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नागार्जुन सागर जलाशय के उठने से पहले पुरातत्व सर्वेक्षण ने नागार्जुनकोंडा में 130 स्थल खोदे, इक्ष्वाकु राजधानी विजयपुरी को निकाला और उसके स्मारक ऊँची ज़मीन पर दोबारा खड़े किए
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नागार्जुन सागर जलाशय के उठने से पहले पुरातत्व सर्वेक्षण ने नागार्जुनकोंडा में 130 स्थल खोदे, इक्ष्वाकु राजधानी विजयपुरी को निकाला और उसके स्मारक ऊँची ज़मीन पर दोबारा खड़े किए

फ़ोटो: Michael Gunther / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0 (क्रॉप किया गया)

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1954 से 1960 तक आर. सुब्रह्मण्यम के नेतृत्व में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की एक टीम ने तीसरी और चौथी सदी ई. की इक्ष्वाकु राजधानी विजयपुरी की खुदाई की, फिर उसके कुछ स्मारक ऊँची ज़मीन पर दोबारा बनाए और खोज की वस्तुओं को उस द्वीप के संग्रहालय में रखा जो कभी घाटी के ऊपर की पहाड़ी था। सर्वेक्षण इस पुनर्निर्माण को भारत में अपनी तरह का पहला कहता है।

· · 8 मिनट का पठन

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने 1954 से 1960 के बीच आंध्र प्रदेश की नागार्जुनकोंडा घाटी के 24 वर्ग किलोमीटर में फैले 130 स्थल खोदे, 70 से अधिक संरचनाओं के अवशेष पाए, और नागार्जुन सागर जलाशय के घाटी को ढक लेने से पहले उनमें से कुछ सबसे अच्छी को ऊँची ज़मीन पर दोबारा खड़ा किया। सर्वेक्षण का संग्रहालय पोर्टल मूल सामग्री से और मिलते-जुलते परिवेश तथा संरेखण में किए गए इस पुनर्निर्माण को भारत में अपनी तरह का पहला बताता है और इसकी तुलना मिस्र के अबू सिम्बेल के मंदिरों को बचाने से करता है। आज जो देखा जा सकता है, वह बौद्ध विहार की तरह बना एक द्वीप संग्रहालय और दोबारा खड़े किए गए मुट्ठी भर स्मारक हैं, जहाँ मोटर नाव से पहुँचा जाता है।

वह घाटी विजयपुरी थी, इक्ष्वाकु राजवंश की राजधानी। पोर्टल खोज की ज़्यादातर वस्तुओं को तीसरी और चौथी सदी ई. का बताता है और कहता है कि वंश ने निचले कृष्णा बेसिन पर लगभग सौ साल राज किया।

एक स्कूल शिक्षक की पहली नज़र में आई घाटी

सर्वेक्षण का पोर्टल कहता है कि खंडहरों को सबसे पहले एक शिक्षक एस. वेंकटरमैया ने उजागर किया और ए. आर. सरस्वती ने मार्च 1926 में उन्हें विद्वानों के सामने रखा। फिर ए. एच. लॉन्गहर्स्ट और एम. एच. कुरैशी ने सर्वेक्षण के लिए वहाँ खुदाई की, और टी. एन. रामचंद्रन 1938 में आए। पोर्टल पहली टीम के वर्ष 1924 से 1931 बताता है; द प्रिंट और लाइव हिस्ट्री इंडिया दोनों लॉन्गहर्स्ट की खुदाई को 1927 से 1931 का बताते हैं। लॉन्गहर्स्ट की रिपोर्ट 1938 में छपी, और ज़िन का शोधपत्र उसका हवाला देता है।

पोर्टल कहता है कि पहाड़ी का नाम बौद्ध आचार्य नागार्जुन के नाम पर पड़ा और उनके प्रयासों ने घाटी को बौद्ध अध्ययन का केंद्र बनाया। पोर्टल यहाँ के बौद्ध केंद्र का एक प्राचीन नाम श्रीपर्वत भी देता है।

पानी के विरुद्ध छह साल

सर्वेक्षण की ‘इंडियन आर्कियोलॉजी’ समीक्षा के 1954 से 1955 के अंक के अनुसार गहन खुदाई अक्तूबर 1954 में शुरू हुई और उस पहले मौसम में सात महत्वपूर्ण स्थल खुल गए, जिनमें विहार, स्तूप, एक सभागृह, एक बंद स्नानागार और दो मंदिर थे। ईटीवी भारत नागार्जुन सागर बाँध की नींव का पत्थर 10 दिसंबर 1955 को रखा बताता है, यानी खुदाई लगभग चौदह महीने पहले शुरू हो चुकी थी।

डॉ. आर. सुब्रह्मण्यम के अधीन परियोजना हर साल बढ़ती गई। 1955 से 1956 तक उसने कम से कम पंद्रह विहार, आठ स्तूप, एक मध्यकालीन मंदिर और कृष्णा पर एक स्नान-घाट खोद निकाला था, जिसके साथ ईंटों का सीढ़ीदार तटबंध महल के क्षेत्र जैसी जगह की ओर जाता था। 1957 से 1958 की समीक्षा खोदा गया क्षेत्र लगभग 1,200 एकड़ और 1958 से 1959 की समीक्षा लगभग 1,800 एकड़ (क़रीब 730 हेक्टेयर) रखती है।

इक्ष्वाकु नगर कैसा दिखता था

1957 से 1958 तक सर्वेक्षण ने दुर्ग खोद लिया था, जिसमें क़िले की दीवार, खाई, फाटक और बैरकें थीं, और जो, उसके शब्दों में, तीसरी सदी की एक इक्ष्वाकु राजधानी की नगर-योजना दिखाता था। उसके बगल में ईंटों का बना एक आयताकार अखाड़ा था, 309 फ़ुट लंबा, 259 फ़ुट चौड़ा और 15 फ़ुट गहरा (लगभग 94 गुणा 79 गुणा 4.6 मीटर), जिसे सीढ़ियों की पंक्तियाँ घेरे थीं और पश्चिम की ओर एक मंडप था। संग्रहालय पोर्टल उसे एम्फ़ीथिएटर या स्टेडियम कहता है।

1956 से 1957 की समीक्षा नक़्शे में एक ढर्रा बताती है। समीक्षा के शब्दों में, नदी के साथ उत्तरी हिस्सों में, किलेबंद क्षेत्र समेत, मुख्यतः ब्राह्मणीय मंदिर और अनुष्ठानिक संरचनाएँ थीं, जबकि भीतरी भाग में अनगिनत बौद्ध मठ-संस्थान थे। उस मौसम का एक अभिलेख राजा एहवल चांतमूल के सोलहवें वर्ष में बने महादेव के मंदिर को दर्ज करता है, जिसे पुष्पभद्रस्वामिन् कहा गया, और जिसके रखरखाव के लिए एक गाँव दिया गया था। पोर्टल जोड़ता है कि इक्ष्वाकु राजा कार्तिकेय और शिव की उपासना करते थे और अश्वमेध तथा वाजपेय यज्ञ करते थे, जबकि राजघराने की स्त्रियों का झुकाव बौद्ध धर्म की ओर था।

अभिलेखों ने वंश की तस्वीर भी भरी। 1955 से 1956 की समीक्षा ने एक नया इक्ष्वाकु नाम रुद्रपुरुषदत्त बताया, और अगले साल की समीक्षा ने पाँचवाँ नाम वीरपुरुषदत्त द्वितीय जोड़ा, जो एहवल चांतमूल का पुत्र था। 1961 से 1962 की समीक्षा स्थल का एकमात्र सातवाहन अभिलेख बताती है, गौतमीपुत्र विजय सातकर्णि का स्तंभ-अभिलेख, जो उनके छठे राज्य-वर्ष का है। पोर्टल कहता है कि नगर का नाम उन्हीं से आया। सातवाहन, जिनके पास इक्ष्वाकुओं से पहले यह क्षेत्र था, महाराष्ट्र के नाणेघाट में बहुत पहले का एक अभिलेख छोड़ गए।

लगभग चालीस बौद्ध स्थल और उनमें रहने वाले संप्रदाय

लाइपज़िग की सैक्सन विज्ञान एवं मानविकी अकादमी की विद्वान मोनिका ज़िन गिनती हैं कि नागार्जुनकोंडा में लगभग 40 बौद्ध स्थल खोदे गए, जो लगभग सौ साल के भीतर बने। 2022 के एक शोधपत्र में वे बताती हैं कि उनमें से केवल छह पर किसी संप्रदाय का नाम लेने वाले अभिलेख हैं, जिससे कुल चार संप्रदाय निकलते हैं: अपरमहाविनशैलीय, थेरवादी, महीशासक और बहुश्रुतीय। उनका निष्कर्ष है कि कथा-उभार वाली नक़्क़ाशी के विहारों का एक ही नक़्शा है, जिसमें कोठरियों के U-आकार के खंड के बाहर एक स्तूप और आमने-सामने दो अर्धवृत्ताकार मंदिर हैं, और उनमें से एक अपरमहाविनशैलीय संप्रदाय का नाम लेता है, जिसके बारे में वे सुझाती हैं कि ऐसी नक़्क़ाशी उसे पसंद थी।

सर्वेक्षण की रिपोर्टें इस विविधता को दर्ज करती हैं। 1954 से 1955 की समीक्षा आंध्र प्रदेश के लिए विशिष्ट एक स्तूप का वर्णन करती है, जिसका व्यास 48 फ़ुट था और जो एक चक्र के रूप में नाभि और दस अरों के साथ बिछाया गया था। 1955 से 1956 की समीक्षा बुद्ध के चरणचिह्नों के जोड़े से तराशी एक पट्टिका का वर्णन करती है, जो तीसरी सदी के मध्य में अंकित है और श्रीलंका के थेरवाद-विभज्यवाद संप्रदाय के भिक्षुओं के नाम लेती है। उसी नदी पर स्थित अमरावती का महास्तूप उसी कला-परंपरा का है, और संग्रहालय पोर्टल नागार्जुनकोंडा को उसका अंतिम चरण कहता है।

कृष्णा घाटी में रोम का सोना

1956 से 1957 की समीक्षा खुदाई से रोम के दो सोने के सिक्कों की सूची देती है, एक टाइबेरियस (16 से 37 ई.) का और एक बड़ी फ़ॉस्टीना का, जो 141 ई. के बाद जारी हुआ। अगले साल की समीक्षा रोमन एम्फ़ोरा के छिड़काव-पात्र और कुछ कुंदे दर्ज करती है, और मिट्टी की ऐसी बुल्ला (मुहर से दबाई गई गाँठें) जिन पर त्रिशूल और मनुष्य का सिर बना है, जो शायद किसी रोमन सिक्के की नक़ल है। पोर्टल नगर की समृद्धि का कारण पूर्वी तट के साथ रोमन और बीज़ेंटाइन साम्राज्यों से अबाध समुद्री व्यापार को बताता है। उस व्यापार का केरल वाला पक्ष मुज़िरिस और पट्टनम की खुदाइयों वाले लेख में है।

क्या बचाया गया, और अब कहाँ है

पोर्टल कहता है कि कुछ उत्कृष्ट संरचनाएँ द्वीप पर और अनुपु के पास झील के पूर्वी किनारे पर दोबारा खड़ी की गईं। द प्रिंट और लाइव हिस्ट्री इंडिया दोनों कहते हैं कि नौ स्मारक दोबारा बनाए गए; सर्वेक्षण का पोर्टल कोई संख्या नहीं देता। ज़िन लिखती हैं कि कुछ स्थलों को खोलकर ऊँची ज़मीन पर दोबारा बनाया गया, कई और के आधे आकार के नमूने बनाए गए, और अधिकतर संग्रहालय के बग़ीचे में केवल छोटे नमूनों के रूप में बचे हैं।

म्यूज़ियम्स ऑफ़ इंडिया की सूची के अनुसार संग्रहालय 1966 में बना। वह एक मध्यकालीन क़िले के अवशेषों के बीच बौद्ध विहार की तरह बनाया गया है, जिसमें पाँच दीर्घाएँ हैं। दीर्घा 1 में स्तूपों के चबूतरों की नक़्क़ाशीदार पट्टिकाएँ हैं। दीर्घा 3 में डूबी घाटी का 6.01 मीटर वर्ग का नमूना है, जो लगभग 120 खोदे गए स्थल दर्शाता है। दीर्घा 5 में अभिलेख हैं, सातवाहन स्तंभ-अभिलेख समेत। पोर्टल की डिजिटल सूची में 8,450 वस्तुएँ दर्ज हैं, जिनमें 3,636 सिक्के हैं। सूची जोड़ती है कि कुछ खुदाई में मिली वस्तुएँ अब दिल्ली, चेन्नई, कोलकाता, पेरिस और न्यूयॉर्क में हैं।

द्वीप तक पहुँचना

नीचे की व्यावहारिक जानकारी 29 अक्तूबर 2026 को संग्रहालय के दो सरकारी पृष्ठों पर जाँची गई, जो हर बात पर एकमत नहीं हैं।

सर्वेक्षण का पोर्टल कहता है कि द्वीप तक विजयपुरी साउथ से मोटर नाव से पहुँचा जाता है, और विजयपुरी साउथ से 24 किलोमीटर पश्चिम में माचेरला सबसे नज़दीकी रेलवे स्टेशन है। वह संग्रहालय का खुलने का समय सुबह 10:00 बजे से शाम 5:00 बजे तक देता है। म्यूज़ियम्स ऑफ़ इंडिया की दूसरी सूची सुबह 9:00 से शाम 4:00 बजे तक देती है और खुले दिन रविवार से गुरुवार तथा शनिवार बताती है, शुक्रवार नहीं। यात्रा पत्रिकाएँ नाव के अलग-अलग समय और किराए देती हैं, और उनमें से किसी पर तारीख़ नहीं है, इसलिए यह लेख कोई नहीं देता। यात्रा से पहले नाव का कार्यक्रम आंध्र प्रदेश पर्यटन से और संग्रहालय का समय सर्वेक्षण के संग्रहालय से, पोर्टल पर दिए संपर्क नंबर पर, पूछ लें।

जो सर्वेक्षण बचा नहीं सका

ज़िन लिखती हैं कि खुदाइयाँ आज के मानकों पर खरी नहीं उतरती थीं और भारी समय-दबाव में की गई थीं, और घाटी से अब कोई नई सामग्री मिलने की उम्मीद करना व्यर्थ है। द प्रिंट बताता है कि 2015 में, जब जलाशय अपने न्यूनतम स्तर से नीचे गया, तो 200 से अधिक क़ब्रों वाला एक महापाषाण क़ब्रिस्तान फिर पानी के ऊपर आ गया। वह पत्थर के घेरों की तारीख़ लगभग 1000 ई.पू. से दूसरी सदी ई. तक की देने के लिए तेलंगाना के पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग का हवाला देता है।

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स्रोत और आगे पढ़ने के लिए

  1. Museums of India (Ministry of Culture): Archaeological Survey of India, Nagarjunakonda museum page
  2. Museums of India: Archaeological Museum, Nagarjunakonda
  3. Archaeological Survey of India, Indian Archaeology 1954-55: A Review (1955), Nagarjunakonda entry, Internet Archive
  4. Archaeological Survey of India, Indian Archaeology 1955-56: A Review, Nagarjunakonda entry (ASI Aurangabad Circle copy)
  5. Archaeological Survey of India, Indian Archaeology 1956-57: A Review, Nagarjunakonda entry (ASI Aurangabad Circle copy)
  6. Archaeological Survey of India, Indian Archaeology 1957-58: A Review, Nagarjunakonda entry (ASI Aurangabad Circle copy)
  7. Archaeological Survey of India, Indian Archaeology 1958-59: A Review, Nagarjunakonda entry (ASI Aurangabad Circle copy)
  8. Archaeological Survey of India, Indian Archaeology 1961-62: A Review, Satavahana inscription from Nagarjunakonda (ASI Aurangabad Circle copy)
  9. Monika Zin, Nagarjunakonda: Monasteries and Their School Affiliations, Acta Asiatica Varsoviensia 35 (2022)
  10. Disha Ahluwalia, ThePrint: The dead of Nagarjuna Sagar tell why India needs greater adoption of salvage archaeology (2 October 2023)
  11. Live History India: Nagarjunakonda's Secret
  12. ETV Bharat: Nagarjuna Sagar stands out as a temple of modern India (5 August 2026)

यह लेख AI उपकरणों की सहायता से शोधित और लिखा गया है, और सटीकता के लिए संपादित किया गया है। यह केवल सामान्य जानकारी और चर्चा के लिए है, पेशेवर सलाह नहीं। हमारे संपादकीय मानक और अस्वीकरण देखें। कोई त्रुटि मिली? हमें बताएँ।

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