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तवांग मठ में लगभग 10,000 फ़ीट की ऊँचाई पर 925 फ़ीट की दीवार के भीतर 65 आवासीय भवन हैं, और 9 मार्च 2024 को समर्पित सेला सुरंग उसे हर मौसम में खुली रहने वाली सड़क देती है
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तवांग मठ में लगभग 10,000 फ़ीट की ऊँचाई पर 925 फ़ीट की दीवार के भीतर 65 आवासीय भवन हैं, और 9 मार्च 2024 को समर्पित सेला सुरंग उसे हर मौसम में खुली रहने वाली सड़क देती है

फ़ोटो: Vikramjit Kakati / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0 (क्रॉप किया गया)

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पर्यटन मंत्रालय की साइट इन्क्रेडिबल इंडिया तवांग मठ को भारत का सबसे बड़ा मठ कहती है। सीमा सड़क संगठन की सेला सुरंग, जो 825 करोड़ रुपये की लागत से बनी और 9 मार्च 2024 को समर्पित हुई, तेज़पुर से तवांग की सड़क को 13,700 फ़ीट ऊँचे सेला दर्रे के नीचे से ले जाती है। परमिट, मौसम और उत्सवों का समय नीचे ज़िले और राज्य की पर्यटन साइटों के आधार पर दिया गया है।

· · 8 मिनट का पठन

तवांग मठ अरुणाचल प्रदेश के सुदूर पश्चिम में लगभग 10,000 फ़ीट की ऊँचाई पर एक पहाड़ी पर खड़ा है, और पर्यटन मंत्रालय की साइट इन्क्रेडिबल इंडिया उसे भारत का सबसे बड़ा मठ कहती है। असम के तेज़पुर से वहाँ जाने वाली सड़क सेला दर्रे से गुज़रती है, और 9 मार्च 2024 को प्रधानमंत्री ने सीमा सड़क संगठन की सेला सुरंग को देश को समर्पित किया, जो प्रेस सूचना ब्यूरो के अनुसार तवांग को हर मौसम में संपर्क देती है।

5वें दलाई लामा की इच्छा पर स्थापित

अरुणाचल प्रदेश पर्यटन के अनुसार मठ की स्थापना 1680 से 1681 के बीच मेराक लामा लोद्रे ग्यात्सो ने की थी। केंद्रीय तिब्बती प्रशासन की वेबसाइट यही तारीख़ें देती है और जोड़ती है कि उन्होंने इसे 5वें दलाई लामा, न्गावांग लोबसांग ग्यात्सो, की इच्छा के अनुरूप बनवाया। इन्क्रेडिबल इंडिया इतनी सटीक नहीं है। वह 17वीं सदी कहती है, और मेराक लामा को 5वें दलाई लामा के सौंपे हुए एक मिशन पर काम करते बताती है।

एक इतिहास साइट, लाइव हिस्ट्री इंडिया, निर्माण का समय 1643 से 1647 के बीच आँकती है और कहती है कि सटीक तारीख़ मालूम नहीं है। जिन सरकारी पन्नों में कोई वर्ष दिया गया है, वे सभी 1680 से 1681 बताते हैं।

ज़िला प्रशासन के संस्कृति पन्ने के अनुसार मठ गेलुग संप्रदाय का है, जिसे पीली टोपी वाला संप्रदाय भी कहते हैं। उसका तिब्बती नाम गादेन नामग्याल ल्हात्से है, जिसका इन्क्रेडिबल इंडिया “संपूर्ण विजय का दिव्य स्वर्ग” अनुवाद करती है। ज़िले का पन्ना उसे अलग ढंग से लिखता है, “साफ़ रात का आकाशीय स्वर्ग”।

कस्बे के नाम की अपनी व्याख्या ज़िले की वेबसाइट पर है। “ता” का अर्थ घोड़ा और “वांग” का अर्थ चुना हुआ है, और ज़िले का पन्ना कथा सुनाता है कि मेराक लामा एक खोए हुए घोड़े के पीछे उस पहाड़ी तक पहुँचे जहाँ अब मठ है, और उन्होंने इसे शुभ संकेत माना।

65 आवासीय भवनों का परिसर

इन्क्रेडिबल इंडिया एक तिमंज़िला मठ का वर्णन करती है, जो 925 फ़ीट (282 मीटर) लंबी परिसर-दीवार के भीतर है और जिसमें 65 आवासीय भवन हैं। पत्थर के प्रवेश द्वार को काकालिंग कहा जाता है। पन्ने के अनुसार पुस्तकालय पूरी दूसरी मंज़िल घेरता है और उसमें बौद्ध धर्मग्रंथों के कंग्यूर और तेंग्यूर संग्रह तथा अन्य ग्रंथ रखे हैं, जिनमें से कुछ को कीड़ों ने नुक़सान पहुँचाया है। परिसर के छापाख़ाने में स्थानीय स्तर पर बने काग़ज़ और लकड़ी के ब्लॉकों का इस्तेमाल होता है। पन्ने पर खुलने का समय सुबह 7 बजे से शाम 7 बजे तक दिया गया है।

अरुणाचल प्रदेश पर्यटन के अनुसार मुख्य सभा-भवन दुखांग में लगभग 25 फ़ीट ऊँची सुनहरी बुद्ध प्रतिमा है, और पिछले द्वार के पास एक संग्रहालय है। अन्य लेखक प्रतिमा की अलग ऊँचाइयाँ बताते हैं। आउटलुक ट्रैवलर 26 फ़ीट कहता है और लाइव हिस्ट्री इंडिया 18 फ़ीट, इसलिए इस आँकड़े को अनुमानित ही मानना ठीक है।

भिक्षुओं की गिनती भी ढीली है। आउटलुक ट्रैवलर के अनुसार मठ में एक समय में 500 तक लामा रह चुके हैं, और लाइव हिस्ट्री इंडिया कहती है कि वहाँ 500 तक के ठहरने की जगह है। दोनों में से कोई जनगणना नहीं देता।

“भारत में सबसे बड़ा” होने का दर्जा इन्क्रेडिबल इंडिया के पन्ने पर टिका है। हमारे खोले किसी पन्ने में यह नहीं बताया गया कि कौन-सा पैमाना लिया गया, इमारतें, फ़र्श का क्षेत्रफ़ल या भिक्षु।

एक और ऊँचाई वाले मठ के लिए, जिसकी स्थापना का वर्ष दर्ज है, स्पीति पर हमारी गाइड में ताबो है, जिसकी स्थापना 996 में हुई।

छठे दलाई लामा की जन्मभूमि और 1959 का रास्ता

ज़िला प्रशासन उरगेलिंग मठ को, जिसे वह 15वीं सदी का बताता है, 6वें दलाई लामा त्सांगयांग ग्यात्सो की जन्मभूमि के रूप में सूचीबद्ध करता है। दलाई लामा का कार्यालय भी तवांग को उनकी जन्मभूमि दर्ज करता है।

वर्तमान दलाई लामा का जुड़ाव कार्यालय की उस रिपोर्ट में दर्ज है जो उनकी 7 और 8 अप्रैल 2017 की यात्रा के बारे में है। उसके अनुसार अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री ने श्रोताओं से कहा कि दलाई लामा ने अप्रैल 1959 की शुरुआत में केंज़ामनी पर सीमा पार की थी, कि तवांग पहली भारतीय भूमि थी जिसने उनका स्वागत किया, और कि तवांग मठ वह जगह थी जहाँ उन्होंने पहुँचने के बाद अपना पहला बौद्ध उपदेश दिया। दलाई लामा ने कहा कि उन्हें 1959 में इस क्षेत्र से गुज़रना स्नेह से याद है, और सीमा पार करने के बाद उन्होंने ख़तरे और जोखिम से मुक्त महसूस किया।

कार्यालय के अनुसार 2017 के उपदेश-स्थल यिगा छोएज़िन में अनुमानित 50,000 लोग जुटे। यात्रा के दौरान वे दुखांग के ऊपरी तल के कमरों में ठहरे।

तोरग्या, लोसर और छोएखोर फ़सल अनुष्ठान

ज़िले का पन्ना मठ और उसके आसपास रहने वाले मोनपा लोगों से जुड़े तीन उत्सवों के नाम लेता है। लोसर तिब्बती नववर्ष है। तोरग्या एक मठीय उत्सव है जिसमें लामा नकाबपोश छम नृत्य करते हैं, बुरी आत्माओं को दूर रखने और शांति को न्योता देने के लिए। छोएखोर फ़सल कटने के बाद का अनुष्ठान है, जिसमें गाँववाले पवित्र ग्रंथ लेकर अपने खेतों के बीच से चलते हैं।

नॉर्थ ईस्ट नाउ ने 23 जनवरी 2023 को रिपोर्ट किया कि उस साल तोरग्या 20 से 22 जनवरी तक चला और यह 11वें चंद्र मास के 28वें दिन शुरू होता है। चूँकि यह चंद्र कैलेंडर के अनुसार चलता है, इसलिए ग्रेगोरियन तारीख़ें हर साल बदलती हैं, और ज़िले का पन्ना कोई तारीख़ नहीं देता। अरुणाचल प्रदेश पर्यटन जोड़ता है कि दुंग्युर उत्सव हर तीसरे वर्ष तोरग्या के दौरान, मठ में ही मनाया जाता है।

सेला और सुरंग

सेला दर्रा तवांग का प्रवेश द्वार है। इन्क्रेडिबल इंडिया उसे 13,700 फ़ीट से ऊपर बताती है, और दलाई लामा का कार्यालय 4,170 मीटर देता है। प्रेस सूचना ब्यूरो की 2019 की आधारशिला विज्ञप्ति ने बर्फ़ से ढकी चोटी को ख़तरनाक कहा और बताया कि सुरंग यात्रियों को उससे बचने देगी।

सेला सुरंग परियोजना में दो सुरंगें हैं। रक्षा मंत्रालय की 22 जनवरी 2022 की विज्ञप्ति सुरंग 1 को 980 मीटर लंबी, एकल नली वाली, और सुरंग 2 को 1,555 मीटर लंबी, दोहरी नली वाली बताती है, जिसकी एक दो-लेन नली यातायात के लिए और एक निकासी नली आपात स्थिति के लिए है। सुरंग 1 तक 7 किमी की पहुँच सड़क जाती है, और 1.3 किमी की संपर्क सड़क दोनों को जोड़ती है। विज्ञप्ति के अनुसार सुरंग 2 में 14 अक्टूबर 2021 को आर-पार रास्ता बना और सुरंग 1 में खुदाई का आख़िरी धमाका 22 जनवरी 2022 को हुआ, ख़राब मौसम और भारी बर्फ़बारी में।

आधारशिला 9 फ़रवरी 2019 को रखी गई और निर्माण 1 अप्रैल 2019 को शुरू हुआ। प्रेस सूचना ब्यूरो की 9 मार्च 2024 की विज्ञप्ति के अनुसार सुरंग पाँच साल में, कुल 825 करोड़ रुपये की लागत से, 13,000 फ़ीट पर बालीपाड़ा-चारदुआर-तवांग सड़क पर, न्यू ऑस्ट्रियन टनलिंग मेथड से पूरी हुई। उसी विज्ञप्ति के अनुसार यह तवांग को हर मौसम में संपर्क देती है और सशस्त्र बलों तथा सीमावर्ती क्षेत्र के विकास में मदद करती है। सीमा सड़क संगठन की एक और सुरंग से तुलना के लिए अटल सुरंग का हमारा विवरण देखें।

2019 की विज्ञप्ति में योजना अलग थी: 687 करोड़ रुपये, लगभग तीन साल में पूरा होना, और 1,790 तथा 475 मीटर की दो सुरंगें, जिनसे तेज़पुर से तवांग में एक घंटे से ज़्यादा की बचत होती। 2022 और 2024 की विज्ञप्तियाँ बाद के आँकड़े देती हैं। राज्य का अपना परिचय अरुणाचल प्रदेश पर हमारी गाइड में है।

कैसे पहुँचें

ज़िला प्रशासन का पन्ना गुवाहाटी हवाई अड्डे को तवांग से लगभग 480 किमी, इटानगर के दोन्यी पोलो हवाई अड्डे को लगभग 440 किमी और तेज़पुर हवाई अड्डे को लगभग 330 किमी दूर बताता है, और क्षेत्रीय उड़ानें सिर्फ़ तेज़पुर तक हैं। गुवाहाटी या तेज़पुर से सड़क का रास्ता भालुकपोंग, बोमडिला, दिरांग, सेला दर्रे और जंग से होकर जाता है, और पन्ना 14 से 16 घंटे की ड्राइविंग बताता है। वह सेला पार करने से पहले ऊँचाई के अभ्यस्त होने के लिए बोमडिला या दिरांग में रात रुकने का सुझाव देता है। हेलीकॉप्टर सेवाएँ गुवाहाटी से लगभग 55 से 60 मिनट में और इटानगर के पास नाहरलगुन से तय दिनों में चलती हैं, और केवल साफ़ मौसम में।

परमिट और मौसम, 28 अक्टूबर 2026 को जाँचे गए

अरुणाचल प्रदेश पर्यटन के अनुसार भारतीय नागरिक इलेक्ट्रॉनिक इनर लाइन परमिट के लिए आवेदन करते हैं, और पर्यटक परमिट 14 दिन तक ठहरने के लिए मान्य है, जबकि इससे लंबे ठहराव के लिए अस्थायी परमिट चाहिए। 14 साल से कम उम्र के बच्चों को अलग परमिट नहीं चाहिए, पर उन्हें किसी वयस्क के साथ यात्रा करनी होती है। विदेशी नागरिक संरक्षित क्षेत्र परमिट या प्रतिबंधित क्षेत्र परमिट के लिए आवेदन करते हैं। राज्य का eILP पोर्टल 17 नवंबर 2022 को पूरे राज्य में चालू हुआ और टूरिस्ट-eILP सहायता दल का समय कार्यदिवसों पर सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक बताता है। पर्यटन परिपथ वाले पन्ने के दो हिस्से परमिट के कर्तव्यों को थोड़ा अलग ढंग से बताते हैं, इसलिए बुकिंग से पहले पोर्टल पर मौजूदा नियम की पुष्टि कर लें।

ज़िले की वेबसाइट मार्च से जून को सुहावना बताती है, जब दिन का तापमान 5 से 21 डिग्री सेल्सियस रहता है। जुलाई से सितंबर में बार-बार बारिश और कभी-कभार भूस्खलन होता है, और तापमान 5 से 15 डिग्री रहता है। अक्टूबर से फ़रवरी में कड़ाके की ठंड और भारी बर्फ़बारी होती है, और पन्ना कहता है कि बर्फ़ जमा होने पर सेला दर्रा अस्थायी रूप से बंद हो सकता है। अरुणाचल प्रदेश पर्यटन सर्दियों में सेला पर निजी वाहनों के लिए स्नो चेन या नायलॉन की रस्सियाँ रखने की सलाह देता है।

ज़िले की वेबसाइट कहती है कि प्रतिकूल मौसम से होने वाली देरी के लिए प्रशासन ज़िम्मेदार नहीं है, और आगंतुकों से कहती है कि निकलने से पहले मौसम का ताज़ा हाल और परमिट की स्थिति जाँच लें।

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स्रोत और आगे पढ़ने के लिए

  1. Incredible India (Ministry of Tourism): Tawang Monastery
  2. Incredible India (Ministry of Tourism): Tawang, destination page
  3. Incredible India (Ministry of Tourism): Sela Pass
  4. Tawang District Administration: home page and district profile
  5. Tawang District Administration: culture and heritage
  6. Tawang District Administration: how to reach
  7. Tawang District Administration: weather and accommodation
  8. Arunachal Pradesh Tourism: Tawang
  9. Arunachal Pradesh Tourism: Tezpur, Bhalukpong, Bomdila, Tawang circuit
  10. Government of Arunachal Pradesh: Tourist eILP portal
  11. Press Information Bureau, Ministry of Defence: PM virtually dedicates to the nation Sela Tunnel (9 March 2024)
  12. Press Information Bureau, Ministry of Defence: BRO conducts final blast concluding all excavation on Sela Tunnel Project (22 January 2022)
  13. Press Information Bureau, Ministry of Defence: PM lays foundation stone for Sela Tunnel (9 February 2019)
  14. Office of His Holiness the Dalai Lama: His Holiness gives Buddhist teachings to 50,000 in Tawang (8 April 2017)
  15. Office of His Holiness the Dalai Lama: His Holiness drives from Dirang to Tawang (7 April 2017)
  16. Central Tibetan Administration: His Holiness the Dalai Lama arrives in Tawang
  17. Outlook Traveller: Tawang, head in the clouds (updated 1 April 2017)
  18. Live History India: Tawang Monastery and the tale of the hats
  19. North East Now: Monpa tribe celebrates monastic festival in Tawang (23 January 2023)

यह लेख AI उपकरणों की सहायता से शोधित और लिखा गया है, और सटीकता के लिए संपादित किया गया है। यह केवल सामान्य जानकारी और चर्चा के लिए है, पेशेवर सलाह नहीं। हमारे संपादकीय मानक और अस्वीकरण देखें। कोई त्रुटि मिली? हमें बताएँ।

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