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1863 में नामित आश्रम और 1901 में पाँच विद्यार्थियों के साथ शुरू हुआ टैगोर का विद्यालय, शांतिनिकेतन 17 सितंबर 2023 को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में दर्ज हुआ
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1863 में नामित आश्रम और 1901 में पाँच विद्यार्थियों के साथ शुरू हुआ टैगोर का विद्यालय, शांतिनिकेतन 17 सितंबर 2023 को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में दर्ज हुआ

फ़ोटो: Bodhisattwa / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0 (क्रॉप किया गया)

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रियाद में बैठी यूनेस्को की विश्व धरोहर समिति ने शांतिनिकेतन को मानदंड (iv) और (vi) पर सूची में दर्ज किया। सूचीबद्ध मुख्य क्षेत्र पश्चिम बंगाल के बीरभूम ज़िले में 537.73 हेक्टेयर के विश्व-भारती परिसर के भीतर 36 हेक्टेयर का है, और समिति के वक्तव्य में आश्रम, उत्तरायण और कला-भवन को उसके प्रमुख स्थल बताया गया है।

· · 10 मिनट का पठन

17 सितंबर 2023 को रियाद में बैठी विश्व धरोहर समिति ने पश्चिम बंगाल के शांतिनिकेतन को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में दर्ज किया। यह तारीख प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) ने दी है, और यूनेस्को के निर्णय में संपत्ति मानदंड (iv) और (vi) के तहत सूचीबद्ध है। सूचीबद्ध मुख्य क्षेत्र 36 हेक्टेयर का है, जो बीरभूम ज़िले में विश्व-भारती परिसर से मेल खाते 537.73 हेक्टेयर के बफ़र ज़ोन के भीतर आता है।

ट्रिब्यून में छपी पीटीआई की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इसे भारत की 41वीं विश्व धरोहर संपत्ति कहा। अगले दिन होयसल मंदिर दर्ज हुए, तो पीआईबी ने गिनती 42 बताई। उस सूची की कहानी बेलूर, हलेबीडु और सोमनाथपुर पर लिखे इस लेख में है।

यूनेस्को ने क्या दर्ज किया

समिति का वक्तव्य शांतिनिकेतन को एक आवासीय विद्यालय और कला का केंद्र कहता है, जो प्राचीन भारतीय परंपराओं और “धार्मिक और सांस्कृतिक सीमाओं से परे” मानवता की एकता की दृष्टि पर टिका है। वह रवींद्रनाथ टैगोर के शिक्षा-मॉडल को श्रेय देता है, जिसमें कक्षाएँ पेड़ों की छाँव में खुले आसमान के नीचे लगती थीं, और कहता है कि यह स्थान उनके इस विचार को साकार करता है कि “विश्व एक ही घोंसला बनेगा”।

मानदंड (iv), जो उत्कृष्ट समुच्चय के लिए है, इस बात पर टिका है कि यह बस्ती शिक्षा और सामुदायिक जीवन का एक प्रयोग थी। पाठ में जर्मन शब्द Gesamtkunstwerk आया है, यानी “संपूर्ण कलाकृति”, जहाँ जीवन, शिक्षा, श्रम और कला एक-दूसरे में गुँथे हैं, और उसमें तीन क्षेत्रों को प्रमुख स्थल बताया गया है: आश्रम, उत्तरायण और कला-भवन कला विद्यालय का क्षेत्र।

मानदंड (vi), जो विचारों और कलात्मक कृतियों से जुड़ाव के लिए है, टैगोर और बंगाल स्कूल ऑफ़ आर्ट के अग्रदूतों से इसके नाते पर टिका है। समिति के अनुसार, बंगाल के विभाजन की पृष्ठभूमि में (1905 का वह बँटवारा, जिसकी चर्चा लॉर्ड कर्ज़न पर लेख में है) शांतिनिकेतन कलात्मक और बौद्धिक नवजागरण का केंद्र बना। पाठ यह भी जोड़ता है कि महात्मा गांधी, नेहरू और इंदिरा गांधी समेत स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं पर इसकी “अमिट छाप” थी।

समिति के विशेषज्ञ सलाहकार ICOMOS के अनुसार, भारत ने शांतिनिकेतन को 20 जनवरी 2010 को अपनी संभावित सूची में रखा। एक पहला नामांकन समिति के विचार से पहले वापस ले लिया गया था, और पीआईबी के अनुसार संशोधित दस्तावेज़ जनवरी 2021 में विश्व धरोहर केंद्र को भेजा गया। ICOMOS का एक मिशन 24 से 28 अक्टूबर 2021 तक यहाँ आया, और संस्था ने 9 मार्च 2022 को अपनी रिपोर्ट मंज़ूर की, जिसमें मानदंड (iv) और (vi) पर दर्ज करने की सिफ़ारिश की गई थी।

दस्तावेज़ मानदंडों पर एकमत नहीं हैं। ICOMOS के अनुसार नामांकन मानदंड (ii) और (vi) पर किया गया था, उसने (ii) को पूरा होता हुआ नहीं माना, और (iv) का प्रस्ताव खुद रखा। पीआईबी की विज्ञप्ति कहती है कि संपत्ति का प्रस्ताव (iv) और (vi) के तहत हुआ था। ICOMOS की समझ में, दूसरी जगहों तक फैले टैगोर और उनके समकालीनों के विचार थे, वास्तुकला नहीं।

1863 में नामित एक आश्रम

इस स्थान की शुरुआत देबेंद्रनाथ टैगोर से हुई, जो रवींद्रनाथ के पिता थे और नोबेल पुरस्कार की जीवनी के शब्दों में ब्रह्म समाज के एक नेता थे, जो उन्नीसवीं सदी के बंगाल का एक सुधारवादी धार्मिक आंदोलन था। ICOMOS के अनुसार उन्होंने 1863 में आश्रम, यानी एकांतवास की जगह, स्थापित की और उसे यह नाम दिया। विश्वविद्यालय के अपने संक्षिप्त इतिहास के अनुसार, उसी साल उन्होंने रायपुर के ज़मींदार से बीस बीघा ज़मीन स्थायी पट्टे पर ली, एक घर बनवाया और उसे शांतिनिकेतन कहा, यानी “शांति का धाम”।

विश्वविद्यालय का छोटा इतिहास-पृष्ठ 1863 के भूखंड को सात एकड़ का बताता है, इसलिए विश्व-भारती के दोनों पाठ आकार पर एकमत नहीं हैं। ICOMOS जोड़ता है कि सबसे पुरानी आवासीय इमारत शांतिनिकेतन गृह 1858 और 1863 के बीच बनी। वह यह भी दर्ज करता है कि छतिम के पेड़ों से घिरा एक छोटा चबूतरा उस जगह को चिह्नित करता है जहाँ महर्षि ध्यान के लिए रुकते थे।

8 मार्च 1888 को देबेंद्रनाथ ने एक ट्रस्ट-विलेख पर हस्ताक्षर किए, जिसने आश्रम को उन लोगों के लिए समर्पित किया जो परमात्मा का ध्यान करना चाहते थे। विलेख ने परिसर के भीतर मूर्ति-पूजा की मनाही की और उसमें मेले के आयोजन और एक विद्यालय की स्थापना का ज़िक्र है। 1891 में उपासना मंदिर बना, लोहे और रंगीन काँच का एक प्रार्थना भवन, जिसे काँच का मंदिर भी कहा जाता है।

दिसंबर 1901 और पाँच विद्यार्थी

रवींद्रनाथ टैगोर ने अपना विद्यालय, ब्रह्मचर्याश्रम, पाँच विद्यार्थियों के साथ शुरू किया। विश्वविद्यालय के अनुसार इसकी औपचारिक शुरुआत 22 दिसंबर 1901 को हुई, और 1925 में इसका नाम बदलकर पाठ-भवन कर दिया गया। यूनेस्को का पाठ स्थापना को 1901 का बताता है, और ICOMOS के अनुसार टैगोर ने इसे गुरुकुल परंपरा पर आधारित किया, जिसमें विद्यार्थी अपने गुरु के साथ रहकर सीखते हैं।

कक्षाएँ पेड़ों के नीचे खुले में लगती थीं, और पाठ्यक्रम में संगीत, चित्रकला और नाटक शामिल थे। विश्वविद्यालय द्वारा उद्धृत अपने निबंध “एक कवि का विद्यालय” में टैगोर विद्यालय शुरू करने को “शब्दों से अलग किसी माध्यम में एक कविता” लिखना बताते हैं। ICOMOS जोड़ता है कि बढ़ईगीरी, बुनाई और जिल्दसाज़ी का प्रशिक्षण शैक्षणिक विषयों और सामूहिक गायन के साथ चलता था।

बंगाल स्कूल ऑफ़ आर्ट के चित्रकार नंदलाल बोस 1919 में कला पढ़ाने आए, और उनके अधीन कला-भवन का विकास हुआ। ICOMOS के अनुसार संगीत विद्यालय, संगीत-भवन, 1934 में अपने भवन में गया, जबकि विश्वविद्यालय का इतिहास कहता है कि 1933 में एक अलग संगीत संस्थान स्थापित हुआ। विद्यालय का नाता टैगोर के नोबेल पुरस्कार और नाइटहुड से मुक्त किए जाने की माँग करने वाले उनके 1919 के पत्र से कैसे जुड़ता है, यह टैगोर के प्रोफ़ाइल में बताया गया है।

विद्यालय से विश्व विश्वविद्यालय तक

यूनेस्को का पाठ कहता है कि 1921 में शांतिनिकेतन में एक “विश्व विश्वविद्यालय” स्थापित हुआ। विश्वविद्यालय का इतिहास दो तारीखें देता है: वह कहता है कि विश्व-भारती की स्थापना 1918 में हुई और उसका औपचारिक उद्घाटन दिसंबर 1921 में हुआ। टैगोर का अपने बेटे रथींद्रनाथ को लिखा 1916 का एक पत्र, जिसे विश्वविद्यालय उद्धृत करता है, कहता है कि विद्यालय को भारत को दुनिया से जोड़ने वाला सूत्र बनना चाहिए। विश्वविद्यालय विश्व-भारती का आदर्श-वाक्य इस रूप में प्रस्तुत करता है: “जहाँ विश्व एक नीड़ में मिलता है”।

विश्वविद्यालय के अनुसार, सुरूल में ग्रामीण पुनर्निर्माण का केंद्र श्रीनिकेतन 1922 में आया, और ग्रामीण पुनर्निर्माण संस्थान 1923 में स्थापित हुआ। विश्वविद्यालय यह भी दर्ज करता है कि चीना-भवन, चीन-भारत अध्ययन का विभाग, 1937 में चीन सरकार की सहायता से स्थापित हुआ, और सिल्वां लेवी जैसे शिक्षक विदेश से आए।

टैगोर का निधन 1941 में हुआ। 1940 में उन्होंने गांधी को लिखा था कि वे इस संस्था को अपने संरक्षण में ले लें, और इसे ऐसा पात्र कहा था जो “मेरे जीवन की सबसे अच्छी निधि का माल ढोता है”। 9 मई 1951 के विश्व-भारती अधिनियम ने इसे राष्ट्रीय महत्व की संस्था घोषित किया और इसके एकात्मक, शिक्षण और आवासीय विश्वविद्यालय के रूप में चलने का प्रावधान किया। अधिनियम की धारा 8 के अनुसार विश्वविद्यालय लिंग, राष्ट्रीयता, नस्ल, पंथ, जाति या वर्ग के भेद के बिना सभी के लिए खुला है। उसकी वेबसाइट भारत के राष्ट्रपति को विज़िटर और प्रधानमंत्री को आचार्य, यानी कुलाधिपति, बताती है।

36 हेक्टेयर के भीतर क्या खड़ा है

ICOMOS के अनुसार छत्तीस इमारतें प्रमुख विशेषताओं में गिनी जाती हैं, और उनके साथ भित्तिचित्र, मूर्तियाँ, एक झील, उद्यान, मंडप और चबूतरे भी हैं। फ़रवरी 2022 में संबंधित पक्ष-राज्य ने 21 भू-दृश्य तत्वों, 18 मूर्तियों, 34 भित्तिचित्रों, पाँच चबूतरों या मंडपों और चार इमारतों के भीतरी हिस्सों की सूची दी।

उत्तरायण आश्रम के उत्तर में है, जिसकी शुरुआत 1919 में मिट्टी-ईंट की दो इमारतों से हुई थी। उनमें से एक, कोणार्क, आज भी खड़ी है। ICOMOS के अनुसार ये घर मिट्टी की दीवारों के गर्मी सँभालने के प्रयोग दिखाते हैं, और तीन मंज़िला उदयन, जहाँ टैगोर मेहमानों से मिलते थे, स्थानीय परंपराओं को पश्चिमी आधुनिकतावाद से मिलाता है। ऊँचे मंडप जैसा घर उदीची उनके लिए बनी आख़िरी इमारत थी। 1920 के दशक में बागवानी-विशेषज्ञ रथींद्रनाथ टैगोर ने अफ़्रीका और लैटिन अमेरिका से मँगाए पौधों से उद्यान सजाए। ICOMOS के अनुसार आगंतुक उन पाँच घरों में जा सकते हैं जहाँ टैगोर अपने आख़िरी चार दशकों में रहे।

कला-भवन का क्षेत्र उत्तरायण के पश्चिम में है। कई प्रमुख इमारतें सुरेंद्रनाथ कर ने बनवाईं, जो टैगोर और नंदलाल बोस के साथ यात्राओं पर जाते थे। यूनेस्को निर्माण-सामग्री में ईंट, मिट्टी, कोलतार, जीवित पेड़, बलुआ पत्थर, काँच, ढलवाँ लोहा, फूस, लकड़ी, बाँस, लेटराइट और कंक्रीट गिनाता है, और कहता है कि प्रभावों में जापानी, चीनी, फ़ारसी, बालिनी और बर्मी कार्य के साथ आर्ट डेको भी है। जिन विश्वविद्यालय-संपत्तियों से ICOMOS ने इस स्थल की तुलना की, उनमें नालंदा है, जिसका वर्णन नालंदा पर लेख में है, और मुंबई विश्वविद्यालय।

पौष मेला और उत्सव

यूनेस्को का पाठ “चलते आ रहे उत्सवों और परंपराओं” का ज़िक्र करता है और कहता है कि उत्सवों में फूलों, अल्पना (फ़र्श की चित्रकारी), वैदिक पाठ और शंखों का प्रयोग होता है। न समिति का पाठ और न ICOMOS की रिपोर्ट पौष मेले का नाम लेती है, इसलिए मेला किसी नामित विशेषता में नहीं आता, और पाठ सामान्य रूप से मौसमी उत्सवों की बात करते हैं। ICOMOS के अनुसार शांतिनिकेतन और श्रीनिकेतन के उत्सवों में बड़ी भीड़ जुटती है, और ज़्यादातर यात्राएँ हर साल चार महीनों की एक अवधि में होती हैं।

विश्वविद्यालय का पौष मेला पृष्ठ मेले को ब्रह्म पंचांग से जोड़ता है। वह कहता है कि देबेंद्रनाथ ने 21 दिसंबर 1843 को ब्रह्म धर्म स्वीकार किया, जो बंगाली पंचांग में 7 पौष था, और काँच के मंदिर की स्थापना 21 दिसंबर 1891 को हुई, जो भी 7 पौष था। पृष्ठ के अनुसार 1894 में वर्षगाँठ पर एक छोटा मेला लगा था। विश्वविद्यालय का संक्षिप्त इतिहास 1895 देता है, जबकि दप्रिंट और ईटीवी भारत दोनों कहते हैं कि देबेंद्रनाथ ने मेला 1894 में शुरू किया।

ईटीवी भारत के अनुसार मेला लगभग 1961 में अपने मौजूदा मैदान, पूर्व पल्ली, में आया। दप्रिंट के अनुसार 1951 से विश्वविद्यालय इसे शांतिनिकेतन ट्रस्ट के साथ मिलकर आयोजित करता है। कोविड-19 ने 2020 और 2021 में मेला रोका, और बुनियादी ढाँचे की दिक़्क़तों ने 2022 में। दप्रिंट जोड़ता है कि 2023 में ज़िला प्रशासन ने एक छोटा शीतकालीन मेला चलाया। ईटीवी भारत के विवरण के अनुसार मेला 2024 में विश्वविद्यालय के तहत फिर शुरू हुआ, और उसकी दिसंबर 2025 की रिपोर्ट कार्यक्रम को पूर्व पल्ली में 23 से 28 दिसंबर का बताती है।

वे नौ कदम जिन पर विचार करने को समिति ने भारत से कहा

समिति के निर्णय में दर्ज है कि पिछले दशक में संस्थागत साझेदारियों के ज़रिये संरक्षण की स्थिति सुधरी है। वह भारत से नौ कदमों पर विचार करने को भी कहता है। ये हैं: 1951 के अधिनियम से आगे जाकर मज़बूत क़ानूनी संरक्षण, परिसर की एक मास्टर योजना, एक एकीकृत सूची, हर विशेषता के लिए संरक्षण योजनाएँ, बफ़र ज़ोन की नज़दीकी निगरानी, औपचारिक विरासत प्रभाव आकलन, आपदा जोखिम की रणनीति, महामारी के बाद की आगंतुक योजना, और समुदाय की अधिक भागीदारी।

ICOMOS क़ानूनी बिंदु समझाता है। विश्व-भारती अधिनियम परिसर की रक्षा करता है, 2005 के एक सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले ने वहाँ अनुपयुक्त विकास पर रोक लगाई, और विश्व-भारती विरासत समिति प्रस्तावों की समीक्षा करती है। फिर भी किसी इमारत की केंद्रीय या राज्य विरासत क़ानून के तहत अलग सूची नहीं है। संबंधित पक्ष-राज्य ने ICOMOS को बताया कि अधिनियम सर्वोच्च स्तर का संरक्षण देता है क्योंकि वह राष्ट्रीय क़ानून है। ICOMOS की राय में यह व्यवस्था पर्याप्त है, और वह इस पर बहुत हद तक निर्भर करती है कि सरकार के सभी स्तर संस्था का कितना सम्मान करते हैं, विश्व-भारती प्रशासन की मंशा पर, और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण जैसी एजेंसियों पर।

रिपोर्ट बाइपास सड़कों, बफ़र ज़ोन के पास के विकास और आगंतुकों से पैदा दबावों को दर्ज करती है, और बताती है कि परिसर के दो प्रस्तावित विकास कार्य विश्व-भारती ने रद्द कर दिए थे। ICOMOS के अनुसार 2021 में नामांकित क्षेत्र के भीतर करीब 4,619 लोग रहते थे, और क्षेत्र और बफ़र ज़ोन को मिलाकर 7,414। समिति का पाठ कहता है कि संपत्ति की सीमा के भीतर कोई नया विकास मंज़ूर नहीं होगा और सभी संरक्षण परियोजनाओं की निगरानी विश्व-भारती विरासत समिति करेगी।

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स्रोत और आगे पढ़ने के लिए

  1. UNESCO World Heritage Centre: Santiniketan (list entry 1375, brief synthesis, criteria, integrity, authenticity, 36 ha and 537.73 ha)
  2. UNESCO World Heritage Committee, Decision 45 COM 8B.10: Santiniketan (India)
  3. ICOMOS evaluation of the Santiniketan nomination (No 1375), approved 9 March 2022, UNESCO World Heritage Centre document 205658
  4. Press Information Bureau, Government of India: India inscribes 2 properties on the UNESCO World Heritage List at Riyadh (September 2023)
  5. The Visva-Bharati Act, 1951 (Act No. 29 of 1951), consolidated text
  6. Visva-Bharati: History (Debendranath Tagore's retreat, Brahmacharyasrama from 22 December 1901)
  7. Visva-Bharati: Santiniketan and Visva-Bharati, a Brief History (PDF)
  8. Visva-Bharati: Poush Mela
  9. Visva-Bharati: About Visva-Bharati (status, Visitor, Rector, Acharya)
  10. Nobel Prize: Rabindranath Tagore, biographical
  11. The Tribune (PTI), 18 September 2023: India's Santiniketan inscribed on UNESCO World Heritage List
  12. Business Standard, 18 September 2023: Understanding UNESCO World Heritage List, selection and global impact
  13. ThePrint, 13 November 2024: Santiniketan to host century-old Poush Mela after four years
  14. ETV Bharat, December 2025: Visva-Bharati's historic Poush Mela returns with anti-pollution measures

यह लेख AI उपकरणों की सहायता से शोधित और लिखा गया है, और सटीकता के लिए संपादित किया गया है। यह केवल सामान्य जानकारी और चर्चा के लिए है, पेशेवर सलाह नहीं। हमारे संपादकीय मानक और अस्वीकरण देखें। कोई त्रुटि मिली? हमें बताएँ।

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