चित्रण: tuput
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मेट्टुपालयम से उदगमंडलम (ऊटी) तक की यह लाइन 326 मीटर से 2,203 मीटर तक ऊपर चढ़ती है, और इसके सबसे तीखे हिस्से में इंजन के नीचे लगा दाँतेदार पहिया एक दाँतेदार पटरी को पकड़ता है। यूनेस्को ने 2005 में इसे भारत की पर्वतीय रेलवे की सूची में जोड़ा।
नीलगिरि माउंटेन रेलवे मेट्टुपालयम से, जो समुद्र तल से 326 मीटर ऊपर है, उदगमंडलम तक 46 किमी चलती है। उदगमंडलम वही पहाड़ी कस्बा है जिसे ज़्यादातर लोग ऊटी कहते हैं, और वह 2,203 मीटर की ऊँचाई पर है। यानी एक इकहरी पटरी पर 1,877 मीटर की चढ़ाई, जिसकी दोनों पटरियों के बीच सिर्फ़ एक मीटर का फ़ासला है, और सुबह की नियमित ट्रेन इसमें करीब पाँच घंटे लगाती है।
सबसे तीखे हिस्से में चलने वाली पटरियों के बीच बिछी एक दाँतेदार पटरी इंजन के नीचे लगे दाँतेदार पहिये से जुड़ जाती है। इसे रैक-एंड-पिनियन कहा जाता है। इंडियन रेलवेज़ फ़ैन क्लब पर रखा गया इंडियन स्टीम रेलवे सोसाइटी का एक लेख इसे भारत की इकलौती मीटर गेज पहाड़ी लाइन बताता है जो इस तरह चलती है, और यूनेस्को ने 2005 में इसे भारत की पर्वतीय रेलवे की विश्व धरोहर सूची में जोड़ा।
1854 के प्रस्ताव से 1891 की पहली कुदाल तक
यूनेस्को के ब्योरे के अनुसार इस लाइन का प्रस्ताव पहली बार 1854 में रखा गया था, और पहाड़ी ज़मीन की वजह से काम 1891 तक टलता रहा। लाइन का एक 1908 का ब्योरा, जो इंडियन रेलवेज़ फ़ैन क्लब ने दोबारा छापा है, बीच के सालों की कड़ियाँ जोड़ता है। 1876 में स्विस इंजीनियर रिगेनबाख ने रिगी रैक के ढंग की लाइन बनाने की पेशकश की, और सरकार ने मना कर दिया। 1880 में उन्होंने और ज़िला इंजीनियर मेजर मोरेंट ने मिलकर एक रैक रेलवे की लागत का हिसाब लगाया।
फ़िबिस (FIBIS) के रिकॉर्ड के अनुसार नीलगिरि रेलवे कंपनी 30 सितंबर 1885 को पंजीकृत हुई। मद्रास के गवर्नर लॉर्ड वेनलॉक ने अगस्त 1891 में पहली कुदाल चलाई। कंपनी अप्रैल 1894 में परिसमापन में चली गई, और फ़रवरी 1896 में एक नई कंपनी ने काम सँभाला, जिसे मुफ़्त ज़मीन मिली और निर्माण के दौरान उसकी पूँजी पर 3% मुनाफ़े की सरकारी गारंटी भी। यह उस गारंटी का छोटा रूप है जिसका ज़िक्र हमारे लेख भारत की रेलवे के लिए पैसा किसने दिया में आया है।
पहाड़ी रेल को दाँतेदार पटरी क्यों चाहिए
1908 का ब्योरा लाइन की सबसे तीखी ढलान 1 में 12½ बताता है, यानी हर 12.5 मीटर पटरी पर एक मीटर की चढ़ाई, जो मेट्टुपालयम से पाँच मील दूर कल्लार से शुरू होती है। भारतीय रेलवे के हेरिटेज निदेशालय के अनुसार साधारण रेलवे सिर्फ़ पहियों की पकड़ पर करीब 1 में 14.5 की ढलान तक चल सकती है, इसलिए इससे तीखे हिस्सों में कुछ और चाहिए था।
चुनी गई प्रणाली एब्ट रैक थी, जिसे 1908 का ब्योरा रिगी सिद्धांत का सुधरा हुआ रूप कहता है। इंडियन स्टीम रेलवे सोसाइटी का एक लेख रैक वाले हिस्से की औसत ढलान 1 में 12.28 बताता है, और एक्स क्लास इंजनों पर लिखा एक ब्योरा रैक की लंबाई 20 किमी देता है, कल्लार से कुन्नूर तक। हेरिटेज निदेशालय के अनुसार ट्रेन करीब 13 किमी प्रति घंटे की रफ़्तार से चढ़ती है।
रास्ते में 16 सुरंगें हैं, और हेरिटेज निदेशालय 250 से ज़्यादा पुल गिनता है। दूसरी छपी गिनतियाँ अलग हैं: ऑनमनोरमा की 2025 की गाइड 206 पुल बताती है। लाइन के स्टेशनों पर गूगल आर्ट्स एंड कल्चर की एक कहानी कहती है कि इसे बनाने के लिए ठोस ग्रेनाइट काटना पड़ा, और हेरिटेज निदेशालय ने दर्ज किया है कि कई सुरंगें बिना अस्तर की कठोर चट्टान में हैं।
1899 में कुन्नूर, 1908 में ऊटी
पहला हिस्सा, मेट्टुपालयम से कुन्नूर तक 27 किमी, 15 जून 1899 को खुला, और मद्रास रेलवे ने एक करार के तहत उसे चलाया। फ़ैन क्लब पर रखा सोसाइटी का लेख कहता है कि लाइन का मक़सद अफ़सरों को ऊटाकमंड (ऊटी की अंग्रेज़ी वर्तनी) तक पहुँचाना और नीलगिरि की चाय को पश्चिमी तट के बंदरगाहों तक ले जाना था।
कमाई कम रही। सरकार ने लाइन 1 जनवरी 1903 को 35 लाख रुपये (फ़िबिस के अनुसार 235,000 पाउंड) में खरीदी, जबकि उस पर 48 लाख खर्च हो चुके थे। 1908 का ब्योरा दर्ज करता है कि शुद्ध आमदनी खरीद की कीमत पर बस 2% से ज़रा ऊपर ब्याज चुका रही थी, और भूस्खलन की वजह से रखरखाव महँगा था।
कुन्नूर से ऊटी तक के 19 किमी के विस्तार में रैक नहीं है। 1908 के ब्योरे के अनुसार उसकी सबसे तीखी ढलान 1 में 25 है। उसने लागत का अनुमान 24,40,000 रुपये लगाया था और कहा है कि सेना की रेजिमेंटों, 61वीं और 64वीं पायनियर्स, ने ठेके पर ज़्यादातर मिट्टी का काम किया। फ़िबिस आर. आर. गेल्स को लोक निर्माण विभाग का मुख्य इंजीनियर बताता है। हेरिटेज निदेशालय के अनुसार लाइन 1908 में ऊटाकमंड पहुँची, और यूनेस्को 1908 को पूरा होने का साल देता है।
इसलिए 1899 और 1908 दोनों सही हैं, अलग-अलग हिस्सों के लिए। यूनेस्को का पाठ कहता है कि रेलवे “उस समय की सबसे नई तकनीक का प्रतिनिधित्व करती थी।“
स्विस इंजन और आज क्या चलता है
रैक पर चलने वाले भाप के इंजन एक्स क्लास के हैं। इंडियन स्टीम रेलवे सोसाइटी का ब्योरा कहता है कि विंटरथुर की स्विस लोकोमोटिव एंड मशीन वर्क्स ने ऐसे 12 इंजन दो खेपों में बनाए, सात जो 1920 से 1925 के बीच सेवा में आए और पाँच 1952 में, और लेख लिखे जाने के समय सब कुन्नूर शेड में तैनात थे। ये चार सिलिंडर वाले कंपाउंड इंजन हैं: ऊँचे दबाव वाली जोड़ी साधारण पहियों को चलाती है, और उसके ऊपर की कम दबाव वाली जोड़ी उन दाँतेदार पहियों को, जो रैक को पकड़ते हैं।
सबसे पुराने इंजनों की तारीखें तय नहीं हैं। राष्ट्रीय रेल संग्रहालय के अनुसार एक्स-37385 स्विट्ज़रलैंड से 1921 में मँगाया गया था और उसका वज़न 48.9 टन है। डेक्कन क्रॉनिकल ने 2019 में बताया कि इंजन नंबर 37384 स्विट्ज़रलैंड में 1914 में बना था और 1918 में इस लाइन पर सेवा में आया।
शुरू में ईंधन कोयला था। सोसाइटी का लेख कहता है कि 2002 और 2003 के दौरान एक इंजन को फ़र्नेस ऑयल पर चलने लायक बदला गया, और हेरिटेज निदेशालय के अनुसार स्विस-निर्मित ज़्यादातर इंजन तब से बदले जा चुके हैं, और तिरुचिरापल्ली की गोल्डन रॉक कार्यशाला में चार नए तेल से चलने वाले इंजन बने हैं। रेलपोस्ट ने बताया कि गोल्डन रॉक ने कोयले से चलने वाला एक एक्स क्लास इंजन, एक्स-37400, बनाया, जिसे दक्षिण रेलवे के महाप्रबंधक जॉन थॉमस ने 25 अगस्त 2021 को हरी झंडी दिखाई। वह 10.38 मीटर लंबा है और उसका वज़न 50 टन है।
हेरिटेज निदेशालय के अनुसार रैक पर सिर्फ़ ख़ास तौर पर लैस भाप के इंजन चल सकते हैं, और फ़िबिस कहता है कि डीज़ल इंजन सिर्फ़ कुन्नूर और ऊटी के बीच गाड़ियाँ खींच सकते हैं। राष्ट्रीय रेल संग्रहालय का 1919 में बने एक नीलगिरि डिब्बे का ब्योरा कहता है कि डिब्बों में अब भी हाथ से लगने वाले यांत्रिक ब्रेक हैं, हर डिब्बे पर एक ब्रेकमैन के साथ।
लाइन यूनेस्को की सूची में कैसे पहुँची
जुलाई 2024 में डाला गया प्रेस इन्फ़ॉर्मेशन ब्यूरो का भारत के यूनेस्को स्थलों पर एक दस्तावेज़ भारत की पर्वतीय रेलवे को 1999, 2005 और 2008 के पंजीकरण वर्षों के साथ सूचीबद्ध करता है। दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे 1999 में सबसे पहले आई। नीलगिरि लाइन 2005 में जुड़ी, और कालका शिमला रेलवे 2008 में।
यूनेस्को की 15 जुलाई 2005 की ख़बर कहती है कि दक्षिण अफ़्रीका के डरबन में बैठी विश्व धरोहर समिति ने उस दिन छह मौजूदा स्थलों का विस्तार किया, जिनमें भारत की पर्वतीय रेलवे भी थी। प्रेस इन्फ़ॉर्मेशन ब्यूरो का दस्तावेज़ जोड़ता है कि तीनों रेलवे आज भी पूरी तरह चालू हैं।
2026 में गाड़ियाँ और समय
कर्ली टेल्स की फ़रवरी 2026 के किराया संशोधन की रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण रेलवे रोज़ करीब आठ नियमित फेरे चलाती है। डीटी नेक्स्ट ने 8 मार्च 2026 को बताया कि नियमित ट्रेन आम तौर पर मेट्टुपालयम से सुबह 7:10 बजे चलती है और दोपहर के आसपास ऊटी पहुँचती है। हेरिटेज निदेशालय का एक बिना तारीख़ का पन्ना कहता है कि मेट्टुपालयम और कुन्नूर के बीच रैक वाले हिस्से पर हर दिशा में सिर्फ़ एक ट्रेन चलती है, जिसका समय चेन्नई से आने वाली नीलगिरि एक्सप्रेस से जुड़ने के हिसाब से रखा गया है।
डीटी नेक्स्ट के अनुसार 2026 में एक समर स्पेशल भी चला, 27 मार्च से 5 जुलाई तक। मेट्टुपालयम से ऊटी की ट्रेन शुक्रवार और रविवार को चलती थी, सुबह 9:10 बजे रवाना होकर दोपहर 2:25 बजे पहुँचती थी। वापसी शनिवार और सोमवार को होती थी, ऊटी से सुबह 11:25 बजे चलकर शाम 4:20 बजे पहुँचती थी। अधिकारियों ने कहा कि भारी माँग की वजह से बहुत से यात्री टिकट नहीं ले पाए। यह स्पेशल इस साल के लिए ख़त्म हो चुका है, और यह 2027 में लौटेगा या नहीं, इसकी घोषणा दक्षिण रेलवे को करनी है।
रिपोर्टें इस पर एकमत नहीं हैं कि आम दिन की ट्रेन को क्या खींचता है। हेरिटेज निदेशालय रैक पर भाप का वर्णन करता है, जबकि द न्यूज़ मिनट ने दिसंबर 2019 में बताया कि लाइन आम तौर पर डीज़ल पर चलती थी और भाप सिर्फ़ कभी-कभार इस्तेमाल होती थी। हम कोई मौजूदा आधिकारिक बयान नहीं खोल पाए, इसलिए अगर आपके लिए भाप मायने रखती है, तो दक्षिण रेलवे से पूछ लें। खोजते समय स्टेशन कोड ऊटी के लिए UAM और कुन्नूर के लिए ONR हैं।
किराया, बुकिंग और रद्दीकरण
नीचे के व्यावहारिक ब्योरे हमने 8 अक्टूबर 2026 को दक्षिण रेलवे की घोषणाओं पर आई ख़बरों से मिलाकर जाँचे। दक्षिण रेलवे के अपने पन्ने और आईआरसीटीसी का बुकिंग पन्ना हमारे लिए खुले नहीं, इसलिए यात्रा से पहले दोनों से पुष्टि कर लें।
कर्ली टेल्स के अनुसार दक्षिण रेलवे ने शनिवार, 21 फ़रवरी 2026 से नियमित गाड़ियों का मूल किराया 5% बढ़ाया। विशेष गाड़ियाँ और चार्टर सेवाएँ इसमें शामिल नहीं थीं, और आरक्षण शुल्क नहीं बदला। रिपोर्ट के मुताबिक़ नियमित किराए 18 फ़रवरी 2020 से नहीं बदले थे, और मेट्टुपालयम और कुन्नूर के बीच का ढुलाई शुल्क 200% से ज़्यादा बढ़ा था। कर्ली टेल्स दूसरी श्रेणी का किराया मेट्टुपालयम से कुन्नूर के लिए 200 रुपये और कुन्नूर से ऊटी के लिए 160 रुपये बताता है। हमें कोई आधिकारिक किराया तालिका नहीं मिली, इसलिए इन्हें सांकेतिक मानें और बुकिंग के समय दिखने वाला किराया देख लें।
ऑनमनोरमा की 2025 की गाइड कहती है कि टिकट भारतीय रेलवे की वेबसाइट से या जिस स्टेशन से चढ़ना हो वहाँ के काउंटर से लिए जा सकते हैं, और काउंटर पर एक घंटा पहले पहुँचने की सलाह देती है। 1 नवंबर 2024 से भारतीय रेलवे ने अग्रिम आरक्षण यात्रा की तारीख़ से 60 दिन पहले तक सीमित कर दिया है, कुछ दिन की एक्सप्रेस गाड़ियों और विदेशी पर्यटकों को छोड़कर, जिनके लिए 365 दिन बने हुए हैं। कोई ख़ास नीलगिरि ट्रेन इस आम नियम पर चलती है या नहीं, यह बुकिंग पन्ने पर दिखता है।
मौसम गाड़ियाँ रद्द करा देता है। ऑनमनोरमा ने बताया कि 2 जनवरी 2026 को सेलम मंडल ने भूस्खलन के बाद कुन्नूर और उदगमंडलम के बीच की सारी सेवाएँ रद्द कर दीं, और उस दिन कुन्नूर में 215 मिमी बारिश दर्ज हुई।
स्रोत और आगे पढ़ने के लिए
- PIB: UNESCO World Heritage Sites in India, Mountain Railways of India entry (July 2024)
- UNESCO World Heritage Centre: 17 cultural sites inscribed, extensions include Mountain Railways of India (15 July 2005)
- Heritage Directorate, Indian Railways: From track to incline, the one-of-a-kind Nilgiri Mountain Railway
- National Rail Museum on Google Arts & Culture: Geared to overcome Asia's steepest climbs (X-37385 and a Nilgiri coach)
- Google Arts & Culture: Nilgiri Mountain Railway, station masters at Hillgrove and Udhagamandalam
- Indian Railways Fan Club: The Nilgiri Railway (1908 district gazetteer account)
- Indian Railways Fan Club: The Nilgiri Mountain Railway (Indian Steam Railway Society article)
- Indian Railways Fan Club: Steam in history, the Nilgiri rack locomotives (X class)
- FIBIS wiki: Nilgiri Mountain Railway (dates, company and engineer records)
- Deccan Chronicle: Plea for Swiss steam loco in Nilgiri Mountain Railway (11 September 2019)
- RailPost: New steam locomotive for Nilgiri Mountain Railway reaches Mettupalayam (6 September 2021)
- The News Minute: Ooty heritage train resumes service after landslides (10 December 2019)
- Curly Tales: Nilgiri Mountain Railway fare increased from February 21 (updated 22 February 2026)
- DT Next: Summer special Nilgiri Mountain Railway between Mettupalayam and Ooty from March 27 (8 March 2026)
- Onmanorama: Ooty to Mettupalayam summer special toy train service, how to book (11 March 2025)
- Onmanorama: Indian Railways advance reservation period cut from 120 to 60 days (17 October 2024)
- Onmanorama: Nilgiri Mountain Railway services cancelled after rain and landslips (2 January 2026)
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