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दिल्ली का लाल क़िला 1639 से 1648 के बीच नौ साल में बना, 2007 से यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है, और हर स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री यहीं झंडा फहराते हैं
प्राचीन और मध्यकालीन भारत

दिल्ली का लाल क़िला 1639 से 1648 के बीच नौ साल में बना, 2007 से यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है, और हर स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री यहीं झंडा फहराते हैं

फ़ोटो: Biswarup Ganguly / Wikimedia Commons, CC BY 3.0 (क्रॉप किया गया)

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यूनेस्को ने 2007 में लाल क़िला परिसर को मानदंड (ii), (iii) और (vi) के तहत दर्ज किया, और उसकी सलाहकार संस्था इकोमोस क़िले का निर्माण अप्रैल 1639 से 1648 तक बताती है। दिसंबर 2003 में सेना के सौंपने के बाद से इसका प्रबंधन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पास है, और पहले प्रधानमंत्री ने यहाँ 16 अगस्त 1947 को राष्ट्रीय ध्वज फहराया था।

· · 11 मिनट का पठन

दिल्ली का लाल क़िला परिसर 2007 से यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में है, तीन मानदंडों (ii), (iii) और (vi) के तहत दर्ज। यह 49.18 हेक्टेयर में फैला है, जिसके साथ 43.43 हेक्टेयर का बफ़र ज़ोन है, और मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने इसे अपनी नई राजधानी शाहजहाँनाबाद के महल-क़िले के रूप में बनवाया। इकोमोस, यानी वह संस्था जिसने नामांकन पर यूनेस्को को सलाह दी, निर्माण की अवधि अप्रैल 1639 से 1648 बताती है।

यूनेस्को के वर्णन के अनुसार क़िले का नाम उसकी लाल बलुआ पत्थर की विशाल घेरने वाली दीवारों पर पड़ा है, और वह एक पुराने क़िले सलीमगढ़ के बगल में खड़ा है, जिसे इस्लाम शाह सूरी ने 1546 में बनवाया था। दोनों मिलकर परिसर बनाते हैं। इकोमोस के अनुसार इसका स्वामित्व संस्कृति मंत्रालय के पास है, और यूनेस्को के अनुसार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) इसका सीधे प्रबंधन करता है।

बनने में नौ साल, और तारीख़ें जो पूरी तरह मेल नहीं खातीं

एएसआई के अनुसार शाहजहाँ ने 1638 में अपनी राजधानी आगरा से दिल्ली स्थानांतरित की और दिल्ली के सातवें शहर शाहजहाँनाबाद की नींव रखी। क़िले का काम, वह कहता है, 1639 में शुरू हुआ और नौ साल बाद ख़त्म हुआ। अप्रैल 1639 से 1648 इकोमोस के मूल्यांकन की अवधि है। ब्रिटैनिका शाहजहाँ का राजधानी दिल्ली ले जाना 1648 में बताता है, और इतिहासकार शशांक शेखर सिन्हा, द वायर में लिखते हुए, क़िले के निर्माण के लिए 1638 से 1649 देते हैं।

इकोमोस के अनुसार इसका पहला नाम क़िला-ए-मुबारक था, यानी शुभ दुर्ग। पर्यटन मंत्रालय की साइट इंक्रेडिबल इंडिया इसके डिज़ाइन का श्रेय वास्तुकार उस्ताद अहमद लाहौरी को देती है, जिनके बारे में वह कहती है कि उन्होंने ताज महल का भी डिज़ाइन बनाया। वही साइट क्षेत्रफल 255 एकड़ बताती है, जो यूनेस्को के 49.18 हेक्टेयर (लगभग 121 एकड़) से मेल नहीं खाता; दर्ज आँकड़ा यूनेस्को का है, जो पंजीकरण के अभिलेख में है।

इकोमोस के अनुसार यह पहला मुग़ल महल-क़िला था जो एक अष्टकोणीय योजना के भीतर ज्यामितीय जाल पर बिछाया गया, और जो एक अष्टकोणीय शहर के भीतर स्थित था। मुख्य निर्माण सामग्री बलुआ पत्थर या संगमरमर से मढ़ी ईंट थी, और अपने चरम पर दरबार में लगभग 3,000 लोग रहते थे। भारत के डोज़ियर में की गई तुलना ने इसे लाहौर, आगरा और फ़तेहपुर सीकरी के पहले के मुग़ल विश्व धरोहर स्थलों के बगल में रखा, और इकोमोस इस नतीजे पर पहुँचा कि लाल क़िला “मुग़ल वास्तुकला में प्रगति का प्रतिनिधित्व करता है”।

लाहौरी गेट से भीतर चलते हुए

इकोमोस के अनुसार आगंतुक और स्वयं बादशाह लाहौरी गेट से भीतर आते थे, जो औपचारिक सार्वजनिक प्रवेशद्वार था। उसमें दो अर्ध-अष्टकोणीय बुर्जों के बीच तीन मंज़िलें हैं, जिनके ऊपर सफ़ेद गुंबदों वाली सात मेहराबों की क़तार है। सैनिक और क़िले में काम करने वाले लोग दक्षिण के दिल्ली गेट का उपयोग करते थे।

लाहौरी गेट से आगंतुक छत्ता चौक में पहुँचता है, एक मेहराबदार गलियारा जो महल का बाज़ार था, और फिर नौबत ख़ाने में, यानी नगाड़ा घर, जहाँ संगीतकार भव्य आगमन का स्वागत करते थे। इकोमोस कहता है कि इस जगह के आगे सिर्फ़ शहज़ादे घोड़े पर सवार होकर आ सकते थे।

दीवान-ए-आम, यानी आम दरबार का दालान, तीन पंक्तियों की गहराई वाला आयताकार दालान है, जिसके अग्रभाग में नौ मेहराबें हैं। पीछे के एक आले में शाही सिंहासन संगमरमर की छतरी के नीचे खड़ा था, जिसमें पिएत्रा ड्यूरा नाम की तकनीक से रंगीन पत्थर जड़े थे।

दालान के पीछे रंग महल है, यानी चित्रित महल, जिसका नाम उसके रंगीन भीतरी हिस्से पर पड़ा। एएसआई के विवरण में नहर-ए-बहिश्त, यानी स्वर्ग की धारा, नाम की एक जल-नाली उसके भीतर से बहती हुई हाथीदाँत के फ़व्वारे वाले मध्य के संगमरमर के हौज़ में जाती थी। यूनेस्को का वर्णन कहता है कि वही नाली निजी मंडपों की पूरी क़तार को जोड़ती है।

इसके बाद दीवान-ए-ख़ास आता है, यानी ख़ास दरबार का दालान। शाहजहाँ की सभी इमारतों में इकोमोस इसे सबसे अधिक अलंकृत कहता है: सफ़ेद संगमरमर जिसके स्तंभों पर फूलों की पिएत्रा ड्यूरा है, कुल 32 स्तंभ, और एक सपाट छत जिसके नीचे का हिस्सा मूल रूप से चाँदी से मढ़ा था। उसकी दीवार पर एक फ़ारसी दोहा लिखा है, जो इकोमोस के अनुवाद में यों है, “अगर धरती पर कहीं स्वर्ग है, तो वह यहीं है, यहीं है”। एएसआई के अनुसार उसके संगमरमर के चबूतरे पर कहा जाता है कि मयूर सिंहासन रखा था, जिसे नादिर शाह ले गया। इकोमोस के अनुसार क़िले की उसकी लूट 1739 में हुई, और उसने ख़ज़ाना ख़ाली कर दिया।

एएसआई बादशाह के शयनकक्ष के बगल में अष्टकोणीय मुथम्मन बुर्ज बताता है, जहाँ बादशाह हर सुबह अपनी प्रजा के सामने आता था। अकबर शाह द्वितीय ने 1808 में उसमें एक छोटा छज्जा जोड़ा, और राजा जॉर्ज पंचम तथा रानी मेरी दिसंबर 1911 में यहीं दिल्ली के लोगों के सामने आए। इकोमोस के अनुसार औरंगज़ेब ने संगमरमर की मोती मस्जिद 1659 से 1660 में बनवाई।

2007 में यूनेस्को ने क्या दर्ज किया

2007 के अपने 31वें सत्र में विश्व धरोहर समिति ने परिसर को दर्ज किया (निर्णय 31 COM 8B.32)। मानदंड (ii) के तहत यूनेस्को का पाठ क़िले को मुग़ल वास्तुकला का अंतिम उत्कर्ष कहता है, इस्लामी, फ़ारसी, तैमूरी और हिंदू परंपराओं का मेल। मानदंड (iii) पर वह कहता है कि क़िले की योजना, वास्तुकला और बाग़ के डिज़ाइन ने राजस्थान, दिल्ली, आगरा और उससे आगे की बाद की इमारतों और बाग़ों को गहराई से प्रभावित किया, और यह परिसर ब्रिटिश सैन्य क़ब्ज़े के दौर को भी दर्ज करता है।

मानदंड (vi) स्थल को घटनाओं से जोड़ता है। यूनेस्को कहता है कि लाल क़िला “शाहजहाँ के शासन से ही सत्ता का प्रतीक रहा है”, उसने ब्रिटिश शासन में बदलाव को देखा और “वह जगह था जहाँ भारतीय स्वतंत्रता का पहली बार जश्न मनाया गया, और आज भी मनाया जाता है”।

भारत के डोज़ियर में चार मानदंड, (i), (ii), (iii) और (vi), प्रस्तावित थे। इकोमोस ने तीन की सिफ़ारिश की, क्योंकि बाद के बदलावों ने मानदंड (i) के लिए क़िले की समग्र अखंडता को घटा दिया था। इकोमोस की रिपोर्ट दर्ज करती है कि पहला डोज़ियर 1993 में कार्टाजेना में विश्व धरोहर ब्यूरो में जाँचा गया और तब तक के लिए टाल दिया गया जब तक सेना क़िले के प्रमुख हिस्से एएसआई को न सौंप दे। दिसंबर 2003 में भारतीय सेना ने क़िला सौंप दिया, जिसके बारे में इकोमोस कहता है कि उसने 1993 की शर्त पूरी की। दोनों क़िलों को समेटने वाला संशोधित डोज़ियर 31 जनवरी 2006 को यूनेस्को पहुँचा, और इकोमोस ने अपनी रिपोर्ट 11 मार्च 2007 को मंज़ूर की।

सलीमगढ़, बगल का पुराना क़िला

सलीमगढ़ की तारीख़ स्रोत के अनुसार बदलती है। यूनेस्को कहता है कि इस्लाम शाह सूरी ने, जो शेरशाह सूरी का बेटा था, इसे 1546 में बनवाया। इकोमोस का इतिहास कहता है कि उसने इसे 1544 में शुरू किया, और संस्कृति मंत्रालय का संग्रहालय पोर्टल कहता है कि यह 1545 और 1554 के बीच बना और उसकी मृत्यु के समय अधूरा था। यह यमुना के एक द्वीप पर था, पुल से लाल क़िले से जुड़ा, और इकोमोस कहता है कि जब लाल क़िला बन रहा था तब शाहजहाँ यहाँ रहा।

शाहजहाँ के आख़िरी बरसों पर स्रोत अलग-अलग राह लेते हैं: इकोमोस कहता है कि उसे सलीमगढ़ में क़ैद किया गया, जबकि ब्रिटैनिका कहता है कि औरंगज़ेब ने उसे 1666 में अपनी मृत्यु तक आगरा के क़िले में बंद रखा, जैसा ताज महल पर हमारा लेख भी दर्ज करता है।

इस बीच यमुना ने अपना रास्ता बदल लिया है। इकोमोस के अनुसार दोनों क़िलों के बीच अब इनर दिल्ली रिंग रोड उसकी पुरानी रेखा पर चलती है, और सलीमगढ़ के बीच से दो पटरियों वाली रेल लाइन गुज़रती है। ब्रिटिश शासन में उसकी लगभग सारी मुग़ल इमारतें ढहा दी गईं, और इकोमोस क़िले को अपने आप में स्वतंत्र स्थल की जगह परिसर का हिस्सा मानता है।

1992 में एएसआई ने वहाँ की बैरकें भारतीय सेना से अपने हाथ में लीं, और संग्रहालय पोर्टल के अनुसार स्वतंत्रता सेनानियों का स्मारक स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालय 1995 में खुला। उसमें कर्नल प्रेम कुमार की पहनी भारतीय राष्ट्रीय सेना की वर्दी और कर्नल गुरबख़्श सिंह ढिल्लों के कोट के बटन दिखाए जाते हैं, और पोर्टल कहता है कि बैरकों में शाह नवाज़ ख़ान, प्रेम कुमार सहगल और ढिल्लों सहित आईएनए के क़ैदी रखे गए। उनका कोर्ट मार्शल 1945 के लाल क़िला मुक़दमों पर लेख का विषय है।

1857 से 1947 के झंडे तक

इकोमोस के अनुसार 1857 के बाद अंग्रेज़ों ने क़िले पर क़ब्ज़ा किया और उसे ब्रिटिश भारतीय सेना का मुख्यालय बना दिया। उन्होंने कई ढाँचे ढहाए, मुग़ल बाग़ों को अंग्रेज़ी शैली में नया रूप दिया और 1867 और 1868 में बैरकें बनाईं: तीन मंज़िला चार, दो मंज़िला सात और एक मंज़िला तेरह। सिन्हा लिखते हैं कि बहादुर शाह ज़फ़र पर दीवान-ए-ख़ास में मुक़दमा चला और उन्हें 7 अक्टूबर 1858 को रंगून निर्वासित कर दिया गया।

संस्कृति मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्त संस्था नेहरू स्मारक संग्रहालय एवं पुस्तकालय दर्ज करती है कि जवाहरलाल नेहरू ने 16 अगस्त 1947 को लाल क़िले पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया। वहाँ की तस्वीरों के शीर्षकों में यही तारीख़ है, जबकि भूमिका कहती है कि उन्होंने लाहौरी गेट के ऊपर झंडा फहराया, और द वायर इसे 15 अगस्त को पहले मंत्रिमंडल के शपथ लेने के एक दिन बाद रखता है। उसका पृष्ठ नेहरू का भाषण उद्धृत करता है: “हम इस पुराने क़िले में एक ऐतिहासिक अवसर पर इसलिए इकट्ठा हुए हैं कि जो हमारा था उसे वापस जीत सकें।” संविधान सभा ने तिरंगे को 22 जुलाई को अपनाया था, जिसका इतिहास पिंगली वेंकैया पर लेख में बताया गया है।

संग्रहालय के अनुसार तब से हर स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री क़िले पर झंडा फहराते आए हैं। 14 अगस्त 2016 को जारी 70वें स्वतंत्रता दिवस का पत्र सूचना कार्यालय का कार्यक्रम समारोह का रूप दिखाता है। लाहौरी गेट पर पहुँचने पर प्रधानमंत्री का स्वागत होता है, वे सेना, नौसेना, वायु सेना और दिल्ली पुलिस की गार्ड ऑफ़ ऑनर का निरीक्षण करते हैं और प्राचीर तक जाते हैं। झंडा फहराना 2281 फ़ील्ड रेजिमेंट (सेरेमोनियल) की 21 तोपों की सलामी के साथ तय समय पर होता है, और फिर प्रधानमंत्री राष्ट्र को संबोधित करते हैं।

एएसआई की देखरेख और आगे का काम

2003 से क़िला एएसआई के हाथों में है। क़ानूनी रूप से यह प्राचीन स्मारक तथा पुरातत्व स्थल और अवशेष अधिनियम, 1959 के तहत राष्ट्रीय महत्व का स्मारक के रूप में संरक्षित है, जिसके चारों ओर 100 मीटर का प्रतिबंधित क्षेत्र है और उसके आगे 200 मीटर का एक और क्षेत्र है जिसमें विकास नियंत्रित है, इकोमोस दर्ज करता है। नामांकन डोज़ियर में गिनाई गई एएसआई की पूरी हुई परियोजनाओं में चूने के प्लास्टर और चूना कंक्रीट के फ़र्श की बहाली और जड़ाई तथा बलुआ पत्थर की सीढ़ियों की मरम्मत शामिल हैं। यूनेस्को को सरकार की आवधिक रिपोर्ट कहती है कि एएसआई ने क़िले के लिए 2007 में संरक्षण प्रबंधन योजना तैयार की।

23 जनवरी 2019 को प्रधानमंत्री ने पूर्व ब्रिटिश बैरकों में चार संग्रहालयों का उद्घाटन किया, जिनका नाम क्रांति मंदिर है। पत्र सूचना कार्यालय के अनुसार विषय हैं सुभाष चंद्र बोस और आईएनए, जलियाँवाला बाग़ और पहला विश्व युद्ध, 1857 का विद्रोह, और तीन सदियों की भारतीय कला, जिसमें 450 से ज़्यादा कृतियाँ हैं। द प्रिंट की रिपोर्ट है कि 23 मार्च 2026 की एक संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट ने इस प्रस्तुति को सराहना के साथ दर्ज किया और संस्कृति मंत्रालय से इस मॉडल को अन्य बड़े स्थलों के लिए दस्तावेज़ बनाने को कहा, और मंत्रालय ने समिति को बताया कि सारी बैरकें अब प्रदर्शित की जा चुकी हैं।

अगला चरण क़िले के आसपास के क्षेत्र से जुड़ा है। सड़क और रेल लाइन के लिए इकोमोस ने उन्हें दूसरी जगह ले जाने की दीर्घकालिक योजना और अल्पकाल में यातायात घटाने के उपाय सुझाए। पत्रिका हेरिटेज में 2025 के एक शोधपत्र ने, जिसके लेखक आईआईटी रुड़की, आईआईटी कानपुर, वेनिस के का फ़ोस्कारी विश्वविद्यालय और एएसआई से थे, बलुआ पत्थर और उस पर जमी काली पपड़ी का विश्लेषण किया। पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार पपड़ी आश्रय वाली जगहों पर लगभग 0.05 मिलीमीटर और भारी यातायात की ओर वाली दीवारों पर 0.5 मिलीमीटर तक मोटी है, और मुख्य रूप से जिप्सम है। नियमित सफ़ाई और सुरक्षात्मक परत लेखक सुझाते हैं। द प्रिंट की रिपोर्ट के अनुसार 27 जून 2026 की एक एएसआई निविदा चाँदनी चौक की ओर वाली दीवार के जल-रोधी उपचार को समेटती है, जिसकी सामग्री की अनुमानित लागत 12,55,708 रुपये (लगभग 12.6 लाख रुपये) है।

देखने जाना

एएसआई का पृष्ठ कहता है कि क़िला सूर्योदय से रात 9 बजे तक खुला रहता है और 15 साल से कम उम्र के बच्चों का प्रवेश मुफ़्त है। इंक्रेडिबल इंडिया सुबह 9:30 से शाम 4:30 बजे तक और सोमवार को बंद बताता है, इसलिए भरोसा गेट पर लगी मौजूदा सूचना पर करना चाहिए।

इकोमोस के अनुसार 1998 से 1999 के बीच आगंतुकों की संख्या 24 लाख तक पहुँची। वित्त वर्ष 2024-25 में पर्यटन मंत्रालय का संकलन, एएसआई के आँकड़ों का उपयोग करते हुए, 28,84,399 घरेलू और 79,311 विदेशी आगंतुक दर्ज करता है, जो टिकट वाले एएसआई स्मारकों में घरेलू संख्या के लिहाज़ से चौथी सबसे ऊँची है।

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स्रोत और आगे पढ़ने के लिए

  1. UNESCO World Heritage Centre: Red Fort Complex (List no. 231)
  2. UNESCO World Heritage Committee, Decision 31 COM 8B.32: Red Fort Complex, India (2007)
  3. ICOMOS Advisory Body Evaluation, The Red Fort Complex (India), No 231 rev (March 2007), hosted by UNESCO
  4. Government of India, Periodic Reporting Cycle 3: Red Fort Complex, hosted by UNESCO
  5. Archaeological Survey of India: World Heritage Site, Red Fort, Delhi
  6. Incredible India (Ministry of Tourism): Red Fort, Delhi
  7. Press Information Bureau, 14 August 2016: Independence Day Celebrations at Red Fort
  8. Press Information Bureau, 23 January 2019: PM inaugurates Subhas Chandra Bose Museum at Red Fort
  9. Ministry of Tourism: India Tourism Data Compendium 2025 (ASI visitor tables)
  10. Nehru Memorial Museum and Library: Independence Day Celebrations 1947 (Google Arts and Culture)
  11. National Portal and Digital Repository of Museums (Ministry of Culture): Swatantrata Senani Museum, Salimgarh
  12. Encyclopaedia Britannica: Shah Jahan
  13. The Wire: How the Red Fort Became the Site for India's Independence Day Celebrations (Shashank Shekhar Sinha, 2017, republished 15 August 2020)
  14. ThePrint, 15 April 2026: House panel wants Red Fort model replicated across India
  15. Kumar et al., Characterization of Red Sandstone and Black Crust to Analyze Air Pollution Impacts on a Cultural Heritage Building: Red Fort, Delhi, India, Heritage 8 (2025), record at Ca' Foscari University of Venice
  16. Tribune India (PTI), 15 September 2025: pollution accelerating damage to Delhi's Red Fort, finds study
  17. ThePrint, 3 July 2026: ASI tender to clean and treat the Red Fort wall before 15 August

यह लेख AI उपकरणों की सहायता से शोधित और लिखा गया है, और सटीकता के लिए संपादित किया गया है। यह केवल सामान्य जानकारी और चर्चा के लिए है, पेशेवर सलाह नहीं। हमारे संपादकीय मानक और अस्वीकरण देखें। कोई त्रुटि मिली? हमें बताएँ।

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