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भारतीय टैंकों और पैदल सेना ने 16 और 17 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी बख़्तरबंद हमलों के बावजूद बसंतर पुलहेड थामे रखा, और इस लड़ाई से दो परमवीर चक्र निकले
युद्ध और शौर्य

भारतीय टैंकों और पैदल सेना ने 16 और 17 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी बख़्तरबंद हमलों के बावजूद बसंतर पुलहेड थामे रखा, और इस लड़ाई से दो परमवीर चक्र निकले

चित्रण: tuput

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15 दिसंबर 1971 की शाम भारतीय पैदल सेना ने शकरगढ़ सेक्टर में बारूदी सुरंगों वाली बसंतर नदी पार की, और 17 पूना हॉर्स अपने टैंक उस रास्ते से ले गई जिसे इंजीनियर अभी पूरी तरह साफ़ नहीं कर पाए थे। पाकिस्तानी बख़्तरबंद दस्तों ने दो दिन जवाबी हमले किए और पुलहेड नहीं हटा पाए। रक्षा मंत्रालय का युद्ध का आधिकारिक इतिहास इस लड़ाई से दो परमवीर चक्र दर्ज करता है, सेकंड लेफ़्टिनेंट अरुण खेतरपाल और मेजर होशियार सिंह को।

· · 9 मिनट का पठन

बसंतर की लड़ाई 15 दिसंबर 1971 की शाम से 17 दिसंबर की शाम के युद्धविराम तक शकरगढ़ उभार में लड़ी गई, पाकिस्तानी पंजाब के उस हिस्से में जो चिनाब और रावी नदियों के बीच पठानकोट की ओर निकला हुआ है। रक्षा मंत्रालय का 1971 के युद्ध का आधिकारिक इतिहास उसे उस सेक्टर की लड़ाइयों में “सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक” कहता है। वह कहता है कि लड़ाई की पहचान पाकिस्तान के लगातार जवाबी हमले थे, जो 54 इन्फ़ैंट्री डिवीज़न के बसंतर नदी पर बनाए पुलहेड को नष्ट करने के लिए थे। इससे दो परमवीर चक्र निकले, जो भारत का सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता पुरस्कार है।

1,460 मीटर बारूदी सुरंगों वाली नदी की तलहटी

आधिकारिक इतिहास के अनुसार पाकिस्तान ने डेघ और बसंतर नदियों और उनसे और पूर्व की बेईन नदी के बीच मोर्चाबंदी तैयार की थी और तीन व्यापक बारूदी सुरंग क्षेत्र बिछाए थे। भारत की 1 कोर ने 5 दिसंबर को 1830 बजे उभार में अपना बढ़ाव शुरू किया। 54 इन्फ़ैंट्री डिवीज़न को, 16 इंडिपेंडेंट आर्मर्ड ब्रिगेड की मदद के साथ, जो काम दिया गया वह पाकिस्तान की 8 इंडिपेंडेंट आर्मर्ड ब्रिगेड को नष्ट करना और ज़फ़रवाल शहर पर क़ब्ज़ा करना था। इसके लिए उसे बसंतर पार करनी थी, जहाँ आधिकारिक इतिहास के शब्दों में बारूदी सुरंगों की पट्टियाँ लगभग 1,460 मीटर गहरी थीं।

लेफ़्टिनेंट जनरल अजय सिंह ने, जो तब मेजर और 17 पूना हॉर्स के उप-कमांडर थे, 2013 में यूनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूशन ऑफ़ इंडिया की पत्रिका में योजना का वर्णन किया। एक इन्फ़ैंट्री डिवीज़न पुलहेड बनाएगी, जो दूर के किनारे पर एक मज़बूत पाँव-जमाव है। इंजीनियर बारूदी सुरंगों के बीच से एक रास्ता साफ़ करेंगे। फिर पूना हॉर्स अंदर घुसेगी और पुलहेड चौड़ा करेगी। आधिकारिक इतिहास के अनुसार इंजीनियरों ने कुशलता और सूझबूझ से पट्टियाँ तोड़ीं और धूल भरी ज़मीन पर हाथी घास और चरी, एक स्थानीय चारा फ़सल, से रास्ते बिछाए।

पैदल सेना आगे बढ़ती है

आधिकारिक इतिहास 15 दिसंबर की रात का क्रम देता है। 16 मद्रास ने उस शाम लालियाल और सरजचक गाँवों पर हमला किया और आमने-सामने की लड़ाई में उन्हें ले लिया। 2230 बजे 3 ग्रेनेडियर्स ने जरपाल और लोहल पर हमला किया और ज़्यादातर पाकिस्तानी बंकर नज़दीक से साफ़ करके 16 दिसंबर की भोर तक दोनों ले लिए।

फिर पाकिस्तान की 8 इंडिपेंडेंट आर्मर्ड ब्रिगेड और 124 इन्फ़ैंट्री ब्रिगेड ने बख़्तरबंद और पैदल सेना के साथ जवाबी हमला किया। आधिकारिक इतिहास के अनुसार 16 मद्रास ने तीन रातें और दो दिन एक लगातार कार्रवाई लड़ी और ज़मीन थामे रखी। इसके लेखक 16 मद्रास, 3 ग्रेनेडियर्स, 17 हॉर्स और 4 हॉर्स को, औरों के साथ, उन इकाइयों में गिनाते हैं जिनकी लड़ाई ने पाकिस्तानी टुकड़ियों को आदमियों और टैंकों में भारी नुक़सान पहुँचाया।

अधूरे रास्ते को पार करने का आदेश

पूना हॉर्स, जिसकी कमान लेफ़्टिनेंट कर्नल हनूत सिंह के पास थी, नदी के पीछे इंतज़ार कर रही थी। अजय सिंह लिखते हैं कि पैदल सेना ने लगभग आधी रात तक पुलहेड ले लिया और उन्होंने रेजिमेंट को बारूदी सुरंग वाले रास्ते के प्रवेश-बिंदु तक आगे बढ़ाया। वहाँ एक इंजीनियर अफ़सर ने उन्हें बताया कि दुश्मन ने जवाबी हमला किया है, पैदल सेना पीछे हट रही है और सफ़ाई का काम छोड़ दिया गया है।

उन्होंने यह कमांडिंग अफ़सर को बताया, जो डिवीज़न मुख्यालय में थे, और उन्हें एक जवाब मिला जिसे अजय सिंह ऐतिहासिक रूप से मशहूर कहते हैं। रेजिमेंट को बसंतर पार करके पैदल सेना को जमने में मदद करनी थी, “वरना इतिहास और आने वाली पीढ़ियाँ पूना हॉर्स को माफ़ नहीं करेंगी”। अजय सिंह कहते हैं कि वे बिना साफ़ की गई बारूदी सुरंगों में घुसे और रेजिमेंट उनके टैंक के निशानों पर चलती आई, और सारी पार हो गई। एक सेवानिवृत्त घुड़सवार अफ़सर, लेफ़्टिनेंट कर्नल दिलबाग सिंह डबास, 2021 में Tribune में इसे अलग तरह से बताते हैं, कमांडिंग अफ़सर के अपने टैंक को आगे रखते हुए। दोनों कहते हैं कि रेजिमेंट पार हो गई।

अजय सिंह लिखते हैं कि पौ फटते ही पैटन टैंकों का एक झुंड हमले की क़तार में ग़ाज़ीपुर के आरक्षित वन में उनकी स्क्वाड्रन की ओर आया। उनके गनरों ने पैटन के मार की सीमा में आते ही गोले दागे, पहली लहर के सात को मार गिराया, और हमला आधे घंटे में ठंडा पड़ गया।

16 दिसंबर की सुबह जरपाल

आधिकारिक इतिहास के अनुसार पाकिस्तान ने 16 दिसंबर को जरपाल पर बख़्तरबंद और पैदल सेना के साथ पाँच बार जवाबी हमला किया। पूना हॉर्स, तोपख़ाने और मोर्टारों की मदद से ग्रेनेडियर्स ने हर हमला खदेड़ा। गाँव के पश्चिमी पार्श्व पर पूना हॉर्स की बी स्क्वाड्रन मेजर अमरजीत सिंह बल के अधीन थी, Tribune की गिनती में आठ टैंकों के साथ। Tribune की छापी लड़ाई की रिपोर्ट कहती है कि उनकी स्क्वाड्रन ने एक भी पैटन को जरपाल तक पहुँचने नहीं दिया। पूर्वी पार्श्व पर सेकंड लेफ़्टिनेंट अरुण खेतरपाल के अधीन एक टुकड़ी थी।

आधिकारिक इतिहास आगे कहता है कि 17 दिसंबर को 0430 बजे पाकिस्तानी सैनिकों ने ग्रेनेडियर्स पर लहर-दर-लहर हमला किया, और उन हमलों में आख़िरी जरपाल पर आया। मेजर होशियार सिंह वहाँ ग्रेनेडियर्स की सी कंपनी की कमान सँभाल रहे थे। आधिकारिक इतिहास की परमवीर चक्र विजेताओं की सूची कहती है कि उन्होंने एक ज़ोरदार हमला खदेड़ा और बुरी तरह घायल होने पर भी युद्धविराम तक निकाले जाने से इनकार कर दिया। 17 दिसंबर की शाम पाकिस्तानी हमला 87 आदमियों के नुक़सान के बाद ख़त्म हुआ, जिनमें एक कमांडिंग अफ़सर भी था।

अरुण खेतरपाल और प्रशस्ति-पत्र

The Quint के अनुसार खेतरपाल का जन्म 14 अक्टूबर 1950 को पुणे में हुआ और उन्हें 13 जून 1971 को 17 पूना हॉर्स में कमीशन मिला। मृत्यु के समय वे 21 साल के थे। सेना की वेबसाइट पर प्रशस्ति-पत्र, जैसा Aviation and Defence Universe ने उसे छापा, कहता है कि उन्होंने रेडियो पर स्क्वाड्रन कमांडर की मदद की पुकार सुनी और ए स्क्वाड्रन से आगे गए। उनकी टुकड़ी का सामना पुलहेड में अब भी डटे रिकॉइललेस गन के ठिकानों से हुआ, और प्रशस्ति-पत्र कहता है कि उन्होंने उन्हें रौंद दिया और चालकों को पिस्तौल की नोक पर पकड़ लिया।

प्रशस्ति-पत्र फिर तीन चरण बताता है। उन्होंने पीछे हटते एक पाकिस्तानी टैंक का पीछा करके उसे नष्ट किया। जब एक बख़्तरबंद स्क्वाड्रन ने तीन भारतीय टैंकों के सँभाले क्षेत्र पर हमला किया, जिनमें एक उनका था, तो The Quint का छापा संस्करण कहता है कि दस पाकिस्तानी टैंक नष्ट हुए और चार का हिसाब उन्होंने खुद दिया। उनके अपने टैंक पर मार पड़ी और उसमें आग लग गई, और वे बुरी तरह घायल थे। उन्हें उसे छोड़ने को कहा गया। प्रशस्ति-पत्र कहता है कि उन्होंने समझ लिया कि अगर वे छोड़ेंगे तो हमलावर घुस आएँगे, वे डटे रहे, और दूसरी मार से मरने से पहले एक और टैंक नष्ट किया। वह इन शब्दों पर ख़त्म होता है: “एक भी दुश्मन टैंक आगे नहीं निकल पाया।”

प्रशस्ति-पत्र की प्रतियाँ टैंकों के आँकड़ों में अलग हैं, और आधिकारिक इतिहास भी एकसार नहीं है। उसकी पुरस्कार सूची खेतरपाल को छह पाकिस्तानी टैंकों का श्रेय देती है, जो एक, फिर चार, फिर एक से मेल खाता है। लड़ाई का उसका वृत्तांत पाँच कहता है। Honourpoint की प्रोफ़ाइल कहती है कि उनके दल के दो सदस्य, सवार प्रयाग सिंह और सवार नाथू सिंह, घायल होकर पकड़े गए, उनकी चोटों का इलाज हुआ और वे बाद में भारत लौटे। उनका टैंक, फ़ामागुस्ता, युद्ध के बाद बहाल किया गया और अहमदनगर के आर्मर्ड कॉर्प्स सेंटर और स्कूल में खड़ा है, The Quint के अनुसार।

The Quint एक कहानी भी बताता है जिसे वह India Today की बताता है। 2001 में खेतरपाल के पिता, ब्रिगेडियर एम.एल. खेतरपाल, पाकिस्तान में अपने जन्मस्थान सरगोधा गए और लाहौर में एक पाकिस्तानी ब्रिगेडियर ने उनकी मेज़बानी की। आख़िरी दिन मेज़बान ने उन्हें बताया कि वह वही आदमी है जिसने अरुण पर आख़िरी गोला दागा था। “हम एक-दूसरे से अनजान सैनिक थे, अपने-अपने देश की सुरक्षा और सम्मान के लिए लड़ रहे थे,” The Quint के अनुसार उन्होंने कहा।

टैंकों की गिनती

आधिकारिक इतिहास बसंतर का कोई एक कुल नहीं देता। अजय सिंह का वृत्तांत कहता है कि रेजिमेंट ने एक पाकिस्तानी इंडिपेंडेंट आर्मर्ड ब्रिगेड का जवाबी हमला तोड़ा और युद्धविराम आने पर मैदान 57 पैटन टैंकों के मलबे से अटा था। यह रेजिमेंट की अपनी संख्या है, एक भागीदार से।

आधिकारिक इतिहास एक पाकिस्तानी अफ़सर को भी उद्धृत करता है। ब्रिगेडियर जहाँगीर करामत, सितंबर 1983 के Pakistan Army Journal में लिखते हुए, कहते हैं कि बख़्तरबंद ब्रिगेड ने “लगभग पचास टैंक गँवाए” और बसंतर नाले पर मोर्चाबंदी बहाल नहीं कर पाई। वे जोड़ते हैं कि दूसरे पक्ष का नुक़सान ब्रिगेड के नुक़सान के एक तिहाई से कम था। दोनों आँकड़े एक ही कोटि के हैं। दोनों एक-एक लेखक के आँकड़े हैं, और आधिकारिक इतिहास उनमें मेल नहीं बिठाता।

उसी सेक्टर में पहले, 4 हॉर्स के लेफ़्टिनेंट कर्नल राज मोहन वोहरा का प्रशस्ति-पत्र, जैसा Tribune छापता है, ठाकुरद्वारा, चक्र और देहलरा से उनकी रेजिमेंट के बढ़ाव को 27 दुश्मन टैंकों के नष्ट होने का श्रेय देता है, जो युद्ध की सबसे ऊँची गिनती है, और अपनी रेजिमेंट का नुक़सान न्यूनतम।

सम्मान

लेफ़्टिनेंट कर्नल हनूत सिंह और मेजर बल को महावीर चक्र मिला, जो दूसरा सबसे बड़ा युद्धकालीन पुरस्कार है। रक्षा मंत्रालय का वीरता पुरस्कार पोर्टल हनूत सिंह के पुरस्कार को 17 हॉर्स के लिए 1972 की गणतंत्र दिवस सूची में दिया गया बताता है। Tribune के छापे प्रशस्ति-पत्र का पाठ कहता है कि 16 और 17 दिसंबर को पाकिस्तानी बख़्तरबंद हमलों के दौरान वे “अपनी निजी सुरक्षा की पूरी अनदेखी करके” एक ख़तरे वाले सेक्टर से दूसरे में गए। डबास रेजिमेंट के लिए एक परमवीर चक्र, दो महावीर चक्र और चार वीर चक्र गिनते हैं। Honourpoint का दिया पूना हॉर्स का रोल दिखाता है कि उसके बारह सैनिक 14 से 17 दिसंबर के बीच मारे गए।

आगे क्या हुआ

आधिकारिक इतिहास का अपना आकलन है कि भारतीय सैनिकों ने 8 इंडिपेंडेंट आर्मर्ड ब्रिगेड और 24 और 124 इन्फ़ैंट्री ब्रिगेडों का एक बड़ा हिस्सा नष्ट किया, सुपवाल नाले पर मोर्चाबंदी को दरकिनार किया और ज़फ़रवाल को ख़तरे में डाला। वह जोड़ता है कि युद्धविराम से पहले ज़फ़रवाल और शकरगढ़ शहर नहीं लिए गए, कि पाकिस्तान की ज़फ़रवाल, धामथल और नरोवाल की क़िलेबंदी की कड़ी काफ़ी हद तक सलामत रही, और कि 6 आर्मर्ड डिवीज़न अब भी अपराजित थी।

पश्चिम में हवाई अभियान 17 दिसंबर को 2000 बजे ख़त्म हुए, पाकिस्तान के युद्धविराम का प्रस्ताव मान लेने के बाद, आधिकारिक इतिहास दर्ज करता है। खेतरपाल 16 दिसंबर को शहीद हुए, उसी दिन जब ढाका में भारतीय समय से 1631 बजे औपचारिक आत्मसमर्पण हुआ, जो इतिहास भी देता है; वह कहानी बांग्लादेश बनाने वाले युद्ध वाले लेख में है। 1971 का एक और परमवीर चक्र, जो एक वायुसैनिक ने जीता, श्रीनगर हवाई अड्डे वाले लेख में है, और उसी हफ़्ते की राजस्थान की लड़ाई, जो फ़िल्म बॉर्डर में है, लोंगेवाला वाले लेख में है। पूना हॉर्स 1965 के युद्ध में फिल्लौरा में लड़ी थी, जहाँ उसके कमांडिंग अफ़सर लेफ़्टिनेंट कर्नल ए.बी. तारापोर ने अपना परमवीर चक्र जीता।

2 जुलाई 1972 के शिमला समझौते के तहत, जिसका पाठ आधिकारिक इतिहास छापता है, दोनों देश अपनी सेनाएँ अंतरराष्ट्रीय सीमा के अपनी ओर वापस ले जाने पर सहमत हुए। 16 दिसंबर 2025 को राष्ट्रपति ने राष्ट्रपति भवन में परमवीर दीर्घा का उद्घाटन किया, एक गलियारा जिसमें सभी 21 परमवीर चक्र विजेताओं के चित्र टँगे हैं। प्रेस सूचना ब्यूरो का 21 दिसंबर का नोट जरपाल पर खेतरपाल के डटे रहने को उन कहानियों में गिनाता है जो वह सुनाता है।

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स्रोत और आगे पढ़ने के लिए

  1. Ministry of Defence, History Division: Official History of the 1971 India-Pakistan War, chapter on the Shakargarh sector, award lists and appendices (Internet Archive)
  2. Ministry of Defence, Gallantry Awards portal: Second Lieutenant Arun Khetarpal, Param Vir Chakra, 17 Horse (Wayback Machine copy, 16 December 2020)
  3. Ministry of Defence, Gallantry Awards portal: Lieutenant Colonel Hanut Singh, Maha Vir Chakra, 17 Horse (Wayback Machine copy, 16 December 2020)
  4. Press Information Bureau: A Gallery of Eternal Courage, Inauguration of Param Vir Dirgha at Rashtrapati Bhavan, 21 December 2025
  5. Lt Gen Ajai Singh (retd), Battle of Phillaurah 1965 and the Battle of Basantar 1971, Journal of the United Service Institution of India, April to June 2013
  6. Akashvani News (All India Radio): Second Lieutenant Arun Khetarpal in a special series, 22 May 2025
  7. Aviation and Defence Universe: Indian Army remembers 2nd Lt Arun Khetarpal, with the Param Vir Chakra citation as published on the Army website, 14 October 2020
  8. The Quint: Who Was 2nd Lt Arun Khetarpal, Hero of the 1971 India-Pak War? 19 October 2019
  9. Lt Col Dilbag Singh Dabas (retd), Remembering the iconic battles of Basantar and Chakra-Dehlra, The Tribune, 30 May 2021
  10. Honourpoint: Profile of 2nd Lt Arun Khetarpal PVC, IC-25067, with the regimental account of the Poona Horse

यह लेख AI उपकरणों की सहायता से शोधित और लिखा गया है, और सटीकता के लिए संपादित किया गया है। यह केवल सामान्य जानकारी और चर्चा के लिए है, पेशेवर सलाह नहीं। हमारे संपादकीय मानक और अस्वीकरण देखें। कोई त्रुटि मिली? हमें बताएँ।

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