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कूचा के पास खोदी गई बॉवर पांडुलिपि भोजपत्र पर गुप्त लिपि में संस्कृत चिकित्सा-नुस्खे सँजोए है, जिनमें नवनीतक नाम का एक योग-संग्रह भी है
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कूचा के पास खोदी गई बॉवर पांडुलिपि भोजपत्र पर गुप्त लिपि में संस्कृत चिकित्सा-नुस्खे सँजोए है, जिनमें नवनीतक नाम का एक योग-संग्रह भी है

फ़ोटो: Ms Sarah Welch / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0 (क्रॉप किया गया)

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गुप्त काल की लिपि में लिखे संस्कृत ग्रंथों का एक पुलिंदा रेशम मार्ग के एक बौद्ध स्तूप में बचा रहा। उसके सात भागों में से तीन चिकित्सा के हैं, और सबसे लंबा नवनीतक है, सोलह अध्यायों की योजना वाला एक योग-संग्रह जिसका पहला नुस्खा चरक संहिता में भी मिलता है।

· · 9 मिनट का पठन

बॉवर पांडुलिपि भोजपत्र पर संस्कृत ग्रंथों का एक पुलिंदा है, जो उत्तर भारत की गुप्त काल की लिपि में लिखा है और कूचा के पास एक खंडहर बौद्ध स्तूप में मिला, जो उत्तरी रेशम मार्ग का एक मरुस्थलीय कस्बा है, आज के चीन के शिनजियांग में। उसके सात भागों में से तीन चिकित्सा के हैं। सबसे लंबा नवनीतक है, नुस्खों का एक योग-संग्रह जिसे उसके लेखक ने सोलह अध्यायों में बाँटने की योजना बनाई थी और जो बुद्धों को प्रणाम से शुरू होता है। ऑक्सफ़ोर्ड का बोडलियन पुस्तकालय इन पत्रों को MS. Sansk. c. 17 के रूप में रखता है।

कलकत्ता मदरसा के प्राचार्य ए. एफ़. रूडोल्फ़ हॉर्नले ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के लिए एक शृंखला में पत्रों का संपादन किया जो 1893 से 1912 तक चली। अप्रैल 1891 में पांडुलिपि के साथ लगभग एक सप्ताह बिताने के बाद उन्होंने लिखा कि वह तब तक ज्ञात सबसे पुरानी भारतीय लिखित पुस्तक थी। यह 1891 का दावा था, मध्य एशिया की बाद की खोजों से पहले का, और यहाँ इस्तेमाल हुए स्रोत पत्रों की तिथि चौथी से छठी सदी ईसवी के बीच कहीं रखते हैं।

एक ख़ज़ाना खोजने वाला, एक लेफ़्टिनेंट और एक स्तूप

पांडुलिपि का नाम लेफ़्टिनेंट हैमिल्टन बॉवर पर पड़ा, जो भारत सरकार के एक गोपनीय मिशन पर कूचा में थे (उनके समय में लिखा जाता था कूचार), डैल्ग्लीश नाम के एक व्यक्ति के हत्यारे की तलाश में। बॉवर ने हॉर्नले को 17 अगस्त 1892 को जो पत्र लिखा, वह कहानी बताता है। कूचार के एक आदमी ने बॉवर को एक भूमिगत नगर के बारे में बताया और कहा कि वह वहाँ ख़ज़ाने के लिए खोदने गया था पर उसे केवल वह मिला जिसे उसने किताब कहा। बॉवर ने उसे देखने को कहा, और वह आदमी पांडुलिपि लेकर लौटा। बॉवर ने उसे थोड़ी रक़म में ख़ुशी से ख़रीद लिया।

बॉवर ने उसे सितंबर 1890 में बंगाल एशियाटिक सोसाइटी के अध्यक्ष कर्नल जे. वॉटरहाउस को भेजा, और वह 5 नवंबर 1890 को सोसाइटी को दिखाई गई। बैठक के बाद उसे पढ़ने की कोशिशें विफल रहीं। यूरोप में छुट्टी पर गए हॉर्नले ने लौटते समय अदन में बॉम्बे गज़ट की एक रिपोर्ट देखी। उन्होंने 1891 के आरंभ में कलकत्ता में वॉटरहाउस से पांडुलिपि ली और सोसाइटी की कार्यवाही के अप्रैल 1891 के अंक में पहला पाठ-निर्वचन छापा।

1889 में मिली या 1890 में

स्रोत खोज का वर्ष एक तरह से नहीं देते। हॉर्नले पर इंसाइक्लोपीडिया इरानिका की प्रविष्टि, उर्सुला सिम्स-विलियम्स की, कहती है कि पांडुलिपि कूचा के पास 1889 में खोजी गई। स्क्रॉल्स एंड लीव्ज़ पॉडकास्ट (दिसंबर 2021) का वायर साइंस का लेख भी बॉवर को 1889 में हत्यारे का पीछा करते बताता है, हालाँकि वह नहीं कहता कि किताब कब मिली। हॉर्नले की भूमिका पांडुलिपि को 1890 के आरंभ में बॉवर के हाथों में रखती है।

वह तिथि 1895 के जियोग्राफ़िकल जर्नल में बॉवर के यात्रा-वृत्तांत से आती है। बॉवर 6 मार्च को शहयार से कश्गर की ओर लौटते हुए निकले, जहाँ वे 1 अप्रैल को पहुँचे। खोज-स्थल की यात्रा के हिसाब से पीछे गिनकर हॉर्नले इस नतीजे पर पहुँचे कि बॉवर को पांडुलिपि 2 या 3 मार्च 1890 को मिली, और कूचार के लोगों ने स्तूप में कुछ दिन पहले, फ़रवरी 1890 में, खुदाई की थी। उनकी भूमिका जोड़ती है कि पॉल पेलियो का फ़्रांसीसी अभियान, जिसने कूचार ज़िले की खोज की थी, से अपेक्षा की जा सकती है कि वह सटीक स्थान और समय पर बची किसी भी शंका को सुलझा दे।

स्थान पर भी मत बँटे थे। गेओर्ग ब्यूलर ने खोज की पहली घोषणा कूचार के पास मिंग-ओई के भूमिगत नगर के खंडहरों से आई बताकर की, और हॉर्नले ध्यान दिलाते हैं कि बॉवर ने केवल इतना कहा था कि वह शहर के ठीक बाहर के एक स्तूप से आई। दूसरी ओर कूचार की एक स्थानीय परंपरा बॉवर पत्रों को कस्बे के और पास के बड़े कुतलुक उर्दा स्तूप से जोड़ती थी, जहाँ से दूसरे संग्राहकों की पांडुलिपियाँ आई थीं। दोनों को ख़ारिज करते हुए हॉर्नले इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि वह क़ुम तुरा की गुफ़ाओं के ऊपर की पहाड़ी पर बना एक स्तूप था।

एक पुलिंदे में सात ग्रंथ

हॉर्नले ने पाया कि पुलिंदे में चार लिपिकों के हाथ के सात भाग हैं। बचे पत्रों की गिनती अलग-अलग है: सात भागों के लिए वे जो पत्र-संख्या देते हैं (पाँच, तीस, चार, पाँच, छह, चार और दो) जोड़ने पर 56 होती है, जबकि एक ऑनलाइन सार 51 देता है। भाग I से III चिकित्सा के हैं। भाग IV और V शकुन-विचार की पुस्तिकाएँ हैं, और उनकी भूमिका की चर्चा पासे फेंककर चलाए जाने वाले शकुनों पर केंद्रित है। भाग VI और VII साँप के काटने के विरुद्ध एक ही मंत्र, महामायूरी, की दो प्रतियाँ हैं, जिसे वे बौद्धों में बहुत प्रतिष्ठित मंत्र बताते हैं। उनके 1891 के नोट में तीन शकुन-वचनों के एक समूह का अस्थायी अनुवाद था, जिनमें से पहला “तुम्हारी बुद्धि बिगड़ गई है” से शुरू होता है और दूसरा रोगों से शीघ्र मुक्ति का वचन देता है।

हॉर्नले की व्याख्या में पूरा पुलिंदा एक बौद्ध भिक्षु का था, जिनका नाम यशोमित्र प्रतीत होता है, और कूचार के पास के एक विहार में रखा था। पत्रों को स्तूप के धातु-कक्ष में पाकर उन्होंने माना कि स्वामी का बहुत सम्मान था। उनके निर्णय में चार में से दो लिपिक भारतीय प्रवासी थे। लिखने योग्य छाल देने वाला भोजवृक्ष पूर्वी तुर्किस्तान में उगता नहीं दिखता, और पांडुलिपि का अधिकांश ख़राब, क्षतिग्रस्त छाल पर है, जिसे हॉर्नले ने उस भंडार का अवशेष माना जो प्रवासी भारत से लाए थे।

लहसुन और दस ऋषि

भाग I पाँच पत्रों का है और बीच में टूट जाता है। वह एक हिमालयी पर्वत के पद्य-वर्णन से शुरू होता है जहाँ दस ऋषि रहते हैं: आत्रेय, हारीत, पराशर, भेल, गर्ग, सांभव्य, सुश्रुत, वसिष्ठ, करल और काप्य। अनुवाद में वे सैकड़ों बार साथ घूमते हैं और औषधीय पौधों के स्वादों, गुणों, रूपों और नामों के बारे में पूछते हैं।

सुश्रुत एक सफ़ेद कंदों वाला पौधा देखते हैं और ऋषि काशिराज से पूछने जाते हैं कि वह क्या है। हॉर्नले काशिराज को सबसे संभावित रूप से दिवोदास मानते हैं, जिन्हें धन्वंतरि भी कहा जाता है। उनके उत्तर में लहसुन का नाम है। पाठ के अनुसार जब असुरों के स्वामी ने मथा हुआ अमृत पिया, तो विष्णु ने उसका सिर काट दिया, और कटी श्वास-नली से बूँदें धरती पर गिरीं और लहसुन बन गईं। इसी कारण, अंश जोड़ता है, ब्राह्मण उसे नहीं खाते। हॉर्नले का एक टिप्पणी-नोट बताता है कि अष्टांग हृदय लहसुन का एक लंबा वर्णन देता है जो इससे काफ़ी मेल खाता है, और प्रचलित रूप सुनाता है, जिसमें असुर राहु है। लहसुन वाले निबंध में अठारह या उन्नीस भिन्न छंदों में 43 श्लोक हैं, और वह पौधे के गुणों और नुस्खों पर आगे बढ़ता है।

नवनीतक

भाग II, नवनीतक, 33 क्रमांकित पत्रों पर लिखा गया था, जिनमें से 30 बचे हैं। उसकी भूमिका “तथागतों को नमस्कार” से शुरू होती है और, हॉर्नले के अनुवाद में, “महर्षियों के श्रेष्ठ योगों” की एक मानक पुस्तिका का वचन देती है, जो उन्होंने प्राचीन काल में बनाए। नवनीतक का अर्थ मक्खन है, और हॉर्नले का नोट नाम का अर्थ पुराने चिकित्सा-लेखकों से चुने गए अनुमोदित उद्धरणों का संग्रह मानता है।

उसके घोषित सोलह अध्याय चूर्णों, औषधीय घी, तेलों, अनेक रोगों के मिश्रित उपचारों, वस्तिकर्म, रसायनों, पेया, वाजीकरण, अंजनों और केश-रंजकों से गुज़रते हैं, फिर एकल द्रव्यों पर तीन अध्याय (हरीतकी फल, शिलाजीत और चित्रक की जड़), और फिर बच्चों, बाँझ स्त्रियों और माताओं पर। अध्याय पंद्रह और सोलह ग़ायब हैं, और पाठ चौदहवें में टूट जाता है। भूमिका एक नियम के साथ समाप्त होती है कि यह पुस्तक ऐसे व्यक्ति को नहीं दी जानी चाहिए जिसका कोई पुत्र, भाई या शिष्य न हो।

पहला है तालीश चूर्ण: तालीश के पत्ते (हॉर्नले की पहचान टैक्सस बकाटा, यानी यू, है, जिसे वे अनिश्चित चिह्नित करते हैं), काली मिर्च, सूखी अदरक और पिप्पली बढ़ते अनुपात में, दालचीनी, इलायची और चीनी के साथ, खाँसी, दमा और भूख न लगने के लिए। हॉर्नले का एक नोट यही सूत्र चरक संहिता और दो अन्य संस्कृत संग्रहों में पाता है, तीनों एक श्लोक जोड़ते हैं जो चूर्ण को चीनी के साथ उबालकर गोलियाँ बनाने की अनुमति देता है। रॉयल एशियाटिक सोसाइटी के लिए अपने 1909 के शोधपत्र में वे और आगे गए और तर्क दिया कि नवनीतक के योग चरक संहिता के अंशों से मेल खाते हैं और कुछ मामलों में नवनीतक पुराना पाठ सुरक्षित रखता प्रतीत होता है, एक दावा जो पाठांतरों के उनके पाठ पर टिका है। पाठ्यपुस्तक के लिए ही देखें चरक संहिता का लेख।

लिखावट कितनी पुरानी है

पत्रों की तिथि बताने वाला हर कोई अक्षरों की बनावट का सहारा लेता है, और हॉर्नले ने एक से अधिक बार अपना मत बदला। अप्रैल 1891 में उन्होंने लिखा कि पांडुलिपि पाँचवीं सदी के अंत से बाद की नहीं है। उनका तर्क अक्षर य पर था, जिसका बीच वाला रूप तिथि-युक्त अभिलेखों में केवल लगभग 470 से 530 ईसवी के बीच मिलता है, और स्थानमान वाले शून्य की अनुपस्थिति पर, जिसे उन्होंने छठी सदी के भीतर रखा। उन्होंने लगभग 500 ईसवी दिया।

उनके बाद के निबंध ने तिथि पाँचवीं सदी के मध्य रखी। 1909 तक उन्होंने रॉयल एशियाटिक सोसाइटी की पत्रिका में लिखा कि वह लगभग एक सदी पहले की है, और अपनी भूमिका में वे कहते हैं कि उसे लगभग पौन सदी पीछे ले जाने के अच्छे कारण सामने आ गए थे, पत्रों में दिखा य अक्षर का चरण चौथी सदी के उत्तरार्ध का है। गूगल आर्ट्स एंड कल्चर, नेशनल सेंटर फ़ॉर बायोलॉजिकल साइंसेज़ के दिए अभिलेख में, पांडुलिपि को चौथी से छठी सदी का दर्ज करता है। जेरेमी नॉर्मन का पृष्ठ यही सीमा देता है और जोड़ता है कि बाद का लिपि-विज्ञान संबंधी काम लगभग छठी सदी के पूर्वार्ध के पक्ष में है, बिना विद्वानों के नाम बताए। यहाँ इस्तेमाल किए गए स्रोतों में से कोई बॉवर पत्रों की रेडियोकार्बन जाँच की सूचना नहीं देता, बख़्शाली भोजपत्र पांडुलिपि के विपरीत, जिसकी 2017 की तिथि 2024 में संशोधित हुई।

उसकी लिपि उत्तरी गुप्त हस्तलेख है, उस साम्राज्य की लिखावट जिसकी चर्चा गुप्त युग वाले लेख में है। हॉर्नले ने नोट किया कि पत्र संख्याएँ स्थानमान से नहीं, दहाइयों और सैकड़ों के अलग चिह्नों से लिखते हैं। शून्य के अपने इतिहास के लिए देखें भारत ने दुनिया को शून्य दिया।

उसके बाद क्या हुआ

इरानिका कहता है कि हॉर्नले की रिपोर्ट से जगी रुचि ने महाशक्तियों को मध्य एशिया में पांडुलिपियों और पुरावशेषों की होड़ भरी खोज में उतार दिया। उनकी भूमिका इसे ठोस क़दमों से जोड़ती है: 1893 में भारत सरकार ने कश्मीर, लद्दाख और कश्गर में अपने राजनीतिक अभिकर्ताओं से प्राचीन पांडुलिपियों पर नज़र रखने को कहा, और वे ऑरेल स्टाइन के चीनी तुर्किस्तान के पहले अभियान (1900 से 1901) की जड़ बॉवर खोज की प्रेरणा में ढूँढ़ते हैं। पाठ पूरा होने तक पत्र हॉर्नले के पास रहे, जिन्होंने उन्हें अप्रैल 1898 में कर्नल बॉवर को लौटा दिया।

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स्रोत और आगे पढ़ने के लिए

  1. A. F. R. Hoernle, The Bower Manuscript, Introduction (Archaeological Survey of India, New Imperial Series vol. 22; written after 1910), Internet Archive
  2. A. F. R. Hoernle, Birch Bark MS, Proceedings of the Asiatic Society of Bengal, April 1891 (first decipherment), Internet Archive
  3. A. F. R. Hoernle, The Bower Manuscript, Part I: facsimile leaves, transliteration and translation (Archaeological Survey of India, Calcutta, 1893), Internet Archive
  4. A. F. R. Hoernle, The Bower Manuscript, Revised Translation of Parts I to III (Archaeological Survey of India), Internet Archive
  5. A. F. R. Hoernle, Studies in Ancient Indian Medicine V: The Composition of the Caraka Samhita in the Light of the Bower Manuscript, Journal of the Royal Asiatic Society, October 1909
  6. Ursula Sims-Williams, Hoernle, Augustus Frederic Rudolf, Encyclopaedia Iranica (published 15 December 2004)
  7. Mary-Rose Abraham and Gayathri Vaidyanathan, Podcast: An Ancient Ayurveda Manuscript Unearthed in China, The Wire Science (Scrolls & Leaves, 16 December 2021)
  8. National Centre for Biological Sciences (TIFR), Bower manuscript, Yosamitra, Google Arts & Culture (original source: Bodleian Library, MS.Sansk.c 17)
  9. Jeremy Norman, The Bower Manuscript, One of the Earliest Treatises on Indian Medicine, Written on Birch Bark, HistoryofInformation.com

यह लेख AI उपकरणों की सहायता से शोधित और लिखा गया है, और सटीकता के लिए संपादित किया गया है। यह केवल सामान्य जानकारी और चर्चा के लिए है, पेशेवर सलाह नहीं। हमारे संपादकीय मानक और अस्वीकरण देखें। कोई त्रुटि मिली? हमें बताएँ।

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