Skip to content
बाल गंगाधर तिलक को 1897 में 6 के मुक़ाबले 3 और 1908 में 7 के मुक़ाबले 2 की जूरी ने राजद्रोह का दोषी ठहराया, उनके छपे भाषणों में जन्मसिद्ध अधिकार का विचार 1917 तक मिलता है, और मशहूर पंक्ति का कोई एक तारीख़वार स्रोत नहीं है
भारतीय इतिहास

बाल गंगाधर तिलक को 1897 में 6 के मुक़ाबले 3 और 1908 में 7 के मुक़ाबले 2 की जूरी ने राजद्रोह का दोषी ठहराया, उनके छपे भाषणों में जन्मसिद्ध अधिकार का विचार 1917 तक मिलता है, और मशहूर पंक्ति का कोई एक तारीख़वार स्रोत नहीं है

चित्रण: tuput

हिन्दी

तिलक ने जनवरी 1881 से मराठी साप्ताहिक केसरी का संपादन किया, 14 सितंबर 1897 और फिर 22 जुलाई 1908 को राजद्रोह में दोषी ठहराए गए, और 1 अगस्त 1920 को बंबई में उनका निधन हुआ। उनके जीवनीकार जन्मसिद्ध अधिकार वाले नारे को मई 1908 का बताते हैं, और उनके अपने संकलित भाषण दिखाते हैं कि वे इस विचार को 1917 तक दोहराते रहे।

· · 12 मिनट का पठन

“स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं उसे लेकर रहूँगा” इस पूरे वाक्य का स्रोत कोई एक तारीख़वार भाषण नहीं माना जाता। धनंजय कीर की 1959 की बाल गंगाधर तिलक जीवनी कहती है कि उन्होंने “स्वतंत्रता जन्मसिद्ध अधिकार है” वाला नारा 2 मई 1908 को अकोला में दिया, और जी. एस. खापर्डे की डायरी की एक प्रविष्टि का हवाला देती है कि उसके बाद वह वाक्यांश हर जगह अपना लिया गया। गोपाल राम की 1956 की जीवनी कहती है कि दिसंबर 1907 में सूरत में कांग्रेस के टूटने के बाद, तिलक अपनी हर सभा में नारा देते थे कि “स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है; मैं उसे पाकर रहूँगा।“

जन्मसिद्ध अधिकार की पंक्ति 1908, 1916 और 1917 में मिलती है

सबसे अच्छी जाँच तिलक के अपने छपे भाषण हैं। उनके लेखन और भाषणों का 1919 का मद्रास संकलन उन्हें 1917 के नासिक सम्मेलन में यह कहते दिखाता है: “स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है।” यवतमाल में उन्होंने स्वराज्य को अपने घर पर ख़ुद शासन करने की ताक़त के रूप में समझाया और कहा, “अपने घर पर ख़ुद शासन करना तुम्हारा जन्मसिद्ध अधिकार है।” राष्ट्रीय संकल्प को मज़बूत करने पर एक भाषण में उन्होंने श्रोताओं से कहा कि “मैं अपना जन्मसिद्ध अधिकार पाने की कोशिश करूँगा” को अपनी रोज़ की प्रार्थना बना लें। बाद में मद्रास में उन्होंने कहा, “जन्मसिद्ध अधिकारों को हमेशा मान्यता नहीं मिलती और उनके लिए तुम्हें काम करना होगा।”

उस संकलन के डिजिटल पाठ की खोज में “मैं उसे लेकर रहूँगा” वाला पूरा प्रचलित रूप कहीं नहीं मिलता। कीर एक क़रीबी रूप, “होम रूल मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं उसे लेकर रहूँगा,” को 29 दिसंबर 1916 को लखनऊ कांग्रेस में तिलक के भाषण का अंत बताते हैं, और इसके लिए संस्मरणों के एक खंड का हवाला देते हैं। द बेटर इंडिया का एक लोकप्रिय वृत्तांत यह पंक्ति गढ़ने का श्रेय होम रूल लीग में तिलक के सहयोगी जोसेफ “काका” बैप्टिस्टा को देता है। वह 1930 के टाइम्स ऑफ़ इंडिया के एक शोक-लेख का हवाला देता है और कोई दस्तावेज़ नहीं बताता। इस लेख के लिए देखे गए किसी स्रोत में पहले प्रयोग का छपा हुआ प्रमाण नहीं है।

जनवरी 1881 में शुरू हुए दो अख़बार

गोपाल राम के अनुसार अंग्रेज़ी साप्ताहिक मराठा 2 जनवरी 1881 को और मराठी साप्ताहिक केसरी 4 जनवरी को निकला। तिलक, जी. जी. आगरकर, चिपलूणकर और एम. बी. नामजोशी ने उन्हें पूना में न्यू इंग्लिश स्कूल के परिसर से चलाया। गोपाल राम लिखते हैं कि पहले साल के अंत तक सरकारी रिकॉर्ड अख़बारों को सरकार के प्रति अमित्र बता रहे थे।

1882 में तिलक और आगरकर को कोल्हापुर रियासत के मंत्री बर्वे पर हमला करने वाले लेखों के लिए चार-चार महीने की सज़ा हुई, उन चिट्ठियों के आधार पर जो जाली निकलीं। गोपाल राम के अनुसार उस अवधि में से तिलक ने 101 दिन काटे और उनका वज़न 25 पाउंड घट गया।

जस्टिस आर्थर स्ट्रेची ने 1897 की जूरी से कहा कि केसरी के छह या सात हज़ार ग्राहक हैं, और 1908 का भारत सरकार के एक सचिव का नोट, जिसे गोपाल राम उद्धृत करते हैं, उसका प्रसार 20,000 बताता है।

सार्वजनिक गणेशोत्सव और एक शिवाजी उत्सव

11 अगस्त 1893 को बंबई के हिंदू-मुस्लिम दंगों के बाद तिलक और उनके साथियों ने पूना में गणपति की पाँच सार्वजनिक मूर्तियाँ स्थापित कीं। गोपाल राम द्वारा उद्धृत 26 सितंबर 1893 का केसरी कहता है कि विसर्जन का जुलूस “बड़ी हद तक” सार्वजनिक रूप ले चुका था। कीर और गोपाल राम, दोनों घर की पूजा के सड़क पर आने का वर्णन करते हैं, गायन मंडलियों, व्याख्यानों और व्यायाम मंडलों के साथ। UCLA साउथ एशिया केंद्र के अनुसार 1896 के एक केसरी संपादकीय ने तर्क दिया कि ये उत्सव राजनीतिक शिक्षा को गाँवों तक उस तरह पहुँचा सकते हैं जैसे कांग्रेस नहीं पहुँचा सकती थी।

उत्सव शुरू से ही विवादित थे। गोपाल राम दर्ज करते हैं कि 1894 में पूना में एक मस्जिद के पास से गाते गुज़र रहे लड़कों और मुसलमानों के बीच टकराव दंगे में बदल गया, और तिलक के आलोचकों ने कहा कि जुलूस मुसलमानों के ताबूत जुलूस की नक़ल है और मुसलमानों को ठेस पहुँचाता है। तिलक ने जवाब दिया कि हिंदू मेलों में बहुत पहले से ऐसे ही ढोल और जुलूस होते आए हैं। कीर जोड़ते हैं कि एक शिवाजी उत्सव 1885 में ही सुधारक एम. जी. रानाडे के आसपास के लोगों ने शुरू कर दिया था, और जब तिलक ने उसे जन-उत्सव बनाया तो उन्होंने उसका विरोध किया। दो साल के भीतर गणपति उत्सव मराठी-भाषी क़स्बों में फैल गया, और UCLA के पन्ने के अनुसार 1910 तक अंग्रेज़ों ने आदेश से उसे सीमित कर दिया था। जिस शासक का यह उत्सव सम्मान करता था, वह हमारे शिवाजी के परिचय का विषय है।

1897 का मुक़दमा और 6 के मुक़ाबले 3 के फ़ैसले पर 18 महीने की सज़ा

15 जून 1897 के केसरी ने शिवाजी राज्याभिषेक उत्सव की ख़बर दी, ऐसी कविताएँ छापीं जिनमें शिवाजी अपने देश की हालत पर विलाप करते हैं, और एक लेख छापा जिसमें पूछा गया कि क्या शिवाजी ने अफ़ज़ल ख़ान को मारकर पाप किया। 22 जून को पूना के प्लेग आयुक्त डब्ल्यू. सी. रैंड और लेफ़्टिनेंट आयर्स्ट को गोली मारकर मार डाला गया। बंबई हाई कोर्ट के अपने विवरण के अनुसार, हत्याओं का दोष तिलक के भाषणों और लेखों पर डाला गया। तिलक पर हत्याओं का नहीं, भारतीय दंड संहिता की धारा 124A के तहत राजद्रोह का मुक़दमा चला।

ज़मानत दो बार ठुकराई गई, फिर तीसरी अर्ज़ी पर, जिस पर उनके वकील डी. डी. दावर ने बहस की, हाई कोर्ट ने 50,000 रुपये पर उसे मंज़ूर किया। जस्टिस स्ट्रेची ने बुधवार 8 सितंबर 1897 को मुक़दमा शुरू किया। उन्होंने 1891 के कलकत्ता हाई कोर्ट के एक फ़ैसले का हवाला देकर जूरी से कहा कि “असंतोष” का मतलब स्नेह का अभाव है। हाई कोर्ट का इतिहास-पन्ना इसे चूक कहता है, और वकील अरविंद दातार इसे साफ़ ग़लत कहते हैं, क्योंकि धारा 124A की व्याख्याएँ सरकारी उपायों की आलोचना को बचाती हैं।

जूरी 6 और 3 में बँटी। लाइवलॉ नौ सदस्यों को पाँच यूरोपीय ईसाई, दो हिंदू, एक पारसी और एक यूरोपीय यहूदी बताता है, और दातार तथा गोपाल राम सहमत हैं कि तीनों भारतीयों ने बरी करने के पक्ष में मत दिया। बहुमत को मानते हुए स्ट्रेची ने 14 सितंबर को तिलक को 18 महीने के सश्रम कारावास की सज़ा सुनाई। पूछे जाने पर कि क्या कुछ कहना है, तिलक ने जवाब दिया कि वे अब भी ख़ुद को निर्दोष मानते हैं और समझते हैं कि फ़ैसला ग़लत समझे गए मराठी पाठों से निकला है। हाई कोर्ट ने प्रिवी काउंसिल में अपील की इजाज़त नहीं दी, और प्रिवी काउंसिल ने विशेष अनुमति नहीं दी, हालाँकि एच. एच. एस्क्विथ ने तिलक की ओर से बहस की। 6 सितंबर 1898 को रात 9 बजे तिलक रिहा हुए, जब सरकार ने यह शर्त मान ली कि बाद में राजद्रोह में कोई भी सज़ा हुई तो बिना काटे छह महीने उसमें जुड़ जाएँगे।

सूरत, दिसंबर 1907

नागपुर के लिए तय कांग्रेस अधिवेशन अध्यक्ष को लेकर विवाद के बाद सूरत ले जाया गया। नरमपंथियों ने रास बिहारी घोष का साथ दिया, और तिलक के पक्ष ने लाजपत राय का नाम रखा। 27 दिसंबर 1907 को तिलक ने एक संशोधन की सूचना दी थी, पर सभापति ने तिलक के बोलने से पहले ही घोष के चुनाव पर मतदान करा दिया। मंच पर खड़े तिलक ने हटाए बिना जाने से इनकार कर दिया। एक जूता फ़िरोज़शाह मेहता को आकर लगा, और घोष ने अधिवेशन को बिना तारीख़ के स्थगित कर दिया।

हर पक्ष ने दूसरे को दोष दिया। गोपाल राम के अनुसार तिलक के दल ने कहा कि नरमपंथियों ने लाठी वाले लोग भाड़े पर रखे थे, और एक नरमपंथी प्रवक्ता आर. एन. मुधोलकर ने कहा कि तिलक के प्रतिनिधियों में दलाल और कारख़ाने के मज़दूर शामिल थे। बंबई सरकार का अपना इतिहास-रेखाचित्र होम रूल लीग की शुरुआत को सूरत से जोड़ता है।

1908 का मुक़दमा, जिन्ना की ज़मानत की बहस, और बंबई की हड़तालें

केसरी के दो लेखों पर मुक़दमा चला, एक 12 मई 1908 का और एक 9 जून का। दोनों 30 अप्रैल को मुज़फ़्फ़रपुर में खुदीराम बोस और एक साथी द्वारा एक बग्घी पर फेंके गए बम के बाद के थे, जिसमें दो अंग्रेज़ महिलाएँ मारी गईं, और विस्फोटकों तथा अख़बारों पर बने नए क़ानूनों के बाद के भी। दातार ध्यान दिलाते हैं कि तिलक ने उस वारदात की निंदा की, पर लिखा कि दमन और स्वराज्य के अधिकारों से इनकार ऐसी और घटनाओं को जन्म देगा। उन्हें 24 जून को शाम क़रीब 6 बजे बंबई में गिरफ़्तार किया गया और धारा 124A तथा 153A के तहत आरोप लगाया गया।

मोहम्मद अली जिन्ना, जो तब बंबई के एक युवा बैरिस्टर थे, ज़मानत की अवस्था में तिलक के वकील थे। लाइवलॉ उन्हें तिलक का पहला वकील बताता है, और गोपाल राम लिखते हैं कि 2 जुलाई को जिन्ना ने हाई कोर्ट में ज़मानत की अर्ज़ी दी, यह दलील देते हुए कि तिलक जेल से वकील को निर्देश नहीं दे सकते, कि उन्हें मधुमेह है, और कि लेखों के सरकारी अनुवाद ग़लत हैं। जस्टिस दावर ने, जिन्होंने 1897 में तिलक के वकील के रूप में यही बात उठाई थी, महाधिवक्ता को सुने बिना और कारण बताए बिना ज़मानत ठुकरा दी। गोपाल राम के अनुसार मुक़दमे में तिलक ने अपने वकीलों को हटा दिया और जूरी से ख़ुद बोले।

वह भाषण 21 घंटे चला, एक आँकड़ा जिसे पुलिस आयुक्त की रिपोर्ट और दावर का जूरी को दिया निर्देश, दोनों दोहराते हैं। तिलक ने तर्क दिया कि मराठी का ग़लत अनुवाद हुआ है, कि नौकरशाही की आलोचना सरकार से नफ़रत नहीं है, और कि एंग्लो-इंडियन अख़बारों ने इससे कहीं कड़े शब्द बिना मुक़दमे के छापे हैं।

नौ जूरी सदस्यों में सात यूरोपीय थे और दो भारतीय। 22 जुलाई 1908 को वे 7 और 2 में बँटे, दोनों भारतीयों ने दोषी नहीं के पक्ष में मत दिया। दावर ने तिलक से कहा कि लेख “राजद्रोह से खदबदा रहे” थे और दोनों आरोपों में से हर एक पर तीन साल के निर्वासन की सज़ा सुनाई, जो एक के बाद एक चलनी थी, साथ में 1,000 रुपये जुर्माना। तिलक ने जवाब दिया कि चीज़ों की नियति ऊँची शक्तियाँ तय करती हैं और हो सकता है कि उनका उद्देश्य उनकी आज़ादी से ज़्यादा उनके कष्ट से फूले-फले।

बंबई के पुलिस आयुक्त एच. जी. गेल ने 27 अगस्त 1908 को सरकार को रिपोर्ट दी कि तिलक को रात 9.40 बजे दोषी ठहराया गया। उन्होंने दर्ज किया कि 24 जुलाई को 70 मिलों में और 25 जुलाई को 76 में काम रुका, कि सेना बुलाई गई, और कि उपद्रव के दौरान पुलिस और सैनिकों ने लोगों को गोली मारकर मार डाला, जिनमें 24 जुलाई को चिंचपोगली रोड पर तीन थे। गेल ने एक रिपोर्ट का भी ज़िक्र किया कि कपड़ा बाज़ार के कर्मचारियों ने छह दिन तक काम पर न आने का संकल्प लिया था, सज़ा के हर साल के लिए एक दिन।

मांडले और गीता रहस्य

तिलक को 14 सितंबर 1908 तक अहमदाबाद के पास साबरमती जेल में रखा गया, जब उन्हें रंगून जाने वाले जहाज़ पर चढ़ाया गया। 21 सितंबर को बंबई सरकार ने निर्वासन को साधारण कारावास में बदल दिया, जिससे, गोपाल राम के अनुसार, उन्हें वह आज़ादी नहीं मिली जो निर्वासित क़ैदी को मिलती। उन्होंने मांडले केंद्रीय कारागार में क़रीब 20 फ़ुट गुणा 12 फ़ुट की एक कोठरी में छह साल बिताए, और गोपाल राम के अनुसार उन्हें अख़बार नहीं मिलने दिए गए। उनकी पत्नी की मृत्यु जून 1912 में हुई।

बी. एस. सुकथनकर का 1935 का गीता रहस्य का अंग्रेज़ी अनुवाद मूल पांडुलिपि पर एक टिप्पणी देता है, जो 2 नवंबर 1910 और 30 मार्च 1911 के बीच की तारीख़ों वाली चार जिल्द-बँधी कॉपियों में भरी है। वहाँ उद्धृत 30 जून 1914 के केसरी साक्षात्कार में तिलक ने कहा कि उन्हें जिल्द-बँधी कॉपियाँ दी गई थीं, स्याही नहीं, सिर्फ़ एक पेंसिल जो पहले से नुकीली मिलती थी। उनकी अपनी भूमिका कहती है कि मसौदा मांडले में 1910 और 1911 की सर्दियों में बना, और अधूरे हिस्से उन्होंने रिहाई के बाद पूरे किए। पहला संस्करण जून 1915 में निकला, उसके बाद, गोपाल राम के अनुसार, जब सरकार के एक मराठी विशेषज्ञ को पांडुलिपि में कुछ आपत्तिजनक नहीं मिला और वह लौटा दी गई। यह किताब गीता को कैसे पढ़ती है, कर्म को संन्यास से ऊपर रखते हुए, यह गीता की संरचना और भाष्यों पर हमारे लेख में है।

तिलक को 17 जून 1914 को रात 12.45 बजे रिहा किया गया, उनकी अवधि ख़त्म होने से कुछ हफ़्ते पहले।

होम रूल, लखनऊ और आख़िरी महीने

बंबई सरकार का इतिहास-रेखाचित्र और कीर, दोनों तिलक की होम रूल लीग की स्थापना को 28 अप्रैल 1916 के बेलगाम प्रांतीय सम्मेलन से जोड़ते हैं, जिसमें जोसेफ़ बैप्टिस्टा अध्यक्ष और एन. सी. केलकर सचिव थे। एनी बेसेंट की लीग सितंबर में मद्रास में बनी। बेलगाम और अहमदनगर में उनके होम रूल भाषणों के कारण पूना ज़िले के मजिस्ट्रेट ने 22 जुलाई 1916 को एक नोटिस जारी किया कि वे 20,000 रुपये का अच्छे आचरण का मुचलका क्यों न दें, और मजिस्ट्रेट ने बाद में मुचलके का आदेश दे दिया। गोपाल राम के अनुसार जिन्ना ने मजिस्ट्रेट के सामने और फिर हाई कोर्ट में तिलक का मामला लड़ा, जिसने नवंबर 1916 में आदेश रद्द कर दिया। बंबई हाई कोर्ट के संग्रहालय का पन्ना भी दर्ज करता है कि मुचलके का आदेश रद्द हुआ।

दिसंबर 1916 में लखनऊ में कांग्रेस और मुस्लिम लीग साथ बैठे और एक साझा सुधार योजना पर सहमत हुए। उसमें सात प्रांतों की प्रांतीय परिषदों में और इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के निर्वाचित सदस्यों के एक-तिहाई हिस्से में मुसलमानों के लिए सीटें आरक्षित की गईं, सब पृथक निर्वाचक मंडलों के ज़रिए भरी जानी थीं। कीर लिखते हैं कि पृथक निर्वाचक मंडल मानने के लिए तिलक की आलोचना हुई और मुंजे तथा सप्रू ने उनका विरोध किया। 30 दिसंबर को एक होम रूल सभा में तिलक ने कहा, “मुसलमानों की मदद के बिना हम अपनी मौजूदा असहनीय हालत से ऊपर नहीं उठ सकते।” समझौते में जिन्ना की भूमिका उनके रिकॉर्ड के हमारे वृत्तांत में बताई गई है।

तिलक का निधन बंबई में रविवार 1 अगस्त 1920 को रात 12.50 बजे हुआ। गोपाल राम अंतिम यात्रा की भीड़ दो लाख (200,000) बताते हैं और कहते हैं कि जब कुछ शोक करने वाले चाहते थे कि अर्थी सिर्फ़ ब्राह्मण उठाएँ, तब गांधी ने अर्थी का एक सिरा उठाया। गांधी ने 28 जुलाई को घोषणा की थी कि उनका असहयोग आंदोलन 1 अगस्त से शुरू होगा।

Share
Copied!

स्रोत और आगे पढ़ने के लिए

  1. Bombay High Court, Historical Cases: First Tilak Trial, 1897
  2. Bombay High Court Virtual Museum: Bal Gangadhar Tilak, applications and certificates
  3. Government of Maharashtra, State Gazetteer: Tilak Trial Disturbances, 1908 (report of the Commissioner of Police, Bombay, 27 August 1908)
  4. Government of Maharashtra, State Gazetteer: The Home Rule Movement (Government of Bombay history sketch)
  5. Bal Gangadhar Tilak: His Writings and Speeches (Ganesh and Co., Madras, 1919), Internet Archive
  6. B. G. Tilak, Srimad Bhagavad-Gita Rahasya, translated by B. S. Sukthankar (Tilak Bros., Poona, 1935), with the editor's note on the manuscript, Internet Archive
  7. Gopal Ram, Lokamanya Tilak: A Biography (Asia Publishing House, 1956), Internet Archive
  8. Dhananjay Keer, Lokamanya Tilak: Father of Our Freedom Struggle (Popular Prakashan, 2nd ed., 1959), Internet Archive
  9. Arvind Datar, Legal Notes: The Sedition Trials of Lokmanya Tilak, Bar and Bench
  10. A Look Back at Tilak's Sedition Trials, LiveLaw
  11. UCLA Center for India and South Asia: Ganpati festival
  12. Kaka Baptista: The Unsung Hero Who Gave Us 'Swaraj is my Birthright and I Shall Have It', The Better India

यह लेख AI उपकरणों की सहायता से शोधित और लिखा गया है, और सटीकता के लिए संपादित किया गया है। यह केवल सामान्य जानकारी और चर्चा के लिए है, पेशेवर सलाह नहीं। हमारे संपादकीय मानक और अस्वीकरण देखें। कोई त्रुटि मिली? हमें बताएँ।

#bal gangadhar tilak#swaraj#kesari#sedition trial#home rule league#lucknow pact#gita rahasya#mandalay

अच्छा लगा? अगला लेख पाएँ।

एक बार में एक अच्छा लेख, सीधे आपके इनबॉक्स में। कोई स्पैम नहीं, जब चाहें अनसब्सक्राइब करें।

इसी श्रेणी में और: भारतीय इतिहास
जिन्ना ने 1916 के लखनऊ समझौते का मसौदा बनाने में मदद की, 1929 में भगत सिंह और उनके भूख-हड़ताली साथियों पर उनकी ग़ैरहाज़िरी में मुक़दमा चलाने वाले विधेयक के ख़िलाफ़ दलील दी, और 1946 में कैबिनेट मिशन योजना को 53 दिन तक स्वीकार रखा
सितंबर 1929 में जिन्ना ने असेंबली से कहा कि लाहौर जेल में भूख हड़ताल पर बैठे लोग मरने पर आमादा हैं। जुलाई 1946 में उनकी लीग उस एकल भारतीय संघ की योजना से पीछे हट गई जिसे उसने 6 जून को स्वीकार किया था।
अबुल फ़ज़ल ने अकबर का आँका हुआ राजस्व 3.6 अरब दाम बताया, और उन पदों, दरों और नियमों को लिख डाला जिनसे वह जुटाया और ख़र्च किया जाता था
5,000 के मनसबदार को महीने में 30,000 रुपये मिल सकते थे और 10 के मनसबदार को 100, और उधार के घोड़े लाकर मुआयना झूठा किया जा सकता था। अकबर के दरबारी इतिहासकार और एक विरोधी समकालीन, दोनों ने लिख रखा कि यह मशीन कैसे चलती थी।
सात सदस्यों की एक समिति ने भारत का संविधान लिखने में 141 दिन बैठकें कीं, और उसके अध्यक्ष बी. आर. आंबेडकर ने सभा से कहा कि श्रेय वास्तव में उनका नहीं है
लगभग एक महीने में पहला मसौदा, पेश किए गए लगभग 7,635 संशोधन, और एक अध्यक्ष जिसने कहा कि प्रशंसा का हिस्सा दूसरों का भी है। सभा का अपना रिकॉर्ड, और जहाँ बाद के इतिहासकार असहमत हैं।
← सभी लेख