वाला एक बहाल किया हुआ संस्करण 27 जून 2025 को बोलोन्या में दिखाया गया और 12 दिसंबर 2025 को भारत में 1,500 स्क्रीन पर रिलीज़ हुआ।

चार पंक्तियों का विचार और एक दूसरी फ़िल्म की पूरी पटकथा

सलीम खान ने 2019 में ओपन मैगज़ीन से कहा कि लेखक जोड़ी के रूप में उन्होंने और जावेद अख़्तर ने सिप्पी परिवार को दो कहानियाँ सुनाईं। एक चार पंक्तियों का विचार था, जो शोले बना। दूसरी मजबूर नाम की पूरी पटकथा थी। खान के अनुसार रमेश सिप्पी को पूरी पटकथा पसंद आई, पर जी.पी. सिप्पी ने शोले को उसके पैमाने के कारण चुना, और उन्हें मजबूर को 70 मिमी और स्टीरियोफ़ोनिक साउंड में बनाने का कोई तुक नहीं दिखा।

खान के अनुसार पटकथा में करीब एक महीना और संवादों में करीब छह हफ़्ते लगे, जिनमें रमेश सिप्पी, सतीश भटनागर और नरेंद्र बेदी ने भी योगदान दिया। लेखकों को इसके लिए 1.5 लाख रुपये मिले। वे चार पश्चिमी फ़िल्मों को प्रेरणा के रूप में गिनाते हैं: द मैग्निफ़िसेंट सेवन, द डर्टी डज़न, द फ़ाइव मैन आर्मी और वन्स अपॉन अ टाइम इन द वेस्ट। वीरू और जय के नाम इंदौर के उनके कॉलेज के दोस्तों से आए, वे कहते हैं।

फ़िल्म की तकनीकी महत्वाकांक्षा फ़िल्म हेरिटेज फ़ाउंडेशन के उस विवरण में दर्ज है जिसे द वीक ने छापा, और जो इसे भारत की पहली 70 मिमी फ़िल्म और स्टीरियोफ़ोनिक साउंड वाली पहली हिंदी फ़िल्म कहता है। इल सिनेमा रित्रोवातो का नोट जोड़ता है कि इसे 35 मिमी पर शूट किया गया था और लंदन की टेक्नीकलर प्रयोगशाला में 70 मिमी में बड़ा किया गया।

ठाकुर और गब्बर कौन बने

सलीम खान कहते हैं कि दिलीप कुमार ने ठाकुर बलदेव सिंह की भूमिका ठुकरा दी, जो संजीव कुमार को मिली। संजीव कुमार गब्बर सिंह करना चाहते थे, पर लेखकों को लगा कि उनकी पहले की सहानुभूति वाली भूमिकाएँ इसके अनुकूल नहीं थीं। डैनी डेन्ज़ोंगपा दूसरा विकल्प थे, और वे अफ़ग़ानिस्तान में धर्मात्मा की शूटिंग कर रहे थे। नवोदित अमजद खान को स्क्रीन टेस्ट के बाद चुना गया।

जावेद अख़्तर ने 2015 में द क्विंट से कहा कि अमिताभ बच्चन को जय के लिए ज़ंजीर रिलीज़ होने से पहले साइन किया गया था, जब वे अभी बड़े सितारे नहीं थे। उन्होंने बताया कि दीवार जनवरी 1975 में आई और शोले अगस्त में। बच्चन का व्यापक रिकॉर्ड उनके करियर की हमारी प्रोफ़ाइल में है।

रामगढ़ कर्नाटक की एक पहाड़ी पर बना

फ़िल्म की 50वीं वर्षगाँठ पर DT Next में छपी PTI की रिपोर्ट के अनुसार शूटिंग अक्तूबर 1973 में रामनगर ज़िले में शुरू हुई। रामदेवरा बेट्टा (कन्नड़ में बेट्टा का अर्थ पहाड़ी है) रामगढ़ गाँव और गब्बर सिंह के अड्डे की जगह खड़ा था। दल ने एक बस्ती बनाई और बेंगलुरु-मैसूर राजमार्ग से सेट तक सड़क बनाई, और एक स्थानीय निवासी बेट्टैया ने संवाददाता को बताया कि वन विभाग ने बाद में उस सड़क पर डामर बिछाया। एक और निवासी बोरम्मा ने, जो एक छोटी भूमिका में दिखी थीं तब सात साल की थीं, कहा: “रामदेवरा ‘शोले’ की वजह से मशहूर हुआ।”

शूटिंग कितनी लंबी चली, इस पर विवरण अलग-अलग हैं। इल सिनेमा रित्रोवातो कहता है कि निर्माण में ढाई साल लगे। फ़िल्म कंपेनियन कहता है कि छह महीने की योजना एक साल से काफ़ी ऊपर खिंच गई। वर्षगाँठ की रिपोर्ट के दो रूप करीब डेढ़ साल (द ट्रिब्यून) और करीब ढाई साल (DT Next) बताते हैं। जावेद अख़्तर को याद था कि कुछ कलाकारों को बेंगलुरु का चुनाव खटका था और वे राजस्थान चाहते थे।

कर्नाटक पर्यटन रामदेवरा बेट्टा को वह पहाड़ी बताता है जहाँ शोले शूट हुई, जिसकी चोटी पर एक मंदिर है, प्रवेश शुल्क और पार्किंग है, और वह सुबह जल्दी जाने और मानसून से बचने की सलाह देता है, जब कोहरा और बारिश रास्ते को फिसलन भरा बना देते हैं। वह बेंगलुरु से दूरी एक पन्ने पर 50 किमी और उसी पहाड़ी के गिद्ध अभयारण्य के पन्ने पर 70 किमी देता है, जिसे 2012 में घोषित किया गया था। वह पन्ना इसे भारत का पहला गिद्ध अभयारण्य बताता है, जहाँ गंभीर रूप से संकटग्रस्त लंबी चोंच वाला गिद्ध रहता है, जो सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुला है और जिसके लिए नवंबर से मार्च सबसे अच्छा मौसम है। आउटलुक ट्रैवलर बताता है कि स्थानीय लोग पहाड़ी को “शोले बेट्टा” कहते हैं और रामनगर शहर में फ़िल्म के भित्तिचित्र हैं। ये पन्ने 28 अक्तूबर 2026 को पढ़े गए थे, और जाने से पहले खुलने का समय और शुल्क वन विभाग से जाँच लेने चाहिए।

दो हफ़्ते की ख़राब समीक्षाएँ

आउटलुक के अनुसार फ़िल्म 25 जून 1975 को आपातकाल घोषित होने के दो महीने से भी कम समय बाद रिलीज़ हुई। लंदन में मिक्स किए गए 70 मिमी स्टीरियोफ़ोनिक प्रिंट सीमा शुल्क में रोक लिए गए, इसलिए आउटलुक और फ़िल्म कंपेनियन के अनुसार समीक्षकों ने मानक 35 मिमी प्रिंट देखा। ओपन मैगज़ीन बंबई में दो हफ़्ते की ख़राब समीक्षाएँ दर्ज करती है, जिनमें ट्रेड पत्र ट्रेड गाइड ने शीर्षक का “छोले” कहकर मज़ाक उड़ाया।

गल्फ़ न्यूज़ बताता है कि अख़बारों ने लागत के कारण इसे फ़्लॉप कहा। रमेश सिप्पी कह चुके हैं कि बजट 1 करोड़ रुपये से शुरू हुआ और देरी और दोबारा शूटिंग से 3 करोड़ रुपये तक पहुँचा, जबकि ओपन मैगज़ीन लागत 2.5 करोड़ रुपये बताती है। लोगों की ज़ुबानी चर्चा दर्शकों को वापस लाई। ओपन मैगज़ीन के अनुसार पॉलीग्राम द्वारा इसके संवाद तीन-एलपी सेट के रूप में जारी करने के बाद फ़िल्म की स्थिति बदली।

1975 और बाद के पुनःप्रदर्शनों की बॉक्स-ऑफ़िस कुल कमाई तय नहीं है। ओपन मैगज़ीन 15 करोड़ रुपये देती है, और गल्फ़ न्यूज़ कहता है कि दुनिया भर में इसने कथित तौर पर 50 करोड़ रुपये कमाए। दोनों में से कोई बही-खाते का नाम नहीं देता, और दोनों आँकड़े अनुमान ही समझे जाने चाहिए।

मिनर्वा का प्रदर्शन

आउटलुक मुंबई के मिनर्वा सिनेमा में 286 हफ़्तों का अटूट प्रदर्शन दर्ज करता है, जो 10 दिसंबर 1980 को ख़त्म हुआ, और कहता है कि पहले 75 हफ़्ते कथित तौर पर अग्रिम बुकिंग पर बिके। यश राज फ़िल्म्स अपनी दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे वाली विज्ञप्ति में प्रदर्शन को पाँच साल, 1975 से 1980, बताता है और कहता है कि उस फ़िल्म ने 2001 में रिकॉर्ड तोड़ा। आउटलुक इस बदलाव की तारीख़ अगस्त 2001 बताता है। धनम ऑनलाइन मिनर्वा को 1,500 सीटों का बताता है।

छपे हुए हफ़्तों की गिनती और अंतिम तारीख़ आपस में पूरी तरह मेल नहीं खातीं, क्योंकि 15 अगस्त 1975 से 286 हफ़्ते 1981 की शुरुआत में पूरे होते। हफ़्तों को एक दर्ज किया गया आँकड़ा मानें और पाँच साल को ज़्यादा सुरक्षित कथन। आउटलुक जोड़ता है कि फ़िल्म ने 100 से ज़्यादा थिएटरों में सिल्वर जुबली मनाई और रिकॉर्ड 60 गोल्डन जुबली, और कोलकाता के ज्योति सिनेमा में यह 103 हफ़्ते चली।

वह अंत जिसे सेंसर ने बदला

मूल अंत में ठाकुर अपने काँटेदार जूतों से गब्बर सिंह को मार डालता है। इल सिनेमा रित्रोवातो कहता है कि आपातकाल के दौरान सेंसर बोर्ड ने अंत को बदलकर एक हल्के क्लाइमैक्स में करने पर ज़ोर दिया। धनम ऑनलाइन बताता है कि आपत्तियाँ एक पूर्व पुलिसकर्मी के क़ानून को अपने हाथ में लेने और शैलीबद्ध हिंसा पर थीं, और बातचीत विफल होने के बाद दल ने दृश्य दोबारा शूट किया ताकि गब्बर पकड़ा जाए। फ़िल्म कंपेनियन कहता है कि नया क्लाइमैक्स रिलीज़ में कुछ ही दिन बचे रहते बेंगलुरु में शूट हुआ। गल्फ़ न्यूज़ पाँच दशकों तक दर्शकों के जाने-पहचाने संस्करण को वह बताता है जिसमें पुलिस गब्बर को गिरफ़्तार करने आती है।

आपातकाल का क़ानूनी ढाँचा संवैधानिक प्रावधानों पर हमारी व्याख्या में दिया गया है।

2005 में एक विशेष फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार

द डेली स्टार के समारोह-विवरण के अनुसार 26 फ़रवरी 2005 को 50वें फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारों में रमेश सिप्पी को एक विशेष पुरस्कार मिला, जिनकी शोले को पिछले 50 सालों की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म आँका गया।

फ़िल्म को फिर से पाना

2022 में रमेश सिप्पी के बेटे शहज़ाद सिप्पी बहाली के लिए फ़िल्म हेरिटेज फ़ाउंडेशन के पास गए। उसके निदेशक शिवेंद्र सिंह डूंगरपुर द ट्रिब्यून में लिखते हैं कि मुंबई के एक गोदाम में रखे फ़िल्म-डिब्बों पर कोई लेबल नहीं था, और उन्हें खोलने पर मूल 35 मिमी कैमरा और साउंड नेगेटिव निकले। और सामग्री यूनाइटेड किंगडम में रखी थी, और ब्रिटिश फ़िल्म इंस्टीट्यूट ने फ़ाउंडेशन को उन तक पहुँच दिलाने में मदद की। लंदन और मुंबई की रीलें बोलोन्या की लिम्मागीने रित्रोवाता प्रयोगशाला गईं।

मूल कैमरा नेगेटिव इतना बिगड़ चुका था कि इस्तेमाल लायक नहीं था, और कोई 70 मिमी प्रिंट नहीं बचा। इल सिनेमा रित्रोवातो स्रोतों के रूप में एक इंटरपॉज़िटिव (नेगेटिव से बनी प्रति), दो कलर रिवर्सल इंटरमीडिएट और 1978 का एक दूसरी पीढ़ी का इंटरपॉज़िटिव गिनाता है। लंदन में मिले एक कलर रिवर्सल इंटरमीडिएट में मूल अंत और दो हटाए गए दृश्य थे, डूंगरपुर लिखते हैं। फ़ाउंडेशन ने एक Arri 2C कैमरा हासिल किया, वही मॉडल जो फ़िल्म में इस्तेमाल हुआ था। सिनेमैटोग्राफ़र कमलाकर राव को द्वारका दिवेचा के बनाए ग्राउंड-ग्लास निशान याद थे, और उन्होंने 2.2:1 फ़्रेम चुनने में रास्ता दिखाया। साउंड मूल साउंड नेगेटिव और सिप्पी फ़िल्म्स के दफ़्तर में मिले चुंबकीय तत्वों से आया। काम में करीब तीन साल लगे।

बहाल की गई फ़िल्म 204 मिनट की है और महोत्सव के अनुसार 27 जून 2025 को रात 21:45 बजे बोलोन्या के पियात्ज़ा मैजोरे में दिखाई गई। सत्यजित राय की अपू त्रयी की बहाली बचे हुए तत्वों से दोबारा बनाई गई एक और भारतीय फ़िल्म है।

गल्फ़ न्यूज़ ने 7 अक्तूबर 2025 को बताया कि BFI लंदन फ़िल्म फ़ेस्टिवल बहाल किया हुआ निर्देशक का संस्करण समापन रात, 19 अक्तूबर 2025 को, BFI IMAX में दिखाएगा। द वीक ने 16 नवंबर 2025 को बताया कि सिप्पी फ़िल्म्स शोले: द फ़ाइनल कट को 4K में बहाल रूप में 12 दिसंबर 2025 को भारत भर में 1,500 स्क्रीन पर रिलीज़ करेगी।

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स्रोत और आगे पढ़ने के लिए

  1. Il Cinema Ritrovato 2025: SHOLAY, Director's Cut (festival listing, screening of 27 June 2025)
  2. Shivendra Singh Dungarpur, The Tribune, 30 November 2025: The journey to restore Sholay digitally
  3. The Week, 16 November 2025: Sholay The Final Cut, when will the 4K restored classic release in India
  4. Dhanam Online, 26 June 2025: Fifty years on, the first Indian curry western Sholay returns with its original ending
  5. ThePrint (PTI), 23 June 2025: Restored, uncut version of Sholay to be showcased at Il Cinema Ritrovato Festival in Bologna
  6. Gulf News, 7 October 2025: Sholay at 50, London Film Festival honours a legend
  7. Salim Khan, as told to Shradha Sukumaran, Open Magazine, 2019: Sholay, the Beginning
  8. The Quint, 2015: Revisit 40 years of Sholay with the iconic Salim-Javed
  9. Kaveree Bamzai, Open Magazine, 14 August 2025: The Film that Shook India
  10. Roshmila Bhattacharya, Outlook India, 15 August 2025: Fifty Years of Sholay
  11. Film Companion: 45 things you didn't know about Sholay
  12. Gulf News, 4 September 2026: Why Sholay was called a flop in 1975, then became a classic
  13. Yash Raj Films: DDLJ celebrates continuous run of 750 weeks
  14. The Daily Star (Dhaka), 28 February 2005: report on the 50th Filmfare Awards
  15. DT Next: From Gabbar's lair to Basanti's village, Karnataka's Ramanagara celebrates 50 years of Sholay
  16. Karnataka Tourism: Ramdevara Betta, Ramanagara
  17. Karnataka Tourism: Sri Ramadevarabetta Vulture Sanctuary
  18. Waquar Habib, Outlook Traveller, 21 May 2025: Ramanagara, Asia's largest cocoon market and the Sholay filming location

यह लेख AI उपकरणों की सहायता से शोधित और लिखा गया है, और सटीकता के लिए संपादित किया गया है। यह केवल सामान्य जानकारी और चर्चा के लिए है, पेशेवर सलाह नहीं। हमारे संपादकीय मानक और अस्वीकरण देखें। कोई त्रुटि मिली? हमें बताएँ।

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