फ़ोटो: SM7 / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0 (क्रॉप किया गया)
हिन्दी
विलियम क्लैक्सटन पेप्पे ने 1898 में पिपरहवा स्तूप से पाँच अवशेष-पात्रों वाली बलुआ पत्थर की एक पेटिका निकाली, और एक ढक्कन पर ब्राह्मी की एक पंक्ति बुद्ध और शाक्यों की बात करती है। संस्कृति मंत्रालय के कानूनी नोटिस के बाद सोथबीज़ ने मई 2025 में उस निधि के रत्नों की हांगकांग बिक्री स्थगित की, और मंत्रालय ने 30 जुलाई 2025 को उनकी वापसी की घोषणा की।
जनवरी 1898 में विलियम क्लैक्सटन पेप्पे ने, जो बस्ती ज़िले की बर्डपुर रियासत का प्रबंधन करने वाले एक अंग्रेज़ इंजीनियर थे, पिपरहवा के एक ईंट के टीले के बीचोबीच कुआँ-सी खुदाई की और पाँच अवशेष-पात्रों वाली बलुआ पत्थर की एक पेटिका पाई। उसके भीतर की सेलखड़ी की एक मंजूषा पर प्रारंभिक ब्राह्मी अक्षरों की एक पंक्ति है, जो बुद्ध के अवशेषों की और शाक्यों की बात करती है, उस कुल की जिसमें उनका जन्म हुआ था।
उस निधि के जो रत्न पेप्पे के वंशजों के पास रह गए थे, उनकी नीलामी 7 मई 2025 को हांगकांग में होनी थी। भारत के संस्कृति मंत्रालय के एक कानूनी नोटिस ने सोथबीज़ को बिक्री स्थगित करने पर प्रेरित किया, और 30 जुलाई 2025 को मंत्रालय ने घोषणा की कि रत्न गोदरेज इंडस्ट्रीज़ ग्रुप की साझेदारी में घर लौट आए हैं। पिपरहवा प्रदर्शनी 3 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में खुली, और 31 अक्टूबर 2026 से राष्ट्रीय संग्रहालय के अवशेष अरुणाचल प्रदेश के मठों के तीन सप्ताह के दौरे पर हैं।
पेप्पे को केंद्र में क्या मिला
पिपरहवा उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर ज़िले में है, नेपाल सीमा के ठीक दक्षिण में। पेप्पे की अपनी रिपोर्ट टीले को सीमा से आधा मील दूर बताती है, और बर्लिन के अभिलेख-विद्वान हैरी फ़ाक लुंबिनी से दूरी लगभग 15 किलोमीटर देते हैं। पेप्पे ने 1897 में ऊपर से एक खाई खोदी थी। उसी साल अक्टूबर में भारतीय सिविल सेवा के विंसेंट स्मिथ ने उसका निरीक्षण किया और उनसे कहा कि भीतर जो भी होगा वह केंद्र में होगा, शायद ज़मीन के स्तर के पास।
जनवरी 1898 के पहले दिनों में पेप्पे ने बीचोबीच दस फ़ुट वर्ग का कुआँ खोदा। मिट्टी से भरी एक नली ईंटों की चिनाई के बीच से नीचे जाती थी, और ठोस ईंट के 18 फ़ुट के बाद वे एक पत्थर की पटिया तक पहुँचे, जो बलुआ पत्थर की पेटिका का ढक्कन थी। ऊपर के बोझ से ढक्कन चार टुकड़ों में टूट गया था, फिर भी पेटिका अब तक बंद थी। पेप्पे ने ढक्कन समेत पेटिका का वज़न 1,537 पाउंड आँका, और फ़ाक इसे लगभग 700 किलोग्राम के क़रीब बताते हैं।
भीतर सेलखड़ी के दो कलश, लोटे के आकार का सेलखड़ी का एक पात्र, सेलखड़ी की एक छोटी डिबिया और स्फटिक का एक कटोरा था, जिसके ढक्कन में मछली के आकार का खोखला हत्था था जिसमें सोने के पत्तर के तारे भरे थे। पेप्पे ने लिखा कि सेलखड़ी के पात्र खराद पर तराशे गए थे और स्फटिक पूर्णता तक घिसा गया था। पात्रों में हड्डी के टुकड़े और कई सौ छोटी वस्तुएँ थीं: सोने के गहने और सोने का पत्तर जिस पर सिंह, हाथी और एक स्त्री की आकृति की छाप थी, मोती, और संगसूरी, कटैला, पुखराज, गार्नेट, मूँगे और स्फटिक से कटे मनके। स्मिथ ने इस निधि की तुलना उससे की जिसे अलेक्ज़ेंडर रिया ने 1892 में भट्टिप्रोलु में खोदा था, जिसका अपना लेख है, और पिपरहवा के संग्रह को दोनों में अधिक समृद्ध माना।
पेप्पे ने टीले का आधार-व्यास 116 फ़ुट और बची हुई ऊँचाई 21.65 फ़ुट बताई। स्मिथ ने बड़ी ईंटों को अशोक-काल की विशेषता माना। फ़ाक का तर्क है कि ईंट का आकार कमज़ोर मार्गदर्शक है, क्योंकि शुरुआती निर्माता एक मानक माप से काम करते थे जो एक वास्तुकार से दूसरे में बदलता था।
मंजूषा के ढक्कन की पंक्ति
अभिलेख सेलखड़ी के एक पात्र के ढक्कन के चारों ओर चलता है। कोलकाता का भारतीय संग्रहालय, जिसके पास मंजूषा है, इसे स्टीटाइट बताता है, 15.2 सेंटीमीटर ऊँची, मौर्य ब्राह्मी के पाठ के साथ, जो सुकितिभतिनं से शुरू होता है और बुधस भगवते सकियानं पर ख़त्म होता है।
वियना के गेओर्ग ब्यूलर को जनवरी 1898 के अंत में एक हाथ से बनी प्रतिलिपि मिली और उन्होंने 21 फ़रवरी को अपना पाठ भेजा। उन्होंने उसका अनुवाद किया: भगवान बुद्ध का अवशेष-मंदिर, शाक्य सुकिति भाइयों का उनकी बहनों, पुत्रों और पत्नियों के साथ किया दान। पेरिस के ऑगस्त बार्थ ने, एक और प्रतिलिपि से काम करते हुए, उसे सार रूप में इसी तरह पढ़ा। स्मिथ ने पेप्पे की रिपोर्ट के साथ छपे अपने नोट में सुकिति को नाम के बजाय “प्रसिद्ध” अर्थ वाला विशेषण मानना बेहतर समझा, जिस सुझाव का श्रेय उन्होंने विलियम होय को दिया। इस प्रश्न पर कि हड्डी बुद्ध की थी या नहीं, उन्होंने लिखा कि जमा करने वाले मानते थे कि थी और वे सही थे या नहीं, यह “कोई नहीं कह सकता”।
जे. एफ़. फ्लीट ने 1906 में पाठ को अलग ढंग से पढ़ा। उन्होंने उसे सुकिति बंधुओं के अवशेषों का अभिलेख माना, जो बुद्ध के अपने शाक्य स्वजन थे, न कि स्वयं बुद्ध के अवशेषों का। जिस पाठ को फ़ाक 1898 के बाद सर्वसम्मत बताते हैं, और जो एच. ल्यूडर्स की 1912 की ब्राह्मी अभिलेखों की सूची में दिया गया है, वह ब्यूलर के पाठ के क़रीब है: बुद्ध के, शाक्यों के, अवशेषों का आधान सुकिति के भाइयों का उनकी बहनों, पुत्रों और पत्नियों के साथ दिया उपहार है। 2013 में लिखते हुए फ़ाक एक क़दम और आगे जाते हैं। वे मुख्य शब्द निधान को प्रतिष्ठापित करने का कार्य पढ़ते हैं और पाठ का आशय यह मानते हैं कि शाक्यों ने बुद्ध के अवशेषों के लिए पूरा स्तूप स्थापित किया। कुछ बाद के लेखकों ने, जिनमें फ़ाक टी. ए. फ़ेल्प्स और ए. हक्सले के नाम लेते हैं, तर्क दिया है कि अभिलेख जाली है। फ़ाक उनके बिंदुओं की जाँच करते हैं और पाते हैं कि उनमें से कोई टिकता नहीं।
तिथि अक्षरों और ईंट की चिनाई से तर्क करके तय की जाती है। भारतीय संग्रहालय मंजूषा को लगभग तीसरी सदी ईसा पूर्व का लेबल देता है, और द आर्ट न्यूज़पेपर निधान की तिथि लगभग 240 से 200 ईसा पूर्व बताता है। फ़ाक अक्षर-रूपों को अशोक-कालीन पढ़ते हैं और लिखते हैं कि तीसरी सदी ईसा पूर्व के उत्तरार्ध की उत्पत्ति “बिल्कुल असंभव नहीं है”। वे पहला स्तूप, अपने आधार-कक्षों और पेटिका के साथ, लगभग 200 ईसा पूर्व का रखते हैं।
1898 की खोजें कहाँ गईं
द फ़ेडरल के अनुसार औपनिवेशिक सरकार ने दबी हुई वस्तुओं पर 1878 के एक कानून के तहत इस खोज पर दावा किया। ज़्यादातर गहने और अभिलेख वाली मंजूषा कोलकाता के भारतीय संग्रहालय गए। द आर्ट न्यूज़पेपर दर्ज करता है कि हड्डी के टुकड़े स्याम के राजा राम पंचम को दिए गए और बाद में थाईलैंड, श्रीलंका और म्यांमार के तीर्थों में बाँटे गए, और पेप्पे को संग्रह का लगभग पाँचवाँ हिस्सा रखने की अनुमति मिली, कोई 350 रत्न।
गिनतियाँ स्रोत के अनुसार अलग हैं। NBC न्यूज़ 2025 की बिक्री में 334 रत्न बताता है और उन्हें 1,800 से ज़्यादा कलाकृतियों के भंडार का हिस्सा कहता है, जिनमें से ज़्यादातर कोलकाता में हैं। द आर्ट न्यूज़पेपर पूरी खोज में लगभग 1,800 रत्नों की बात करता है।
1970 के दशक की दो और मंजूषाएँ
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने के. एम. श्रीवास्तव की अगुवाई में पिपरहवा में फिर खुदाई की। उसकी 1971-72 की समीक्षा बताती है कि मुख्य स्तूप से “दो और अवशेष-मंजूषाएँ मिलीं, जिनमें जली हड्डियाँ थीं”। मंजूषाएँ सेलखड़ी की हैं, पेप्पे की तरह खराद पर तराशी हुई। समीक्षा जोड़ती है कि ईंट के स्तूप के भीतर एक पहले का मिट्टी का स्तूप था, और बचे हुए स्तूप के शीर्ष से लगभग 6 मीटर नीचे ईंट के दो पात्रों में मंजूषाएँ थीं, पेप्पे की पेटिका से निचले स्तर पर। वह कहती है कि यह तय होना बाकी था कि नए अवशेष पहले के थे या नहीं।
संस्कृति मंत्रालय की 30 अक्टूबर 2026 की विज्ञप्ति कहती है कि बड़ी मंजूषा में हड्डी के 12 टुकड़े थे और छोटी में 10, कुल 22, जिनमें से 20 नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में हैं और दो भारतीय संग्रहालय में। विवरण तिथियों पर एकमत नहीं हैं। ASI की वार्षिक समीक्षा मंजूषाओं को 1971-72 के अंतर्गत सूचीबद्ध करती है। फ़ाक श्रीवास्तव की खाई को 1973 से 1974 में रखते हैं और दर्ज करते हैं कि के. वर्नर ने अवशेष-पात्र हटाए जाने के एक दिन बाद, अप्रैल 1976 में, खोज के स्थान देखे। फ़ाक यह भी दर्ज करते हैं कि जर्मन विद्वान एच. हार्टेल को श्रीवास्तव की रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर संदेह था, और वे वर्नर के साक्ष्य पर खोज को स्वीकार करते हैं। वे लिखते हैं कि भीतर की सामग्री अशोक-काल में बाँटे गए अवशेषों के अन्य हिस्से हो सकते हैं, या सम्मानित भिक्षुओं की राख, और किसी बात को बाहर नहीं रखना चाहिए।
उन्हीं खुदाइयों में स्तूप के पूर्व में मठ मिला, जिसमें आँगन के चारों ओर 33 कोठरियाँ हैं। ASI की 1972-73 की समीक्षा उसके बरामदे से मिट्टी की 31 मुहरों की जानकारी देती है, ब्राह्मी अक्षरों में, जिन्हें उसने पहली या दूसरी सदी ईस्वी का माना, और जिन पर लिखा है ओम देवपुत्र विहारे कपिलवस्तु भिक्षु संघस, यानी कपिलवस्तु के भिक्षुओं का संघ। फ़ाक लिपि को गुप्त प्रकार की पढ़ते हैं और बुद्ध के कपिलवस्तु और इन मुहरों के बीच लगभग सात सौ साल गिनते हैं।
कपिलवस्तु, पिपरहवा और तिलौराकोट
मुहरों ने ASI को शाक्यों की राजधानी कपिलवस्तु को स्तूप के ठीक पड़ोस में रखने की ओर प्रेरित किया। 1974-75 की समीक्षा एक किलोमीटर दूर गनवरिया में ईंट के दो बड़े परिसरों का वर्णन करती है, जिनका सबसे पुराना आवास मृद्भांड के साक्ष्य पर आठवीं सदी ईसा पूर्व में रखा गया है, और कहती है कि वे कपिलवस्तु के प्रमुख का निवास होने में “शायद ही कोई संदेह छोड़ते” हैं। फ़ाक गनवरिया को दो मठों के साथ सूचीबद्ध करते हैं, और वे बी. आर. मणि और पी. के. मिश्र की 2013 में बताई हाल की खुदाइयों का हवाला देते हैं, जिनमें पाया गया कि पिपरहवा के बौद्ध परिसर नगर की भूमि पर नहीं खड़े थे।
नेपाल तिलौराकोट के लिए प्रतिद्वंद्वी दावा करता है, जो फ़ाक की गिनती से लुंबिनी के लगभग 25 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में है। 2001 में वहाँ की खुदाई में सातवीं से पाँचवीं सदी ईसा पूर्व का आवास मिला, और सह-निदेशक रॉबिन कॉनिंगहम ने आर्कियोलॉजी पत्रिका से कहा कि उन्नीसवीं सदी की पहचान पर संदेह करने की बहुत कम वजह थी। डरहम विश्वविद्यालय की बाद की परियोजना पहला आवास आठवीं सदी ईसा पूर्व का और किलेबंदी छठी सदी ईसा पूर्व की बताती है। फ़ाक फ़ाह्यान और ह्वेन त्सांग के विवरणों में दी गई दूरियों से तर्क देते हैं, जिन्हें चीनी यात्रियों पर यह लेख समेटता है, और जो लुंबिनी को कपिलवस्तु से लगभग 14.5 से 16 किलोमीटर पूर्व में रखती हैं, कि पिपरहवा उनसे तिलौराकोट की तुलना में बेहतर मेल खाता है। विद्वानों ने प्रश्न का निपटारा नहीं किया है।
नीलामी और वापसी
सोथबीज़ हांगकांग ने ऐतिहासिक बुद्ध के पिपरहवा रत्न 7 मई 2025 के लिए तय किए थे और, AFP के अनुसार, उन्हें लगभग 200 ईसा पूर्व का बताया था। संस्कृति मंत्रालय ने 5 मई को एक कानूनी नोटिस भेजा जिसमें रत्नों को भारत और वैश्विक बौद्ध समुदाय की अविभाज्य धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत कहा गया, और कहा गया कि बिक्री भारतीय और अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन होगी। उसने बिक्री रद्द करने, रत्न लौटाने, क्षमायाचना और स्वामित्व-इतिहास के कागज़ात की माँग की। 7 मई को सोथबीज़ ने कहा कि वह “भारत सरकार द्वारा उठाए गए मुद्दों के मद्देनज़र और माल भेजने वालों की सहमति से” बिक्री स्थगित कर रहा है।
NBC न्यूज़ ने बताया कि 334 रत्नों से 10 करोड़ हांगकांग डॉलर से ऊपर, लगभग 1.29 करोड़ अमेरिकी डॉलर, मिलने की उम्मीद थी। खुदाई करने वाले के परपोते और वारिसों में एक क्रिस पेप्पे ने सोथबीज़ के लिए लिखा था कि उनके परदादा ने अवशेष सरकार को दे दिए थे और परिवार ने सिर्फ़ वे प्रतिलिपियाँ रखीं जो उसे रखने की अनुमति थी, जैसा द फ़ेडरल उन्हें उद्धृत करता है। NBC के अनुसार भारत सरकार ने कहा कि उन्हें बेचने का अधिकार उनके पास नहीं था। द आर्ट न्यूज़पेपर ने पेप्पे वारिसों, दिल्ली और गोदरेज के बीच दो महीने की बातचीत की ख़बर दी। संस्कृति मंत्रालय ने 30 जुलाई 2025 को घोषणा की कि रत्न गोदरेज इंडस्ट्रीज़ ग्रुप के साथ सार्वजनिक-निजी भागीदारी के ज़रिए लौट आए हैं। सोथबीज़ ने कीमत बताने से इनकार किया।
2026 की प्रदर्शनी
3 जनवरी 2026 को प्रधानमंत्री ने नई दिल्ली के राय पिथौरा सांस्कृतिक परिसर में “द लाइट एंड द लोटस: रेलिक्स ऑफ़ द अवेकन्ड वन” का उद्घाटन किया। प्रधानमंत्री कार्यालय की विज्ञप्ति कहती है कि इसने पहली बार वापस लाए गए रत्नों को राष्ट्रीय संग्रहालय और भारतीय संग्रहालय में रखे पिपरहवा के अवशेषों और पुरावस्तुओं के साथ एक जगह जुटाया। केंद्र में साँची स्तूप से प्रेरित एक प्रतिरूप है। आकाशवाणी ने 7 जनवरी को बताया कि प्रदर्शनी छह महीने चलेगी, रोज़ सुबह 9 से रात 9 बजे तक खुली। उसी मई एक और वस्तु घर लौटी, अनैमंगलम ताम्रपत्र।
संस्कृति मंत्रालय की 30 अक्टूबर 2026 की विज्ञप्ति अरुणाचल प्रदेश सरकार, इंटरनेशनल बुद्धिस्ट कॉन्फ़ेडरेशन और राष्ट्रीय संग्रहालय के साथ अरुणाचल प्रदेश के दौरे का ब्योरा देती है। सार्वजनिक दर्शन तवांग मठ में 1 से 7 नवंबर तक, बोमडिला के लोअर गोम्पा में 8 से 13 नवंबर तक और नामसाई के गोल्डन पगोडा में 14 से 20 नवंबर तक तय हैं, और राष्ट्रीय संग्रहालय में वापसी 21 नवंबर को है। विज्ञप्ति कहती है कि समय और आवाजाही परिचालन, मौसम और सुरक्षा संबंधी विचारों के अधीन रहेंगे। नॉर्थईस्ट नाउ ने बताया कि अवशेष 31 अक्टूबर को तवांग पहुँचे, और 2 नवंबर 2026 तक दौरा जारी है, अवशेषों की 21 नवंबर को राष्ट्रीय संग्रहालय में वापसी तय है।
स्रोत और आगे पढ़ने के लिए
- Ministry of Culture, Sacred Piprahwa Relics of Lord Buddha Return Home to India, Press Information Bureau (30 July 2025)
- Prime Minister's Office, Prime Minister inaugurates Grand International Exposition of Sacred Piprahwa Relics related to Bhagwan Buddha in New Delhi, Press Information Bureau (3 January 2026)
- Ministry of Culture, Holy Relics of Lord Buddha to be Exposed for Public Veneration in Arunachal Pradesh from 31 October to 21 November 2026, Press Information Bureau (30 October 2026)
- W. C. Peppé and Vincent A. Smith, The Piprahwa Stupa, containing relics of Buddha, Journal of the Royal Asiatic Society (July 1898), pp. 573 to 588, with G. Bühler's note on the inscription, pp. 387 to 389, in the scan of the volume for 1898 on the Internet Archive
- J. F. Fleet, The Inscription on the Piprawa Vase, Journal of the Royal Asiatic Society (1906), pp. 149 ff., scan of the volume for 1906 on the Internet Archive
- Archaeological Survey of India, Indian Archaeology 1971-72: A Review, entry 56: Excavation at Piprahwa, district Basti
- Archaeological Survey of India, Indian Archaeology 1972-73: A Review, entry 55: Excavation at Piprahwa, district Basti
- Archaeological Survey of India, Indian Archaeology 1974-75: A Review, entry 61: Excavation at Piprahwa and Ganwaria, district Basti
- Harry Falk, The Ashes of the Buddha, Bulletin of the Asia Institute, new series, vol. 27 (2013), pp. 43 to 76, author's PDF as hosted by the Piprahwa Project
- Indian Museum, Kolkata, Inscribed Relic Casket from Piprahwa, National Portal and Digital Repository for Museums of India
- Mithil Aggarwal, Ancient Buddha relics returned to India after $13 million auction is canceled, NBC News (31 July 2025)
- Kabir Jhala, Sotheby's returns ancient Buddhist gem collection to India after legal pressure, The Art Newspaper (31 July 2025)
- Under pressure from India, Sotheby's halts auction of purported Buddha relics in Hong Kong, Malay Mail, AFP report (7 May 2025)
- Archana Khare-Ghose, Piprahwa Gems: Sotheby's halts sale of Buddha's jewels; can India get them back?, The Federal (8 May 2025)
- Chris Hellier, Competing Claims on Buddha's Hometown, Archaeology magazine, vol. 54 no. 2 (March/April 2001)
- Durham University Department of Archaeology, The Natal Landscape of the Buddha Phases II and III: Tilaurakot (project findings)
- NorthEast Now, Arunachal: Sacred Piprahwa relics of Lord Buddha arrive in Tawang for three-week exposition (31 October 2026)
- All India Radio, Grand International exposition of sacred Piprahwa relics of Lord Buddha open for public viewing (7 January 2026)
यह लेख AI उपकरणों की सहायता से शोधित और लिखा गया है, और सटीकता के लिए संपादित किया गया है। यह केवल सामान्य जानकारी और चर्चा के लिए है, पेशेवर सलाह नहीं। हमारे संपादकीय मानक और अस्वीकरण देखें। कोई त्रुटि मिली? हमें बताएँ।
अच्छा लगा? अगला लेख पाएँ।
एक बार में एक अच्छा लेख, सीधे आपके इनबॉक्स में। कोई स्पैम नहीं, जब चाहें अनसब्सक्राइब करें।