8 दिसंबर 1971 की रात पाकिस्तानी जेटों ने भुज का रनवे तबाह कर दिया। गाँव की लगभग 300 महिलाओं ने 72 घंटे में वायुसेना को फिर उड़ा दिया
भारतीय इतिहास

8 दिसंबर 1971 की रात पाकिस्तानी जेटों ने भुज का रनवे तबाह कर दिया। गाँव की लगभग 300 महिलाओं ने 72 घंटे में वायुसेना को फिर उड़ा दिया

चित्रण: tuput

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3 दिसंबर 1971 से पाकिस्तानी विमान हर रात भुज के भारतीय वायुसेना अड्डे पर बम गिराते रहे। 8 दिसंबर की रात रनवे बेकार हो गया, और स्क्वाड्रन लीडर विजय कर्णिक ने मज़दूरों के लिए माधापर गाँव का रुख़ किया। महिलाओं के अपने बयान के मुताबिक़, उनमें से लगभग 300 ने तीन दिन के भीतर उसे फिर लड़ाकू विमानों के लायक़ तैयार कर दिया।

tuput संपादकीय टीम · · 8 मिनट का पठन

स्क्वाड्रन लीडर विजय कर्णिक बताते हैं कि 3 दिसंबर 1971 से गुजरात के भुज में भारतीय वायुसेना के अड्डे पर हर रात हवा से बम गिराए जाते थे। “3 (दिसंबर) से हर रात वहाँ (भुज में) बमबारी हो रही थी,” उन्होंने स्वतंत्रता दिवस 2021 को दिए इंटरव्यू में इंडिया टीवी से कहा।

फिर 8 दिसंबर की रात आई। पाकिस्तान ने, उनके शब्दों में, “8 (दिसंबर) की रात, 9 को, भुज पर केंद्रित हमले की योजना बनाई।” नतीजे के बारे में उन्होंने कहा: “उन्होंने हमारा रनवे तबाह कर दिया।” उनकी गिनती में पट्टी “8 जगह से टूटी” थी।

कर्णिक अड्डे के कमांडर थे। नागपुर के दैनिक द हितवाद के मुताबिक़ वे 1962 में 23 साल की उम्र में वायुसेना में आए थे, यानी हमले शुरू होने तक उनकी सेवा को नौ साल हो चुके थे। उन्होंने इंडिया टीवी को वह वजह बताई कि टूटे रनवे को अनदेखा क्यों नहीं किया जा सकता था: “क्योंकि युद्ध में किसी वायुसेना अड्डे का चालू न रहना बहुत बड़ा झटका होता है।“

युद्ध की पहली रात ने रनवे का क्या किया

भुज अकेला निशाना नहीं था। द ट्रिब्यून के मुताबिक़ 3 दिसंबर की शाम 5:30 बजे आदेश निकले और पहली पाकिस्तानी टुकड़ियाँ 5:40 बजे तक हवा में थीं। वे भारत के ग्यारह वायुसेना अड्डों पर गईं, जिनमें भुज भी था। उसी ब्योरे के अनुसार नुक़सान कुछ जगह रनवे और एक रडार स्टेशन तक सीमित रहा, और इंदिरा गांधी ने उस शाम देश को संबोधित किया और इन हमलों को भारत के ख़िलाफ़ युद्ध की घोषणा कहा।

उनमें से ज़्यादातर रनवे जल्दी फिर चालू हो गए। हिस्ट्रीनेट के जॉन गटमैन लिखते हैं कि “अगली सुबह तक भारत ने अभी घोषित न हुए युद्ध के लिए सेनाएँ जुटा लीं और लगभग सभी क्षतिग्रस्त रनवे की मरम्मत कर दी।” भुज की पट्टी का काम लंबा निकला। द प्रिंट बताता है कि एक ठेकेदार ने उसे देखकर कहा कि इसमें छह महीने लगेंगे।

व्यापक युद्ध छोटा रहा। द ट्रिब्यून पश्चिमी मोर्चे के लिए भारत की योजना को “पूर्व में सीधे जानलेवा वार करने और पश्चिम में ज़मीन थामे रखने की ऑपरेशनल योजना का हिस्सा” कहता है। ढाका ने 16 दिसंबर को आत्मसमर्पण किया, और पश्चिमी मोर्चे का युद्धविराम 17 दिसंबर को स्वीकार हुआ। बांग्लादेश को जन्म देने वाले युद्ध की कहानी 1971 पर लिखे लेख में है। यह लेख युद्धविराम से पहले के दिनों में पाकिस्तान की सरहद वाले ज़िले कच्छ के एक रनवे पर रुका रहता है।

ठेकेदार ने कहा, छह महीने

द बेटर इंडिया ने 2019 में बताया कि वायुसेना ने पहले सीमा सुरक्षा बल से पट्टी ठीक करने को कहा, पर मज़दूर कम थे। फिर द प्रिंट के मुताबिक़ स्थानीय कलेक्टर ने माधापर के मुखिया, यानी सरपंच, से पूछा कि क्या लोग मदद कर सकते हैं। द ट्रिब्यून के अनुसार माधापर भुज से लगभग पाँच किलोमीटर दूर है। द बेटर इंडिया सरपंच का नाम जादवजीभाई हीरानी बताता है और कहता है कि जब उन्होंने “ख़ुद महिलाओं से सेनाओं की मदद करने को कहा, तो महिलाएँ ख़ुशी से तैयार हो गईं।”

उसी क़दम का कर्णिक का ब्योरा ख़ुद से शुरू होता है। “मैंने माधापुर के बारे में सोचा, भुज के क़रीब का एक गाँव,” उन्होंने इंडिया टीवी से कहा। “मैं उनके पास गया और किसी तरह वे राज़ी हो गए।”

अड्डे पर, द बेटर इंडिया के हिसाब से, वायुसेना के 50 कर्मी थे, डिफ़ेंस सिक्योरिटी कोर के 60 जवान, जो सैन्य प्रतिष्ठानों की रखवाली करती है, और कर्णिक के अधीन काम करने वाले दो वरिष्ठ अफ़सर।

पहले तीस, फिर सौ, फिर पूरा गाँव

कर्णिक ने मज़दूरों के बढ़ने का क्रम चरणों में बताया। “शुरू में 30 आईं, फिर 100 और फिर पूरा गाँव आ गया।” कानबाई शिवजी हीरानी, जो 1971 में 24 साल की थीं और जिन्होंने 2025 में वियॉन से बात की, लगभग यही क्रम बताती हैं: “पहले दिन 30 महिलाएँ गईं। दूसरे दिन और ज़्यादा गईं। तीसरे दिन तक 322 महिलाएँ काम कर रही थीं।”

घंटे लंबे थे। हीरानी ने कहा: “हम सुबह 7 बजे घर से निकलते और शाम 7 बजे लौटते।” द प्रिंट कहता है कि तीन दिन तक काम सुबह 7 से शाम 7 बजे तक चला। सामुबेन विश्राम बांदेरी, जिन्हें द प्रिंट भी उद्धृत करता है, को याद था कि घर पर इसकी क्या क़ीमत चुकानी पड़ी: “हम अपने बच्चे घर छोड़कर गईं। मेरे ससुराल वाले डरे हुए थे, पर देश के लिए प्यार मेरी रगों में दौड़ रहा था।”

कर्णिक कहते हैं कि महिलाएँ पढ़ी-लिखी थीं, और गाँव की लड़कियाँ स्कूल-कॉलेजों में पढ़ रही थीं। मज़दूरों में से एक, वालबाई सेघानी, ने द बेटर इंडिया से कहा: “अगर हम मर जातीं, तो वह इज़्ज़त की मौत होती।“

हल्की हरी साड़ियाँ और सायरन का अभ्यास

हमले की ज़द में आए हवाई अड्डे पर काम के लिए नियम चाहिए थे, और कर्णिक ने उन्हें बताया: “हमने उन्हें समझाया कि बमबारी के दौरान पनाह कैसे लेनी है, छिपने के लिए कुछ झाड़ियाँ थीं। हमने उन्हें बताया कि हवाई हमले की चेतावनी का संकेत क्या है, और ख़तरा टलने का संकेत क्या है।”

द प्रिंट का महिलाओं के पक्ष का ब्योरा भी यही अभ्यास बताता है: पहले सायरन पर छिप जाओ, दूसरे पर काम पर लौट आओ। दुश्मन के विमानों की नज़र से बचने के लिए, द प्रिंट के अनुसार, महिलाओं ने हल्की हरी साड़ियाँ पहनीं। वीरू लच्छानी ने द बेटर इंडिया को एक और उपाय बताया: “हमें कहा गया था कि पट्टी को गोबर से ढक दें ताकि दुश्मन के विमानों से वह छिपी रहे।”

द बेटर इंडिया जोड़ता है कि मज़दूर दिन के उजाले के घंटों में ही काम करते थे, और स्थानीय मंदिर उन्हें खाना खिलाते थे।

कर्णिक ने दाँव सीधे शब्दों में रखा। “हम युद्ध लड़ रहे थे और इन महिलाओं में से किसी को भी कुछ हो जाता, तो वह युद्ध प्रयास के लिए बहुत बड़ा नुक़सान होता,” द बेटर इंडिया ने 2019 में उन्हें उद्धृत किया। यहाँ उद्धृत किसी भी रिपोर्ट में महिलाओं में से किसी के हताहत होने का ज़िक्र नहीं है।

चौथा दिन, शाम 4 बजे

द बेटर इंडिया के अनुसार महिलाओं को 9 दिसंबर को सतर्क किया गया और चौथे दिन, शाम 4 बजे, मरम्मत की हुई पट्टी से लड़ाकू विमानों ने उड़ान भरी। उसी रिपोर्ट में मरम्मत का समय 72 घंटे है, जो आँकड़ा द प्रिंट और वियॉन दोहराते हैं।

कर्णिक कहते हैं कि उन्होंने युद्धविराम के एक हफ़्ते बाद, 24 दिसंबर को भुज में इंदिरा गांधी के साथ “लगभग 3-4 घंटे” बिताए, और उन्होंने कहा कि भारत के पास कभी एक झाँसी की रानी थी और अब 300 हैं, यह 1857 में अंग्रेज़ों से लड़ने वाली झाँसी की रानी का हवाला था। यह उनके शब्दों की कर्णिक की अपनी रिपोर्ट है। द बेटर इंडिया उपहार की पेशकश को युद्ध के तीन साल बाद की बताता है और कहता है कि महिलाओं ने उनकी दी चीज़ को यह कहकर ठुकरा दिया कि “हमने जो किया वह अपने देश के लिए था।” द हितवाद कहता है कि उन्होंने समूह को 50,000 रुपये का इनाम दिया। रक़म पर ब्योरे सहमत हैं, पर इस पर नहीं कि किसने और कब दी।

कर्णिक यह भी कहते हैं कि उनके अड्डे ने युद्ध में पहले भुज के ऊपर पाकिस्तान के दो विमान मार गिराए थे। यह उनका दावा है, और किसी भी रिपोर्टिंग में इसके लिए कोई सेवा-रिकॉर्ड नहीं दिया गया है।

जो आँकड़े आपस में नहीं मिलते

बमों की गिनती हर बार बताने पर बदल जाती है। द बेटर इंडिया ने “14 से ज़्यादा नेपाम बम” बताए, नेपाम यानी गाढ़ा किया हुआ पेट्रोल जो जलता है। कर्णिक का अपना पैमाना रनवे पर आठ क्षतिग्रस्त जगहों का है। महिलाओं ने 2025 में आज तक से कहा कि पाकिस्तान ने “20 से ज़्यादा बम” गिराए। उसी साल द प्रिंट 64 बम, 22 से ज़्यादा गड्ढे और आठ क्षतिग्रस्त विमान बताता है। फ़िल्म कंपेनियन 14 दिनों में कुल 35 हमले, 92 बम और 22 रॉकेट दोहराता है, बिना यह बताए कि गिनती कहाँ से आई।

मज़दूरों की संख्या भी बदलती है। ज़्यादातर बयान 300 महिलाएँ बताते हैं। हीरानी को तीसरे दिन 322 के काम करने की याद है, और द प्रिंट कहता है कि पहले दिन 70 से 80 गाँव वाले आए, जबकि कर्णिक और हीरानी 30 कहते हैं। आज तक में महिलाएँ मरम्मत का अनुमान चार से छह महीने बताती याद करती हैं, जबकि द प्रिंट एक ठेकेदार के छह महीने बताता है। वियॉन कहता है कि पट्टी चार दिन के भीतर फिर चालू हो गई, और द हितवाद और द प्रिंट 72 घंटे कहते हैं।

फ़िल्म ने महिलाओं की अगुवा का नाम सुंदरबेन जेठा माधरपरिया रखा है, जिसे सोनाक्षी सिन्हा ने निभाया है। यहाँ उद्धृत किसी भी रिपोर्ट में किसी एक व्यक्ति को महिलाओं की नेता नहीं बताया गया। वे मज़दूरों में सेघानी, लच्छानी, हीरुबेन भूड़िया, हीरानी, बांदेरी और शामभाई खोखानी के नाम लेती हैं, और सरपंच जादवजीभाई हीरानी वह इकलौते स्थानीय व्यक्ति हैं जिन्हें द बेटर इंडिया पूछने का श्रेय देता है।

50,000 रुपये और गाँव का भवन

द प्रिंट के अनुसार सरकार ने गाँव वालों को 50,000 रुपये (आधा लाख रुपये) दिए, और उन्होंने उसे पंचायत घर, यानी गाँव की परिषद के भवन, पर ख़र्च किया, जो माधापर के प्रवेश पर है। भवन का नाम वीरांगना भवन है। प्रवेश पर एक मूर्ति है, जिसके आधार पर वीरांगना स्मारक, यानी महिलाओं का स्मारक, लिखा है। द बेटर इंडिया माधापर में वीरांगना स्मारक नाम के एक युद्ध स्मारक की भी बात करता है। आज तक में महिलाएँ कहती हैं कि उन्होंने उस पैसे से पंचायत भवन में एक कमरा बनवाया।

दिल्ली में एक पौधा

26 मई 2025 को भुज में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जीवित बची 13 महिलाओं से मिले, द ट्रिब्यून बताता है, ऑपरेशन सिंदूर के तीन हफ़्ते से भी कम समय बाद, यानी 7 मई 2025 के मिसाइल हमलों के बाद, जिन्हें भारत किसी हमले का जवाब कैसे देता है में समेटा गया है। आज तक मौजूद चार महिलाओं के नाम बताता है: 80 साल की कानबाई हीरानी, 83 साल की शंभाई खोखनी, 82 साल की लालबाई भुआरिया, और 75 साल की सामू भंडेरी।

महिलाओं ने प्रधानमंत्री को सिंदूर के पौधे दिए, और आज तक कहता है कि उन्होंने उनसे कहा कि वे एक पौधा अपने निवास पर लगाएँगे। वियॉन और स्वराज्य बताते हैं कि उन्होंने ऐसा 5 जून 2025 को, विश्व पर्यावरण दिवस पर, नई दिल्ली के 7 लोक कल्याण मार्ग पर किया।

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स्रोत और आगे पढ़ने के लिए

  1. India TV: Vijay Karnik interview on the 1971 war and the Bhuj airstrip (15 August 2021)
  2. The Better India: In 1971, 300 Bhuj Women Risked Their Lives to Revive a Bombed Airstrip in 3 Days (1 March 2019)
  3. ThePrint: In Bhuj, clouds of war brought back 1971 memories, when hundreds of women rebuilt IAF runway by hand (12 May 2025)
  4. WION: Gujarat woman who rebuilt IAF airstrip in 1971 war, Kanbai Shivji Hirani, on the Pahalgam attack (2025)
  5. Aaj Tak (Hindi): Bhuj women welcome PM Modi, gift a plant in memory of the 1971 war (27 May 2025)
  6. The Hitavada: From Nagpur to glory, the tale of the real hero of Bhuj (8 August 2021)
  7. The Tribune: First day of the 1971 war, the Pakistani air strikes of 3 December (Vijay Mohan)
  8. HistoryNet: Lessons learned from Operation Chenghiz Khan (Jon Guttman, 9 October 2021)
  9. The Tribune: Western front exploits and 4 MVCs, 50 years of the 1971 war (5 September 2021)
  10. The Daily Star: December 17, 1971
  11. The Tribune NewsBytes: the Prime Minister meets the 1971 Bhuj women (30 May 2025)
  12. WION: PM Modi plants the Sindoor sapling gifted by the Bhuj women of 1971 (5 June 2025)
  13. Swarajya: PM Modi plants the Sindoor sapling gifted by the Kutch women at his residence
  14. Film Companion: Bhuj: The Pride of India trailer talk

परदे पर और किताबों में

  • Bhuj: The Pride of India (2021) , निर्देशक Abhishek Dudhaiya , Hindi . एक नाट्य रूपांतरण, जो 13 अगस्त 2021 को डिज़्नी+ हॉटस्टार पर आया, जिसमें अजय देवगन स्क्वाड्रन लीडर कर्णिक बने हैं; किरदार और दृश्य परदे के लिए गढ़े गए हैं और फ़िल्म जो हुआ उसका रिकॉर्ड नहीं है

यह सूची उन पाठकों के लिए है जो परदे पर देखी कहानी के पीछे का इतिहास ढूँढ़ रहे हैं। कोई फ़िल्म या नाट्य रूपांतरण स्रोत नहीं होता, और tuput का इनमें से किसी भी कृति से कोई संबंध नहीं है।

यह लेख AI उपकरणों की सहायता से शोधित और लिखा गया है, और सटीकता के लिए संपादित किया गया है। यह केवल सामान्य जानकारी और चर्चा के लिए है, पेशेवर सलाह नहीं। हमारे संपादकीय मानक और अस्वीकरण देखें। कोई त्रुटि मिली? हमें बताएँ।

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पंजाब रेजिमेंट की एक इन्फैंट्री कंपनी ने 4 दिसंबर 1971 की पूरी रात लोंगेवाला चौकी संभाले रखी। जैसलमेर से उड़े हंटर जेट पहली रोशनी में पाकिस्तानी टैंकों पर जा पहुँचे
सबसे पहले पैदल गश्ती दल ने टैंकों की आवाज़ सुनी। एक जनरल ने खुले रेडियो चैनल पर एक हवाई अड्डे से गुहार लगाई। अगली सुबह सात बजे तक चौकी और हवाई अड्डा एक ही लड़ाई लड़ रहे थे, और दोनों तरफ़ के लोग आज भी उसके हिसाब पर एकमत नहीं हैं।
14 दिसंबर 1971 को छह सेबर विमानों ने श्रीनगर हवाई अड्डे पर हमला किया। एक नैट उनके बीच उड़ चला, और उसका पायलट आज भी परमवीर चक्र पाने वाला वायुसेना का अकेला वायुसैनिक है
युद्ध शुरू होने तक इस हवाई अड्डे पर कोई लड़ाकू विमान तैनात नहीं था, और इसके रनवे पर बार-बार बम गिरे। 14 तारीख़ को 0730 बजे छह सेबर आ पहुँचे, और लुधियाना के पास के एक गाँव का नौजवान पायलट उनसे अकेले लड़ने के लिए रह गया।
युद्ध 13 दिन चला। मृतकों को लेकर बहस 55 साल से चल रही है
एक चुनाव जीता गया और किनारे रख दिया गया। एक सेना अपने ही नागरिकों पर टूट पड़ी। एक करोड़ लोग सरहद की ओर भागे। फिर तेरह दिन के युद्ध ने एक नया देश बना दिया, और पीछे एक ऐसा आँकड़ा छोड़ गया जिसे तब से कोई तय नहीं कर पाया।
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