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कीलाडी की ईंट की दीवारें, छल्लेदार कुएँ और तमिल-ब्राह्मी में अभिलिखित 56 ठीकरे वैगई किनारे की उस बसावट से आते हैं जिसे तमिलनाडु पुरातत्व विभाग छठी सदी ईसा पूर्व की बताता है
प्राचीन और मध्यकालीन भारत

कीलाडी की ईंट की दीवारें, छल्लेदार कुएँ और तमिल-ब्राह्मी में अभिलिखित 56 ठीकरे वैगई किनारे की उस बसावट से आते हैं जिसे तमिलनाडु पुरातत्व विभाग छठी सदी ईसा पूर्व की बताता है

फ़ोटो: Saif Arash / Wikimedia Commons, CC BY 4.0 (क्रॉप किया गया)

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मदुरै से 13 किलोमीटर दूर कीलाडी के टीले से 13 मीटर लंबी ईंट की दीवार, मिट्टी के छल्लों से बने कुएँ और एक ही सत्र में 5,820 पुरावस्तुएँ निकली हैं। तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग जमाव को छठी सदी ईसा पूर्व और पहली सदी ईस्वी के बीच का बताता है, और अपनी खुदाई से तमिल-ब्राह्मी में अभिलिखित बर्तनों के 56 टुकड़े दर्ज करता है।

· · 10 मिनट का पठन

कीलाडी (Keezhadi) शिवगंगा ज़िले में मदुरै से 13 किलोमीटर पूर्व और दक्षिण-पूर्व में 110 एकड़ से बड़ा टीला है, जिसके 2 किलोमीटर उत्तर में वैगई नदी बहती है। वहाँ की खुदाई ने ईंट की दीवारें, मिट्टी के छल्लों को एक पर एक रखकर बने कुएँ, छत की खपरैलें और ऐसे बर्तन खोले हैं जिन पर उनके मालिकों ने तमिल-ब्राह्मी के अक्षर खरोंचे थे। तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग, जो 2017-18 के चौथे सत्र से खुदाई चला रहा है, बसावट के जमाव को छठी सदी ईसा पूर्व और पहली सदी ईस्वी के बीच का बताता है।

विभाग ने अपने निष्कर्ष 2019 के एक ग्रंथ, Keeladi: An Urban Settlement of Sangam Age on the Banks of River Vaigai, में रखे। राज्य के अपने प्रकाशन नाम को Keeladi लिखते हैं; गाँव को Keezhadi भी लिखा जाता है, और नीचे के स्रोतों में दोनों वर्तनियाँ मिलती हैं। जिन संगम कविताओं से ग्रंथ को अपना शीर्षक मिला, उनकी चर्चा संगम साहित्य पर हमारे लेख में है। यह लेख ज़मीन पर टिका है: क्या खोदा गया, उसकी तिथि कैसे तय हुई, और पुरातत्वविद तिथियों को कहाँ अलग ढंग से पढ़ते हैं।

एक टीले पर दो खुदाई दल

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने पहले तीन सत्र, 2014-15 से 2016-17, बेंगलुरु की अपनी उत्खनन शाखा के ज़रिये खोदे। राज्य विभाग ने अपने ग्रंथ के अनुसार 2017-18 और 2018-19 के लिए काम संभाला। केंद्रीय संस्कृति मंत्री ने 21 जुलाई 2025 को लोकसभा में लिखित उत्तर में बताया कि राज्य-संचालित खुदाइयाँ 2018 से चल रही हैं, ASI उन्हें धन नहीं देता, और दसवाँ चरण 18 जून 2024 को शुरू हुआ, जैसा DT Next ने बताया।

के. अमरनाथ रामकृष्ण, ASI के वह पुरातत्वविद जिन्होंने उन चरणों का नेतृत्व किया, ने जनवरी 2023 में उनमें से पहले दो पर 982 पन्नों की रिपोर्ट जमा की, The Wire के अनुसार। उसका क्या हुआ, यह नीचे के आख़िरी दो खंडों का विषय है।

ईंट की दीवारें, छल्लेदार कुएँ और छत की खपरैलें

राज्य का ग्रंथ कहता है कि अकेले चौथे सत्र में 5,820 पुरावस्तुएँ दर्ज हुईं, जिनमें ईंट की संरचनाएँ, मिट्टी के छल्लों वाले कुएँ और गिरी हुई खपरैलें थीं। खुली हुई एक दीवार 13 मीटर लंबी और ईंट की तीन परतों जितनी ऊँची है। ईंटें दो आकारों की हैं, 38 गुणा 23 गुणा 6 सेंटीमीटर और 38 गुणा 26 गुणा 6 सेंटीमीटर। दीवार के पास महीन मिट्टी के फ़र्श हैं, और नियमित अंतर पर खंभों के गड्ढे दिखाते हैं कि कभी लकड़ी के खंभे छत को सँभालते थे। खुदाई करने वालों को लोहे की कीलें मिलीं, जिन्हें उन्होंने खंभों और बल्लियों के जोड़ के रूप में पढ़ा।

खपरैलों में बारिश का पानी ले जाने के लिए उँगलियों से दबाए खाँचे हैं और ऊपर बल्लियों से बाँधने के लिए छेदों की एक जोड़ी है। ग्रंथ नोट करता है कि कोरोमंडल तट के आरंभिक बंदरगाह अरिकामेडु में भी ऐसी ही खपरैलें मिली थीं।

छल्लेदार कुएँ पकी मिट्टी के छल्लों की ढेरियाँ हैं। ग्रंथ में वर्णित पहली खाई का एक कुआँ 2.02 मीटर ऊँचा और 93 सेंटीमीटर चौड़ा खड़ा था, उसके छल्ले साबुत मिले; स्थल पर मिले छल्लेदार कुओं के सबसे निचले स्तर का एक और कुआँ 62 सेंटीमीटर चौड़ा है और नदी की रेत पर टिका है। विभाग ने ईंटें, खपरैलें, चूने का गारा और कुएँ के छल्लों का जोड़ने वाला पदार्थ वेल्लोर इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी भी भेजा। ईंटें और खपरैलें 80 प्रतिशत से ज़्यादा सिलिका और लगभग 7 प्रतिशत चूने की निकलीं, और चूने का पलस्तर 97 प्रतिशत चूने का। ग्रंथ संरचनाओं के इतने टिके रहने का श्रेय सामग्री की गुणवत्ता को देता है।

बर्तन, करघे और बिसात के खेल

दो आसन्न खाई-चतुर्थांशों में, 4 मीटर के नीचे, मृदभांड के ढेर थे, उतनी मात्रा में जिसे ग्रंथ कई बैलगाड़ियों जितना बताता है, और वह स्थल पर बर्तन बनाने के उद्योग का सुझाव देता है। सत्रह मृदभांड नमूने वेल्लोर इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी के ज़रिये पीसा विश्वविद्यालय के अर्थ साइंस विभाग भेजे गए। ग्रंथ के बताए नतीजों के अनुसार वे पानी के घड़े और खाना पकाने के बर्तन दिखाते हैं जो स्थानीय रूप से उपलब्ध कच्चे माल से बने, छठी से दूसरी सदी ईसा पूर्व तक एक ही तकनीक और सामग्री से। दूसरी सदी ईसा पूर्व के कुछ टुकड़ों में दूसरे इलाक़ों जैसी मिट्टी है, जिसे ग्रंथ पड़ोसी इलाक़ों के बीच माल की आवाजाही के प्रमाण के रूप में पढ़ता है। काले-और-लाल बर्तन के लिए भट्ठी का तापमान लगभग 1,100 डिग्री सेल्सियस चाहिए था, ग्रंथ कहता है। वह उन बंदरगाहों में पेरियार के मुज़िरिस-पट्टनम को गिनाता है जिनसे मोती, रत्न, वस्त्र, इस्पात, काली मिर्च और इत्र तमिल प्रदेश से बाहर जाते थे; मुज़िरिस पर हमारा लेख उसी बंदरगाह को कवर करता है।

दस तकुए के चक्के और 20 हड्डी की नोकें, एक तांबे की सुई और तरल के लिए बर्तनों के साथ, कताई और बुनाई के संकेत के रूप में पढ़े जाते हैं। ASI की अपनी खुदाई टीम ने रंगाई के उद्योग के प्रमाण बताए। विभाग सात सोने के गहने, काँच और पत्थर के मनके, सीप और हाथीदाँत की चूड़ियाँ, 600 इक्कड़-दुक्कड़ के गोटे और 80 खेल के गोटे गिनाता है। पुणे के डेक्कन कॉलेज के 70 हड्डी-टुकड़ों के जीव-जंतु अध्ययन में मवेशी 25 प्रतिशत के साथ सबसे बड़ा समूह निकले। ग्रंथ जोड़ता है कि पूजा के लिए बनी कोई वस्तु अब तक नहीं मिली।

मालिकों के निशान लगे बर्तन

ग्रंथ 1,001 खरोंचे हुए ठीकरे, यानी निशान खरोंचे बर्तनों के टुकड़े, और राज्य विभाग की अपनी खुदाई से तमिल-ब्राह्मी में अभिलिखित 56 ठीकरे दर्ज करता है। तमिल-ब्राह्मी तमिल की आरंभिक लिपि है। ग्रंथ कहता है कि कीलाडी के अक्षर पकाने के बाद उकेरे गए, यानी बर्तन ख़रीदने वालों ने, कुम्हारों ने नहीं, उन्हें खुरचा। वह इसे बर्तनों के उपयोगकर्ताओं में उच्च साक्षरता का संकेत मानता है। एक ठीकरे पर छह अक्षर हैं, जिन्हें ग्रंथ, आख़िरी अक्षर के अनुमान के साथ, एक व्यक्ति-नाम, Kuviran-tan, के रूप में पढ़ता है।

ASI के पहले के सत्रों ने अपनी गिनती दी। Scroll ने 28 जुलाई 2017 को बताया कि संस्कृति मंत्रालय ने राज्यसभा को तमिल-ब्राह्मी लिपि वाले 72 ठीकरों की जानकारी दी, और रामकृष्ण ने उन पर इयनन, उतिरन, वेंधन, संतनवती और सातन जैसे नाम गिनाए। 72 और 56 अलग-अलग खुदाइयों के आँकड़े हैं, और यह लेख उन्हें जोड़ता नहीं।

राज्य का ग्रंथ लिपि के प्रमाणों से दो निष्कर्ष निकालता है। तमिल-ब्राह्मी की तिथि कोडुमनल, अलगनकुलम और पोरुंदल की रेडियोधर्मी तिथियों से लगभग पाँचवीं सदी ईसा पूर्व तय की गई थी, और ग्रंथ कहता है कि कीलाडी इसे एक सदी पीछे ले जाता है। वह यह भी तर्क देता है कि नगरीकरण की दूसरी लहर, जो पहली बार छठी सदी ईसा पूर्व में गंगा के मैदानों में दिखी, उसी सदी में तमिलनाडु में भी आई। ग्रंथ यह भी याद दिलाता है कि अशोक के शिलालेख 2 और 13 चोल और पांड्य राज्यों का नाम लेते हैं; सम्राट के बारे में अशोक पर हमारा लेख देखें।

कार्बन के नमूने क्या कहते हैं

रेडियोकार्बन के नतीजों के दो सेट हैं। 2017 में ASI ने दो कार्बन नमूने, पुरावस्तुएँ नहीं, फ़्लोरिडा की Beta Analytic को भेजे। संस्कृति राज्य मंत्री ने राज्यसभा को बताया कि वे 2,160 और 2,200 साल पुराने हैं, New Indian Express के विवरण में; Swarajya ने आँकड़े हर एक में 30 साल की त्रुटि-सीमा के साथ 2,160 और 2,200 साल दिए, जबकि Scroll ने 2,160 से 2,230 साल का दायरा बताया। Scroll के अनुसार जमाव 4.5 मीटर तक गहरे थे और तिथि वाले नमूने लगभग 2 मीटर नीचे से आए। Scroll ने बताया कि रामकृष्ण ने The Hindu से कहा कि नमूने तीसरी सदी ईसा पूर्व के हैं। स्थल को सुरक्षित रखने की एक याचिका सुन रही मद्रास उच्च न्यायालय की एक पीठ ने लगभग 200 ईसा पूर्व से 130 ईसा पूर्व का रेडियोकार्बन दायरा नोट किया, The Hindu ने बताया।

2018 में राज्य विभाग ने अपने चौथे सत्र के छह कार्बन नमूने उसी प्रयोगशाला को त्वरक द्रव्यमान स्पेक्ट्रोमीटरी (AMS) तिथि-निर्धारण के लिए भेजे, जो कार्बन-14 परमाणुओं को सीधे गिनने की विधि है। ग्रंथ के अनुसार छहों छठी और तीसरी सदी ईसा पूर्व के बीच आते हैं। 353 सेंटीमीटर गहराई का नमूना छठी सदी ईसा पूर्व के अंत तक जाता है, जिसे The Federal ने 580 ईसा पूर्व बताया, और 200 सेंटीमीटर गहराई का एक नमूना तीसरी सदी ईसा पूर्व की शुरुआत तक। चूँकि जमाव तिथि वाली परतों के ऊपर और नीचे भी चलता है, विभाग कहता है कि उसे छठी सदी ईसा पूर्व और पहली सदी ईस्वी के बीच का माना जा सकता है। राज्य के पुरातत्व आयुक्त टी. उदयचंद्रन ने कहा कि नतीजे तमिल-ब्राह्मी और क्षेत्र में साक्षरता की उत्पत्ति को छठी सदी ईसा पूर्व तक ले जाते हैं, Archaeology पत्रिका ने बताया।

ग्रंथ का एक परिशिष्ट स्थल को तीन कालों में बाँटता है: काल I छठी से तीसरी सदी ईसा पूर्व, काल II तीसरी सदी ईसा पूर्व से चौथी या पाँचवीं सदी ईस्वी, और काल III वहाँ से 11वीं या 12वीं सदी ईस्वी तक।

तिथियाँ किसे ढकती हैं, इस पर पुरातत्वविदों में मतभेद

कलकत्ता विश्वविद्यालय की बिष्णुप्रिया बसाक ने अक्टूबर 2019 में The Wire से कहा कि रिपोर्ट यह साफ़ नहीं करती कि तमिल-ब्राह्मी के ठीकरे उन्हीं परतों से आए थे या नहीं जिनके नमूनों की तिथि छठी सदी ईसा पूर्व निकली। द्रविड़ विश्वविद्यालय के ई. हर्ष वर्धन ने कहा कि एक रिपोर्ट के बल पर लिपि को छठी सदी ईसा पूर्व में नहीं रखा जा सकता, और जोड़ा कि खुदाई इस पर रोशनी डालती है कि खरोंच के निशान आरंभिक तमिल-ब्राह्मी में कैसे बदले। डेक्कन कॉलेज के प्रबोध शिरवलकर, जिनके सहकर्मी खुदाई दल में थे, ने कहा कि दूसरा नगरीकरण स्थानीय रूप से कीलाडी में हुआ दिखता है।

पूर्व सिविल सेवक पी. ए. कृष्णन ने The Federal में तर्क दिया कि रेडियोकार्बन तिथि यह बताती है कि जीव कब मरा और उसे बर्तनों पर नहीं ढोया जा सकता, और जिस स्तर पर अभिलिखित ठीकरे मिले वह दर्ज नहीं है। उन्होंने यह भी नोट किया कि स्थल में छेड़छाड़ हुई थी।

ASI की अपनी समीक्षा अलग मामला है। ThePrint ने 29 जून 2026 को बताया कि रामकृष्ण की रिपोर्ट स्थल को तीन कालों में रखती है, जिनमें सबसे पहला आठवीं से पाँचवीं सदी ईसा पूर्व तक चलता है। 21 जुलाई 2025 के एक लिखित उत्तर में संस्कृति मंत्री ने कहा कि विशेषज्ञ टिप्पणियों ने उस दायरे को अनुचित बताया, कि सबसे पहला काल अधिक से अधिक 300 ईसा पूर्व से पहले रखा जा सकता है, और कि हर वैज्ञानिक तिथि के साथ उसकी परत की संख्या दी जाए। उन्होंने छूटी हुई चीज़ों की भी सूची दी, जिनमें गाँव का दोबारा बनाया नक्शा, प्लेटें, रेखाचित्र, खाई-योजनाएँ और समोच्च नक्शे शामिल थे। मंत्री ने कहा कि रिपोर्ट समीक्षाधीन है और ख़ारिज नहीं हुई है। रामकृष्ण ने उसे बदलने से इनकार किया। The News Minute के अनुसार 5 फ़रवरी 2026 को, ASI की पाँच सदस्यीय समिति ने 114 पन्नों का आकलन तैयार किया, और उन्होंने उसे साँचे में ढला और स्थल की सामग्री से जुड़ाव की कमी वाला कहा। वे आठवीं सदी ईसा पूर्व से तीसरी सदी ईस्वी तक का दायरा प्रस्तावित करते हैं।

दो संग्रहालय, और आना बाक़ी समीक्षा

तमिलनाडु सरकार ने 5 मार्च 2023 को कीलाडी संग्रहालय खोला, 31,000 वर्ग फ़ुट की इमारत जिसकी अनुमानित लागत 18.43 करोड़ रुपये रही, Outlook ने बताया। 4.5 एकड़ में 24.30 करोड़ रुपये की लागत वाले एक खुले आसमान के संग्रहालय का वीडियो लिंक से 13 फ़रवरी 2026 को उद्घाटन हुआ, जो मूल ईंट की दीवारें, मिट्टी की पाइपलाइनें और छल्लेदार कुएँ दिखाता है, ThePrint ने बताया।

रिपोर्ट पर ThePrint ने 29 जून 2026 को लिखा कि ASI के महानिदेशक ने 24 जून को लिखा था कि पाँच सदस्यों की एक आंतरिक समिति उसे स्थल पर दोबारा परखेगी। उस तारीख़ तक रिपोर्ट अप्रकाशित थी।

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स्रोत और आगे पढ़ने के लिए

  1. Department of Archaeology, Government of Tamil Nadu: Keeladi, An Urban Settlement of Sangam Age on the Banks of River Vaigai, first edition, 18 September 2019 (copy hosted by Vinavu)
  2. Scroll: Samples excavated from Keezhadi archaeological site date back 2,200 years, Centre tells Rajya Sabha, 28 July 2017
  3. Swarajya: Site at Keezhadi in Tamil Nadu dates back to Sangam era, confirms carbon dating, 28 July 2017
  4. Express News Service, New Indian Express: Keezhadi samples date back more than 2,000 years, 28 July 2017 (reprint by the Tamil Heritage Foundation)
  5. The Hindu: Madurai Bench of the Madras High Court on the petition to preserve the Keezhadi site (reprint by the Tamil Heritage Foundation)
  6. The Federal: Keeladi excavations reveals sangam age to be much older than believed earlier, 20 September 2019
  7. Archaeology magazine, Archaeological Institute of America: Keeladi settlement dated to the sixth century B.C., 20 September 2019
  8. The Wire: Experts Question Dates of Script in Tamil Nadu's Keeladi Excavation Report, Sukanya Charuchandra, 17 October 2019
  9. P. A. Krishnan, The Federal: Keeladi excavation raises more questions than answers (opinion, 24 September 2019)
  10. Outlook India: Tamil Nadu CM inaugurates Keeladi museum in Sivaganga, 5 March 2023
  11. ThePrint: Another round of Centre-South clash as Union minister says Keeladi report needs scientific validation, 11 June 2025
  12. DT Next: Keezhadi report missing maps, drawings and dating clarity, Centre tells Lok Sabha, 22 July 2025
  13. The Wire: Keeladi sparks fresh political firestorm as archaeologist cries foul, 26 July 2025
  14. The News Minute: Keeladi archaeologist rejects ASI review, seeks immediate release of excavation report, 5 February 2026
  15. ThePrint: TN CM inaugurates Keeladi open-air museum in Sivaganga district, 14 February 2026
  16. ThePrint: ASI to re-examine Keezhadi excavation report on site, 29 June 2026

यह लेख AI उपकरणों की सहायता से शोधित और लिखा गया है, और सटीकता के लिए संपादित किया गया है। यह केवल सामान्य जानकारी और चर्चा के लिए है, पेशेवर सलाह नहीं। हमारे संपादकीय मानक और अस्वीकरण देखें। कोई त्रुटि मिली? हमें बताएँ।

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